राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 12 अक्टूबर 2026
मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने नए Form-6 को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने साफ कहा कि अदालत ने निर्वाचन आयोग के संशोधित Form-6 की वैधता पर कोई फैसला नहीं दिया है। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, “हमारे मुंह में अपने शब्द मत डालिए।” अदालत ने स्पष्ट किया कि बिहार में SIR से संबंधित पहले के फैसले को नए Form-6 की मंजूरी के रूप में पेश नहीं किया जा सकता। इस मामले को SIR से जुड़ी अन्य याचिकाओं के साथ 27 अक्टूबर 2026 को सुना जाएगा।
इस विवाद का केंद्र ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण फॉर्म में जोड़ी गई अतिरिक्त घोषणा है। इसके तहत आवेदक को बताना होता है कि उसका अपना नाम अथवा उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पिछली SIR के दौरान तैयार मतदाता सूची में दर्ज था या नहीं। इस शर्त के कानूनी आधार और नए मतदाताओं पर इसके प्रभाव को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
‘नए Form-6 पर कोई फैसला नहीं हुआ’
12 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के सामने नए Form-6 का मुद्दा उठा। पीठ ने कहा कि अदालत की पिछली टिप्पणियों को नए फॉर्म की वैधता पर न्यायिक निर्णय नहीं माना जा सकता।
पीठ ने स्पष्ट किया कि बिहार में SIR पर फैसला सुनाए जाने के समय संशोधित Form-6 अस्तित्व में नहीं था। न्यायमूर्ति बागची ने भी कहा कि अदालत की उस टिप्पणी से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसने नए फॉर्म को मंजूरी दी थी या अस्वीकार किया था।
अदालत ने अब इस मुद्दे की जांच करने और इसे SIR से संबंधित अन्य याचिकाओं के साथ 27 अक्टूबर को सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। उस दिन निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची के पुनरीक्षण से संबंधित निर्णय प्रक्रिया को चुनौती देने वाले व्यापक मामलों पर भी सुनवाई होनी है।
Form-6 में क्या जोड़ा गया?
Form-6 वह वैधानिक आवेदन है, जिसका इस्तेमाल पात्र नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए करते हैं। SIR के दौरान ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया में एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई। इसमें आवेदक को अपने या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी के नाम का पिछली SIR की मतदाता सूची में दर्ज होने से संबंधित जानकारी देनी होती है।
इस बदलाव पर सवाल है कि क्या ऑनलाइन फॉर्म में अतिरिक्त शर्त जोड़ने के लिए केवल डिजिटल संस्करण में बदलाव पर्याप्त है, या इसके लिए निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया का पालन करना आवश्यक है।
यह सवाल पहली बार मतदाता बनने वाले युवाओं के लिए विशेष महत्व रखता है। यदि किसी युवा का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में नहीं था, तो उसके लिए ऐसी जानकारी देना मुश्किल हो सकता है। इसी तरह, जिन लोगों के नाम पहले सूची से हट चुके हैं और जो दोबारा पंजीकरण कराना चाहते हैं, उन्हें परिवार के पुराने रिकॉर्ड जुटाने में परेशानी हो सकती है।
इसलिए अतिरिक्त घोषणा की वैधता का प्रश्न सीधे पात्र नागरिकों के मतदाता सूची में शामिल होने और उनके मतदान के अधिकार से जुड़ा है।
5 अक्टूबर को भी अदालत ने मांगा था रिकॉर्ड
5 अक्टूबर की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उसने Form-6 में किए गए बदलावों को मंजूरी नहीं दी है। अदालत ने संबंधित रिकॉर्ड मांगे थे, ताकि यह पता चल सके कि बदलाव किसने अधिकृत किए और उनमें क्या-क्या शामिल था।
उस सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने अधिवक्ता शैलेन्द्र मणि त्रिपाठी की ओर से दलीलें रखीं। त्रिपाठी ने ऑनलाइन Form-6 में किए गए बदलावों को चुनौती दी है। याचिका में यह सवाल उठाया गया कि मूल वैधानिक फॉर्म में अतिरिक्त शर्तें जोड़ने के लिए किस प्रक्रिया का पालन किया गया।
अब तक अदालत ने नए Form-6 की वैधता पर अंतिम फैसला नहीं दिया है। 27 अक्टूबर की सुनवाई में इस अतिरिक्त घोषणा के कानूनी आधार और उसे लागू करने की प्रक्रिया पर विचार किया जाएगा।
वैधानिक नियमों और ऑनलाइन बदलाव का सवाल
Form-6 का प्रावधान Registration of Electors Rules, 1960 के तहत है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 के अंतर्गत केंद्र सरकार निर्वाचन आयोग से परामर्श करके संबंधित नियम बनाती है। नियमों में संशोधन के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है।
इस मामले में मुख्य सवाल यह है कि क्या मूल वैधानिक फॉर्म में नई शर्त केवल ऑनलाइन संस्करण बदलकर जोड़ी जा सकती है, या इसके लिए नियमों में निर्धारित संशोधन प्रक्रिया जरूरी है।
इस विवाद में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू की ओर से भी Form-6 में बदलाव की प्रक्रिया पर आपत्तियां उठाए जाने की खबरें सामने आई थीं। इन आपत्तियों का केंद्र यह था कि 1960 के नियमों के तहत निर्धारित फॉर्म में बदलाव वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार किया जाना चाहिए।
बिहार SIR के फैसले और नए फॉर्म का अंतर
बिहार में SIR से संबंधित पहले के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान निर्वाचन आयोग की अतिरिक्त दस्तावेज मांगने की शक्ति पर विचार किया था। लेकिन वर्तमान विवाद में जिस अतिरिक्त घोषणा पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उसे बाद में ऑनलाइन Form-6 में शामिल किया गया।
बिहार SIR से संबंधित निर्वाचन आयोग के 2025 के आदेश में Annexure D का उल्लेख था, लेकिन उसमें आवेदक के माता-पिता या दादा-दादी के पिछली SIR में सत्यापन से जुड़ी वही जानकारी नहीं मांगी गई थी, जिस पर अब विवाद है।
यही अंतर मौजूदा कानूनी चुनौती का केंद्र है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि बिहार SIR पर दिए गए पुराने फैसले को नए Form-6 की मंजूरी के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता।
27 अक्टूबर की सुनवाई पर निगाहें
निर्वाचन आयोग ने 26 सितंबर के अपने प्रेस नोट में कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने अतिरिक्त घोषणा को स्वीकार किया था। आयोग के अनुसार, Registration of Electors Rules, 1960 के तहत निर्धारित मूल Form-6, SIR अवधि के बाहर लागू रहेगा, जबकि अतिरिक्त घोषणा पुनरीक्षण प्रक्रिया के लिए जोड़ी गई थी।
12 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण के बाद इस मुद्दे पर कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की जरूरत और बढ़ गई है। अदालत ने कहा है कि नए Form-6 की वैधता पर उसने कोई निर्णय नहीं दिया। अब 27 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई में अतिरिक्त घोषणा के कानूनी आधार, उसे लागू करने की प्रक्रिया और SIR से जुड़े व्यापक सवालों पर विचार किया जाएगा।
राहुल गांधी की ओर से SIR को चुनौती देने वाली याचिका और विपक्ष की मतदाता सूची में पारदर्शिता की मांग के बीच Form-6 का विवाद भी महत्वपूर्ण हो गया है। विपक्ष SIR पर रोक, मतदाता सूची में बदलावों की जांच और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल नए Form-6 को वैध या अवैध घोषित नहीं किया है। 27 अक्टूबर की सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि ऑनलाइन फॉर्म में जोड़ी गई अतिरिक्त घोषणा का कानूनी आधार क्या है और उसका पात्र नागरिकों के मतदाता पंजीकरण पर क्या प्रभाव पड़ता है।



