अंतरराष्ट्रीय डेस्क | 10 दिसंबर 2025
अफ़गानिस्तान में तालिबान सरकार एक बार फिर चर्चा में है, और इस बार वजह है चार युवा अफ़गानों का आधुनिक और स्टाइलिश फोटोशूट। इन युवकों ने ब्रिटिश टीवी सीरीज़ Peaky Blinders से प्रेरित होकर तीन-पीस सूट, फ्लैट कैप और हाथ में सिगार के साथ तस्वीरें खिंचवाई थीं। यह महज़ एक रचनात्मक फैशन शूट था—लेकिन सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही तालिबान ने इसे “गैर-इस्लामी पहनावा” बताते हुए तुरंत कार्रवाई शुरू कर दी। युवकों को वाइस एंड वर्च्यू विभाग में पेश होने के आदेश दे दिए गए। इस घटना ने दुनिया में यह बहस छेड़ दी है कि आखिर तालिबान का यह कदम कितना सही और कितना ग़लत है।
तालिबान के अधिकारियों के अनुसार यह पहनावा अफ़गान-इस्लामी मूल्यों के ख़िलाफ़ है और विदेशी संस्कृति का अंधानुकरण माना जाता है। उन्होंने ब्रिटिश ब्रॉडकास्ट कॉरपोरेशन — (BBC) को दिए बयान में कहा कि अफ़गान युवाओं को “धार्मिक पूर्वजों” से प्रेरणा लेनी चाहिए, न कि ब्रिटिश अपराध-आधारित सीरीज़ के पात्रों से। अधिकारियों ने यह भी कहा कि युवकों को गिरफ्तार नहीं किया गया, केवल “सलाह और चेतावनी” देकर छोड़ दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी समाज में सिर्फ कपड़ों के आधार पर सरकारी कार्रवाई उचित है? और क्या युवा पीढ़ी की रचनात्मक अभिव्यक्ति को इस तरह सीमित करना सही है? यही से यह विवाद गंभीर बहस का रूप लेता है।
युवकों ने पूछताछ में साफ बताया कि उनका कोई राजनीतिक या धार्मिक संदेश देने का इरादा नहीं था। वे सिर्फ मनोरंजन और फैशन की दृष्टि से यह शूट कर रहे थे। लेकिन तालिबान के लिए यह एक ऐसी “सांस्कृतिक गलती” थी जिसे सुधारना जरूरी समझा गया। यह घटना तालिबान शासन की उस विचारधारा को उजागर करती है जिसमें कपड़े केवल फैशन या पसंद नहीं, बल्कि धार्मिक अनुशासन और सामाजिक नियंत्रण का साधन माने जाते हैं। जिस समाज में कपड़ों को लेकर इतनी कठोरता हो, वहाँ अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता की गुंजाइश कितनी बचती है—यह सवाल स्वाभाविक है।
2021 में दोबारा सत्ता संभालने के बाद से तालिबान ने अफ़गानिस्तान में हर स्तर पर पाबंदियों का सिलसिला तेज़ किया है। महिलाओं की शिक्षा पर रोक, नौकरी और यात्रा प्रतिबंध, कठोर ड्रेस कोड और अब युवाओं के फैशन तक पर दख़ल—ये सभी कदम एक ऐसे समाज को जन्म दे रहे हैं जहाँ व्यक्तिगत आज़ादी सिकुड़ती जा रही है। यह घटना इसी व्यापक चित्र का एक हिस्सा है। दुनिया भर में कपड़े व्यक्तिगत आज़ादी का हिस्सा माने जाते हैं, लेकिन अफ़गानिस्तान में यह सरकार की विचारधारा का दर्पण बन चुका है। Peaky Blinders जैसे पहनावे पर आपत्ति सिर्फ फैशन तक सीमित नहीं, बल्कि उस मानसिकता की ओर इशारा करती है जो आधुनिकता को खतरा और स्वतंत्र अभिव्यक्ति को चुनौती मानती है।
तो सवाल यह उठता है—क्या तालिबान का कदम सही है? समर्थकों के अनुसार तालिबान अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान बचाने की कोशिश कर रहा है। उनका तर्क है कि विदेशी फैशन का बढ़ता प्रभाव अफ़गान समाज के पारंपरिक मूल्यों को तोड़ रहा है और युवाओं को अपनी जड़ों से दूर कर रहा है। लेकिन इसके उलट, आलोचक कहते हैं कि कपड़ों पर सरकारी नियंत्रण व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सीधा हनन है। आधुनिक दुनिया में पहनावे को अपराध की तरह देखना न सिर्फ अतार्किक है, बल्कि एक पूरे समाज को डर और प्रतिबंधों में ढकेलने जैसा है। जब एक साधारण फोटोशूट को “गैर-इस्लामी” घोषित कर दिया जाता है, तो यह समझना मुश्किल नहीं कि और कौन-कौन सी व्यक्तिगत चीज़ें आने वाले समय में प्रतिबंधों की सूची में शामिल की जा सकती हैं।
यह घटना एक और बड़े प्रश्न को सामने लाती है—क्या कपड़ों पर बहस तालीम, विकास और समाज की प्रगति से ज़्यादा महत्वपूर्ण होनी चाहिए? तालिबान के कड़े सामाजिक नियमों ने पहले ही शिक्षा, रोजगार और स्वतंत्रता पर भारी असर डाला है। अब युवाओं की पहनावे की पसंद पर चेतावनी देकर सरकार यह संदेश भी दे रही है कि उसकी निगाह से कोई भी व्यक्तिगत निर्णय दूर नहीं। ऐसे माहौल में युवा रचनात्मकता का विकास कैसे हो सकता है? क्या किसी देश का भविष्य उस समय सुरक्षित रह सकता है जब कपड़ों की आज़ादी भी खतरे में पड़ जाए?
अंततः, Peaky Blinders पहनावे पर दी गई यह चेतावनी केवल एक घटना नहीं, बल्कि तालिबान की विचारधारा की गहराई को समझने का मौका है। यह पूरी दुनिया को दिखाती है कि जब सत्ता कपड़ों, संगीत, कला और शिक्षा पर नियंत्रण बढ़ाती है, तो समाज डर और संकुचन की ओर बढ़ जाता है। तालिबान का कदम कितना सही या ग़लत है—यह बहस आगे भी चलती रहेगी, लेकिन इतना जरूर है कि इसने एक बार फिर यह सवाल उठा दिया है कि क्या कपड़ों को “अपराध” बनाने से समाज सुरक्षित होता है, या केवल और अधिक बंधनों में जकड़ जाता है?




