गुंजन सिंहा, राजनीतिक विशेषज्ञ | नई दिल्ली 31 अक्टूबर 2025
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को लेकर हाल के वर्षों में जो बहस तेज़ हुई है, उसमें सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों से जानबूझकर दूरी बना रहा है? यह स्थिति अब केवल संयोग नहीं रही, बल्कि एक “रणनीतिक अनुपस्थिति” की नीति का रूप ले चुकी है — ऐसी नीति जो अंततः भारत की कूटनीतिक विश्वसनीयता को कमजोर करती है और देश की वैश्विक साख पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम को सूचित किया कि वे कुआलालंपुर में होने वाले ASEAN सम्मेलन में शामिल नहीं होंगे क्योंकि भारत में दिवाली के कार्यक्रम चल रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि इस वर्ष दिवाली 20 अक्टूबर को समाप्त हो गई थी और सम्मेलन 26 अक्टूबर से शुरू हुआ। ऐसे में दिवाली को कारण बताना केवल एक बहाना प्रतीत होता है। यह बहाना केवल तथ्यात्मक नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अनुचित है। यह कदम न केवल पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है, बल्कि भारत की विदेश नीति के भीतर छिपी झिझक और अनिश्चितता को भी सामने लाता है।
यह पहली बार नहीं है जब प्रधानमंत्री मोदी ने किसी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन से दूरी बनाई हो। इससे पहले भी वे गाज़ा शांति सम्मेलन में अनुपस्थित रहे, जबकि वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प मौजूद थे और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की खुलकर प्रशंसा कर रहे थे। ट्रम्प ने पाकिस्तान की भूमिका को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण बताया और नोबेल पुरस्कार के लिए उनके नाम की सिफारिश तक की। उस समय भारत के प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति ने एक बड़ा राजनीतिक खालीपन छोड़ दिया था। दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता के सामने भारत का प्रतिनिधि मौजूद नहीं था — यह कूटनीतिक असावधानी नहीं, बल्कि रणनीतिक पलायन था।
दक्षिण एशिया और पश्चिम एशिया में भारत की उपस्थिति का बहुत बड़ा महत्व है। इन क्षेत्रों में भारत का प्रभाव न केवल आर्थिक दृष्टि से, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन के लिहाज से भी निर्णायक रहा है। परंतु मोदी सरकार की विदेश नीति में लगातार यह झुकाव देखा जा रहा है कि जहां विवाद या प्रतिस्पर्धा हो सकती है, वहां दूरी बनाना ही बेहतर है। इस नीति ने भारत को एक “पेरिफेरल प्लेयर” यानी हाशिए पर खड़ा देश बना दिया है। पहले जहाँ भारत मध्यस्थ की भूमिका में देखा जाता था, अब उसकी स्थिति एक मूक दर्शक जैसी लगने लगी है।
यह अनुपस्थिति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी हानिकारक साबित हो रही है। ट्रम्प प्रशासन के दौरान पाकिस्तान पर आयात शुल्क घटा दिए गए जबकि भारत पर टैक्स बढ़ा दिए गए। भारतीय उद्योग जगत को इसका गहरा नुकसान हुआ, लेकिन सरकार ने कोई ठोस जवाब नहीं दिया। इसके बजाय उसने उन मंचों से ही दूरी बना ली जहाँ इन मुद्दों पर बातचीत होनी थी। इस तरह की चुप्पी ने भारत को एक कमजोर वार्ताकार की छवि में बदल दिया है।
भारत की विदेश नीति कभी संवाद और उपस्थिति पर आधारित रही है। नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक, भारतीय नेताओं ने हमेशा वैश्विक मंचों पर उपस्थिति को अपनी ताकत माना। लेकिन वर्तमान में यह नीति बदलती हुई दिखाई देती है — अब मंच से बाहर रहना, विवाद से बचना, और बयानबाजी से काम चलाना एक प्रवृत्ति बन गई है। यह “avoidance diplomacy” उस भारत की पहचान नहीं हो सकती जो स्वयं को विश्वगुरु के रूप में देखना चाहता है।
भारत आज ऐसे दौर में है जब उसे अपनी आवाज़ बुलंद करनी चाहिए। उसे उन कमरों में उपस्थित रहना चाहिए जहाँ फैसले लिए जाते हैं, उसे अपने हितों की रक्षा करनी चाहिए, और जो भी शक्ति बची है, उसका प्रयोग कूटनीतिक वार्ता में करना चाहिए। अगर भारत स्वयं अपने हितों के लिए नहीं बोलेगा, तो कोई दूसरा उसके लिए नहीं बोलेगा। दुनिया उन देशों की सुनती है जो संवाद करते हैं, न कि उन देशों की जो चुप रहते हैं।
अब यह समय है जब भारत को अपनी विदेश नीति में आत्मविश्वास और साहस दिखाना चाहिए। अनुपस्थिति से कूटनीतिक संकट नहीं सुलझते — वे और गहरे हो जाते हैं। प्रधानमंत्री की भूमिका केवल समारोहों तक सीमित नहीं हो सकती। देश को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर न केवल उपस्थित रहे बल्कि देश के हितों की दृढ़ता से रक्षा करे। भारत को अब “रणनीतिक अनुपस्थिति” की नहीं, बल्कि “कूटनीतिक उपस्थिति” की राजनीति अपनानी होगी — क्योंकि वैश्विक राजनीति में उपस्थिति ही प्रभाव है, और अनुपस्थिति केवल भुला दिए जाने की शुरुआत।




