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स्वाद का ज़हर: जंक फूड की आदत से बिगड़ती सेहत, हर चौथा भारतीय खतरे में

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रश्मि राय | नई दिल्ली 27 दिसंबर 2025

चमकीले पैकेट, टीवी-मोबाइल पर आकर्षक विज्ञापन और मिनटों में मिलने वाला तेज़ स्वाद… जंक फूड आज सिर्फ भूख मिटाने का साधन नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे हमारी रोज़ की आदत बनता जा रहा है और चुपचाप शरीर व दिमाग को नुकसान पहुँचा रहा है। हाल में सामने आई एक घटना, जिसमें एक किशोरी की आंतों को गंभीर नुकसान पहुँचा, हमें साफ चेतावनी देती है कि जंक फूड का असर धीरे होता है, लेकिन जब होता है तो बहुत खतरनाक हो सकता है।यह सिर्फ एक बच्ची की बीमारी की बात नहीं है। यह उस परिवार का दर्द है, जो समझ ही नहीं पाया कि रोज-रोज खाया जाने वाला “सामान्य सा” फास्ट फूड एक दिन इतनी बड़ी मुसीबत बन सकता है। डॉक्टर बताते हैं कि लंबे समय तक पिज़्ज़ा, बर्गर, चिप्स, नूडल्स, कोल्ड ड्रिंक जैसे जंक फूड खाने से पेट और आंतें कमजोर हो जाती हैं। इनमें बहुत ज़्यादा तेल, नमक, शुगर और केमिकल होते हैं, जबकि फाइबर, विटामिन और मिनरल बहुत कम। इससे शरीर को ज़रूरी पोषण नहीं मिलता और अंदर ही अंदर बीमारियाँ बढ़ने लगती हैं।

भारत में यह समस्या इसलिए भी बड़ी है क्योंकि जंक फूड अब हर जगह पहुँच चुका है। रिपोर्ट के अनुसार, हर चौथा भारतीय नियमित रूप से जंक फूड खा रहा है। यह आदत बड़े शहरों तक सीमित नहीं रही—छोटे शहरों, कस्बों और गाँवों में भी फैल चुकी है। स्कूलों के बाहर फास्ट-फूड ठेले, ऑनलाइन डिलीवरी के सस्ते ऑफर और बच्चों को लुभाने वाले विज्ञापन सबसे ज़्यादा असर डाल रहे हैं। घर का सादा खाना बच्चों को “बोरिंग” लगता है, जबकि पैकेट वाला खाना उन्हें “कूल” लगता है।

सेहत के जानकार साफ कहते हैं कि जंक फूड में पोषण कम और कैलोरी ज़्यादा होती है। इससे वजन तेजी से बढ़ता है और मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ज़्यादा नमक और गलत तरह की चर्बी नसों को नुकसान पहुँचाती है, जिससे हार्ट अटैक और स्ट्रोक का जोखिम होता है। लीवर पर भी बुरा असर पड़ता है और फैटी लिवर जैसी बीमारी आम होती जा रही है।

जंक फूड सिर्फ शरीर को ही नहीं, दिमाग को भी नुकसान पहुँचाता है। शोध बताते हैं कि बहुत ज़्यादा प्रोसेस्ड और मीठा खाना थकान, चिड़चिड़ापन, ध्यान की कमी, उदासी और चिंता से जुड़ा हो सकता है। बच्चों में इसका असर और गहरा होता है—उनकी पढ़ने-समझने की क्षमता और भावनात्मक संतुलन प्रभावित हो सकता है। शुगर और फैट का मेल आदत बना देता है, जिससे बच्चा बार-बार वही अस्वस्थ खाना मांगता है।

दुनिया के कई देशों में भी जंक फूड से सेहत का संकट बढ़ा है। इसलिए कुछ देशों ने जंक फूड पर टैक्स लगाया है, बच्चों को लक्षित विज्ञापनों पर रोक लगाई है और स्कूलों में अस्वस्थ भोजन पर पाबंदी लगाई है। भारत में भी अब यह सोचने का समय है कि क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ी को इस धीमे ज़हर के हवाले छोड़ देंगे।

असल सवाल यह नहीं है कि जंक फूड कभी-कभार खाया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या इसे रोज़ की आदत बना लिया जाए। हल हमारे पास है—घर का बना खाना, फल-सब्ज़ियाँ, दाल-रोटी, अनाज, मेवे और पर्याप्त पानी। घर का खाना सिर्फ पेट नहीं भरता, यह शरीर को ताकत देता है और दिमाग को स्वस्थ रखता है।

यह खबर डराने के लिए नहीं, जगाने के लिए है। जंक फूड का हर निवाला एक छोटा फैसला है—या तो सेहत की ओर, या बीमारी की ओर। आज रुककर सोचने का समय है, ताकि कल पछताना न पड़े।

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