अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | 3 जुलाई 2026
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच रिश्ते लगातार खराब होते जा रहे हैं। कभी रणनीतिक साझेदार रहे दोनों देशों के बीच अब सीमा पर सैन्य टकराव, आतंकवादी हमले, शरणार्थियों की वापसी और आपसी अविश्वास ने संबंधों को गंभीर संकट में डाल दिया है। हाल में कराची में पाकिस्तान रेंजर्स मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है।
27 जून को कराची स्थित पाकिस्तान रेंजर्स मुख्यालय पर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के जमात-उल-अहरार (JuA) गुट ने हमला किया, जिसमें तीन अर्धसैनिक जवान मारे गए। पाकिस्तान ने इस हमले के लिए अफगानिस्तान में सक्रिय आतंकवादी ठिकानों को जिम्मेदार ठहराते हुए ‘ऑपरेशन ग़ज़ब लिल हक़’ शुरू किया। पाकिस्तान का दावा है कि इस अभियान में अफगान सीमा के भीतर और सीमावर्ती इलाकों में 29 आतंकवादी मारे गए।
जब 2021 में तालिबान ने अफगानिस्तान की सत्ता संभाली थी, तब पाकिस्तान को उम्मीद थी कि उसकी पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो जाएगी और तालिबान सरकार इस्लामाबाद की सुरक्षा चिंताओं को प्राथमिकता देगी। लेकिन यह उम्मीद पूरी नहीं हुई। तालिबान ने सत्ता में आने के बाद भी टीटीपी के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई नहीं की। उसने पाकिस्तान और टीटीपी के बीच बातचीत कराने की कोशिश जरूर की, लेकिन नवंबर 2022 में संघर्षविराम टूटने के बाद यह प्रक्रिया भी विफल हो गई।
पाकिस्तान का आरोप है कि टीटीपी के कई नेता और लड़ाके अफगानिस्तान में सुरक्षित ठिकानों से पाकिस्तान में हमलों की साजिश रच रहे हैं। इसके जवाब में इस्लामाबाद ने 2023 से अवैध विदेशी प्रत्यावर्तन योजना (IFRP) के तहत हजारों अफगान शरणार्थियों को वापस भेजना शुरू किया। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम की आलोचना की, लेकिन पाकिस्तान ने इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया।
सिर्फ शरणार्थियों की वापसी ही नहीं, पाकिस्तान ने कई बार अफगानिस्तान के भीतर हवाई हमले और तोपखाने से कार्रवाई भी की। पक्तिया, पक्तिका, नंगरहार और यहां तक कि काबुल के आसपास भी कथित आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। मार्च में पाकिस्तान के एक हमले में अफगानिस्तान के एक नशा मुक्ति केंद्र पर बमबारी हुई, जिसमें करीब 100 लोगों की मौत होने की खबर सामने आई। पाकिस्तान ने इसे आतंकवादी ढांचे के खिलाफ जवाबी कार्रवाई बताया, जबकि अफगानिस्तान ने इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन कहा।
बढ़ते तनाव को कम करने के लिए चीन, तुर्किये, कतर और सऊदी अरब ने कई बार मध्यस्थता की। चीन ने उरुमकी में पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच वार्ता कराई और त्रिपक्षीय बैठकों का भी आयोजन किया। हालांकि, अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल सका। पाकिस्तान चाहता है कि तालिबान टीटीपी के खिलाफ सख्त कार्रवाई करे, जबकि अफगानिस्तान मांग करता है कि पाकिस्तान उसकी सीमा और संप्रभुता का सम्मान करे।
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच समस्या सिर्फ आतंकवाद तक सीमित नहीं है। अफगान-पाक सीमा पर रहने वाली जनजातियों के ऐतिहासिक संबंध, टीटीपी और अन्य कट्टरपंथी संगठनों की मौजूदगी तथा आईएसआईएस-खुरासान (ISIS-K) जैसे संगठनों का खतरा हालात को और जटिल बना रहा है। तालिबान भी टीटीपी से पूरी तरह दूरी बनाने से बचता रहा है क्योंकि उसे डर है कि इससे उसके लड़ाके आईएसआईएस-खुरासान में शामिल हो सकते हैं।
इस्लामाबाद स्थित सेंटर फॉर रिसर्च एंड सिक्योरिटी स्टडीज़ (CRSS) की रिपोर्ट के अनुसार, 2025 की तुलना में हिंसा की घटनाओं में करीब 25 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। 2026 में अब तक 3,187 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि पिछले वर्ष यह संख्या 2,546 थी।
विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान की सैन्य कार्रवाई, अफगान शरणार्थियों की वापसी और कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद आतंकवाद पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाया है। लगातार आतंकी हमलों से पाकिस्तान में निवेश का माहौल प्रभावित हुआ है और विशेष रूप से बलूचिस्तान सहित कई क्षेत्रों में सुरक्षा स्थिति गंभीर बनी हुई है।
पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच बढ़ती यह दूरी न केवल दोनों देशों की आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती है, बल्कि पूरे दक्षिण और मध्य एशिया की क्षेत्रीय स्थिरता पर भी इसका गहरा असर पड़ सकता है।



