29 जनवरी 2025 की सुबह प्रयागराज कुंभ मेले में आस्था का महासागर उमड़ पड़ा था। करोड़ों श्रद्धालु संगम में डुबकी लगाने के लिए जुटे हुए थे। यह वही कुंभ है, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण जनसमागम कहा जाता है — लेकिन उस सुबह एक केमिकल ब्रेकर के अचानक टूटने से मेला क्षेत्र के सेक्टर-17 में भगदड़ मच गई, और आस्था की वह भीड़ अचानक त्रासदी के रूप में तब्दील हो गई।
प्रारंभिक पुलिस और प्रशासनिक रिपोर्ट में 30 लोगों की मौत और लगभग 60 के घायल होने की पुष्टि की गई, जिनमें अधिकतर महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे शामिल थे। लेकिन स्थानीय स्वयंसेवी संगठनों और अस्पतालों की ओर से मिली जानकारी के अनुसार, यह आंकड़ा 79 तक पहुंच गया। कई पीड़ितों की पहचान नहीं हो सकी क्योंकि उनके पास पहचान-पत्र या संपर्क सूचना नहीं थी, और अफरातफरी में वे इलाज से पहले ही दम तोड़ चुके थे।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हादसा तब हुआ जब भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगाए गए एक केमिकल ब्रेकर (फाइबर का फर्शनुमा फुटपाथ) का एक हिस्सा भारी दबाव के कारण धँस गया। इसके कारण आगे की भीड़ रुक गई लेकिन पीछे से आने वाले श्रद्धालु अनजान थे और धक्का-मुक्की शुरू हो गई। चंद मिनटों में हालत बेकाबू हो गई। आसपास तैनात पुलिसकर्मी और होमगार्ड जवान भी भीड़ में फंस गए और संचार व्यवस्था ठप हो गई।
राज्य सरकार की ओर से तुरंत मजिस्ट्रेट स्तर की जांच के आदेश दिए गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ से स्थिति की निगरानी करते हुए कहा कि “जो भी दोषी पाया जाएगा, उस पर कठोर कार्रवाई की जाएगी।” उन्होंने मृतकों के परिजनों को ₹10 लाख और घायलों को ₹2 लाख की अनुग्रह राशि की घोषणा की। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि “इस हादसे को किसी भी कीमत पर दोहराया नहीं जा सकता” और आने वाले पर्व स्नानों के लिए भीड़ नियंत्रण के उपायों की समीक्षा होगी।
हालांकि, यह हादसा प्रशासन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या करोड़ों की भीड़ के लिए लगाए गए अस्थायी संरचनाएं इतनी मजबूत थीं? क्या पहले से भीड़ के दबाव और मार्गों के संकुचन को लेकर पर्याप्त चेतावनी नहीं थी? क्यों सीसीटीवी और ड्रोन निगरानी के बावजूद भीड़ का बहाव समय रहते मोड़ा नहीं गया? यह भी सामने आया है कि मेले के कई हिस्सों में वॉलंटियर या पुलिसकर्मी पर्याप्त संख्या में तैनात नहीं थे, जिससे शुरुआती क्षणों में किसी ने भी स्थिति को नियंत्रित करने की पहल नहीं की।
मीडिया और सामाजिक संगठनों ने भीड़ प्रबंधन में तकनीकी दृष्टिकोण की कमी और मेला प्रशासन की धीमी प्रतिक्रिया की आलोचना की है। कुंभ जैसे विशाल आयोजन में सिर्फ धार्मिक महत्व नहीं, जन सुरक्षा और मानव जीवन का भी महत्व सर्वोपरि होता है। 2013 के प्रयागराज कुंभ के समय भीड़ नियंत्रण की मिसाल दी जाती थी, लेकिन इस बार, आधुनिक संसाधनों के बावजूद, असंगठित तंत्र और मौके की संवेदनशीलता की अनदेखी ने त्रासदी को जन्म दिया।
यह घटना केवल प्रशासन की विफलता नहीं, बल्कि देशभर में होने वाले विशाल धार्मिक आयोजनों के लिए एक चेतावनी है। जब आयोजन वैश्विक पहचान का हिस्सा बनते हैं, तब एक चूक न केवल लोगों की जान ले सकती है, बल्कि देश की छवि और श्रद्धा की प्रतिष्ठा पर भी आघात पहुंचाती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस दुखद घटना से सबक लेते हुए फ्यूचर मेला मैनेजमेंट मॉडल तैयार किया जाएगा, जिसमें आस्था और सुरक्षा — दोनों साथ-साथ चलें।




