भारत के प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और इंजीनियर सोनम वांगचुक को अमेरिकी पत्रिका TIME ने अपनी प्रतिष्ठित सूची “TIME100 Climate 2025” में शामिल किया है। यह सूची विश्व के उन 100 नेताओं की है, जो जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक स्तर पर निर्णायक कदम उठा रहे हैं। वांगचुक को यह सम्मान लद्दाख जैसे कठिन भूभाग में स्थायी समाधान आधारित जलवायु नवाचारों के लिए दिया गया है।
लद्दाख के ऊंचे पहाड़ों में जन्मे और पले-बढ़े सोनम वांगचुक ने अपने जीवन को प्रकृति और समाज के संतुलन के लिए समर्पित किया है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान को जोड़ते हुए “आइस स्तूपा (Ice Stupa)” जैसी तकनीक विकसित की — एक कृत्रिम हिमनद प्रणाली जो पिघलते ग्लेशियरों के पानी को सर्दियों में संग्रहित कर गर्मियों में खेती और पेयजल के रूप में उपलब्ध कराती है। यह विचार अब न केवल भारत, बल्कि नेपाल, पाकिस्तान और चिली जैसे देशों में भी अपनाया जा रहा है।
TIME पत्रिका ने वांगचुक को “पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भारत की जीवंत सोच और स्थानीय विज्ञान का प्रतीक” बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, 11,500 फीट की ऊंचाई पर जीवन के लिए संघर्ष कर रहे लद्दाख के लोगों के बीच वांगचुक ने जल संकट को अवसर में बदल दिया। उन्होंने बताया कि नकारात्मक 20 डिग्री सेल्सियस में जब पानी के छींटे हवा में जम जाते हैं, तो यह प्राकृतिक रूप से बर्फ का शंकु बनाते हैं — यही तकनीक आगे चलकर लाखों गैलन पानी सहेजने वाली ‘आइस स्तूपा’ प्रणाली में बदल गई।
उनकी टीम ने अब “स्मार्ट स्तूपा” तकनीक भी विकसित की है, जो मोटराइज्ड वाल्व से स्वतः जमे हुए पाइपों को खोल देती है और ठंडे तापमान में पानी का प्रवाह जारी रखती है। मात्र 20,000 डॉलर की लागत वाली यह तकनीक इस वर्ष लद्दाख सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से अपनाई गई है और क्षेत्रभर में इसे विस्तारित करने की योजना तैयार हो चुकी है।
सोनम वांगचुक ने इस उपलब्धि पर कहा, “यह सम्मान सिर्फ मेरा नहीं, लद्दाख की उस धरती का है जिसने हमें सिखाया कि प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहयोग करना चाहिए।”
उल्लेखनीय है कि TIME की इस सूची में उन नेताओं को शामिल किया गया है जो फंडिंग, रिसर्च और नवाचार के ज़रिए जलवायु परिवर्तन से निपटने में क्रांतिकारी भूमिका निभा रहे हैं। वांगचुक का नाम इस सूची में आने से भारत को अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण मंच पर नई पहचान मिली है।
सच्चे अर्थों में, सोनम वांगचुक का यह सम्मान न केवल लद्दाख की विजय है, बल्कि यह भारत की उस वैज्ञानिक और मानवीय सोच का प्रमाण है जो कहती है —
“धरती माँ है, और उसका उपचार विज्ञान और संवेदना दोनों से संभव है।”





