सुमन कुमार | नई दिल्ली 26 दिसंबर 2025
दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर जो दृश्य दिखा, वह सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं था—वह उस पीड़ा, उस डर और उस टूटे भरोसे की अभिव्यक्ति था, जिसे उन्नाव रेप कांड की पीड़िता और उसके जैसे अनगिनत लोग सालों से ढो रहे हैं। पूर्व बीजेपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सजा निलंबित किए जाने के फैसले के खिलाफ सामाजिक कार्यकर्ताओं, महिला संगठनों और नागरिकों ने सड़कों पर उतरकर सवाल उठाया—क्या न्याय अब भी ताकतवरों के सामने कमजोर है? प्रदर्शनकारियों के हाथों में तख्तियां थीं, जिन पर लिखा था— “पीड़िता को आज़ादी चाहिए, अपराधी को नहीं”, “सजा निलंबन नहीं, न्याय चाहिए”।
आवाज़ों में गुस्सा था, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा पीड़ा। उनका कहना था कि उन्नाव मामला सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की परीक्षा है, जिसने एक नाबालिग लड़की को न्याय दिलाने में सालों लगा दिए और अब उसी मामले में दोषी को राहत देकर पीड़िता को फिर असुरक्षा के साए में धकेल दिया। प्रदर्शन में शामिल लोगों ने कहा कि सजा निलंबन का यह फैसला केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं लगता, बल्कि यह पीड़िता के ज़ख्मों को फिर कुरेदने जैसा है। जिस अपराध ने पूरे देश को झकझोर दिया था, जिसमें एक लड़की को न सिर्फ बलात्कार बल्कि धमकियों, परिवार की मौत और लगातार भय से गुजरना पड़ा—उसी मामले में दोषी को राहत मिलना समाज के लिए बेहद खतरनाक संदेश है।
महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि ऐसे फैसले पीड़िताओं के मनोबल को तोड़ते हैं। जब एक बलात्कार के दोषी को सजा के बावजूद जेल से बाहर आने का रास्ता मिलता है, तो यह सवाल उठता है कि फिर न्याय का मतलब क्या रह जाता है? क्या कानून की संवेदनशीलता सिर्फ कागज़ों तक सीमित है? प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि अदालतें ऐसे मामलों में पीड़िता की सुरक्षा, मानसिक स्थिति और सामाजिक प्रभाव को भी उतनी ही गंभीरता से देखें, जितनी गंभीरता आरोपी के अधिकारों को दी जाती है। उनका कहना था कि न्याय संतुलन का नाम है, लेकिन यह संतुलन तब बिगड़ जाता है, जब पीड़िता की आवाज़ सबसे कमजोर साबित होती है।
उन्नाव रेप कांड एक बार फिर देश की अंतरात्मा को झकझोर रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट के बाहर खड़े ये लोग सिर्फ सेंगर की सजा निलंबन का विरोध नहीं कर रहे थे—वे यह कह रहे थे कि न्याय देर से मिले तो ज़ुल्म बन जाता है, और न्याय में डर शामिल हो जाए तो वह न्याय नहीं रहता।
यह खबर हमें याद दिलाती है कि कानून की इमारत इंसाफ की नींव पर खड़ी होती है। अगर उस नींव में दरार आएगी, तो सबसे पहले वही गिरेगी, जो पहले ही टूटी हुई है—पीड़िता।




