शैलेन्द्र नेगी | देहरादून 10 जनवरी 2026
उत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड की जांच पहले ही भरोसे के संकट से जूझ रही है, लेकिन अब एक नया और बेहद गंभीर सवाल सामने आ गया है, जो सीधे-सीधे कानून, प्रक्रिया और निष्पक्षता पर चोट करता है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड में अब कोई भी प्राइवेट व्यक्ति पुलिस SIT का हिस्सा बन सकता है? और अगर हां, तो किस नियम, किस आदेश और किस कानून के तहत? यह सवाल इसलिए उठा है क्योंकि हरिद्वार में SIT के सामने अभिनेत्री उर्मिला सनावर की पेशी के दौरान जारी की गई ऑफिशियल रिलीज़ फ़ोटो में एक महिला स्पष्ट रूप से पूछताछ कक्ष में बैठी नजर आ रही है, जिसे गोल घेरा बनाकर दिखाया गया है। इस महिला का नाम मन्नू शिवपुरी बताया जा रहा है।
SIT की पूछताछ में अनधिकृत मौजूदगी: दृश्य साक्ष्य खुद बोल रहे हैं
यह पूरा मामला किसी बयान या आरोप पर नहीं, बल्कि दृश्य साक्ष्यों पर आधारित है। उत्तराखंड पुलिस या प्रशासन की ओर से जारी की गई फोटो में साफ दिखाई देता है कि मन्नू शिवपुरी न केवल कमरे में मौजूद हैं, बल्कि उस जगह बैठी हैं जहां आमतौर पर SIT अधिकारी, महिला पुलिस या अधिकृत गवाह होते हैं। सवाल उठता है कि जब यह एक संवेदनशील हत्याकांड है, जिसमें पहले से VIP, सबूत मिटाने और राजनीतिक दबाव के आरोप लग चुके हैं, तो फिर एक निजी महिला की मौजूदगी को कैसे जायज़ ठहराया जा सकता है? क्या SIT की पूछताछ अब सार्वजनिक बैठक बन चुकी है?
पुलिस का दावा बनाम कानून की सच्चाई
जब इस फोटो को लेकर सवाल उठे, तो पुलिस की ओर से सफाई दी गई कि कोई महिला समाजसेवी स्वतंत्र गवाह के रूप में मौजूद रह सकती है। लेकिन यहीं से मामला और गंभीर हो जाता है। कानून यह जरूर कहता है कि महिला से पूछताछ के दौरान महिला अधिकारी या महिला उपस्थिति होनी चाहिए, लेकिन वह उपस्थिति सरकारी, अधिकृत और निष्पक्ष होनी चाहिए। सवाल यह है कि क्या मन्नू शिवपुरी की नियुक्ति लिखित आदेश से हुई थी? क्या उन्हें स्वतंत्र गवाह घोषित किया गया था? और अगर हां, तो उसका ऑफिशियल रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
‘स्वतंत्र गवाह’ या राजनीतिक रूप से जुड़ा चेहरा?
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू यह है कि मेरे पास जानकारी है—और जरूरत पड़ी तो फोटो साक्ष्य भी सार्वजनिक किए जा सकते हैं—कि मन्नू शिवपुरी बीजेपी से जुड़ी रही हैं। उनके कई फ़ोटो ऐसे हैं जिनमें वह बीजेपी के बड़े नेताओं के साथ मंच साझा करती दिखती हैं। ऐसे में यह सवाल लाज़मी है कि राजनीतिक रूप से सक्रिय या संबद्ध व्यक्ति को ‘स्वतंत्र गवाह’ कैसे माना जा सकता है? क्या स्वतंत्रता की परिभाषा अब पार्टी लाइन से तय होगी?
अंकिता केस में पहले ही सवालों के घेरे में जांच
यह याद दिलाना ज़रूरी है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड में पहले ही
– FIR में देरी
– रिज़ॉर्ट पर बुलडोज़र
– सबूत नष्ट होने के आरोप
– और VIP नाम छिपाने जैसे गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं।
ऐसे में SIT की पूछताछ के दौरान बीजेपी से जुड़ी महिला की मौजूदगी इस शक को और गहरा करती है कि कहीं न कहीं जांच पर राजनीतिक निगरानी या दबाव तो नहीं है।
कानूनी नजर से यह कितना गंभीर मामला है?
CrPC और पुलिस मैनुअल के अनुसार, किसी भी जांच या पूछताछ के दौरान
– अनधिकृत व्यक्ति की मौजूदगी
– और वह भी राजनीतिक रूप से संबद्ध
तो यह जांच को प्रभावित करने, गवाहों पर असर डालने या प्रक्रिया को दूषित करने की श्रेणी में आ सकता है। यह सिर्फ नैतिक या प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि कानूनी उल्लंघन भी बन सकता है। सवाल यह है कि क्या उत्तराखंड पुलिस इस खतरे से अनजान है, या जानबूझकर आंखें मूंदी गई हैं?
सरकार, पुलिस और SIT से सीधे सवाल
अब यह मामला सिर्फ एक फोटो का नहीं रहा, बल्कि पूरे न्याय तंत्र की साख का बन चुका है। सरकार और पुलिस को स्पष्ट रूप से बताना होगा— किस आदेश से मन्नू शिवपुरी पूछताछ कक्ष में मौजूद थीं? क्या उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि की जांच की गई थी? क्या उन्हें आधिकारिक रूप से स्वतंत्र गवाह नियुक्त किया गया था? और अगर हां, तो उसका आदेश और रिकॉर्ड जनता के सामने क्यों नहीं?
यह सिर्फ अंकिता का मामला नहीं
अगर उत्तराखंड में बीजेपी से जुड़े निजी लोग पुलिस SIT की कार्यवाही का हिस्सा बन सकते हैं, तो यह सिर्फ अंकिता भंडारी के लिए नहीं, बल्कि हर उस आदमी और औरत के लिए खतरा है जो न्याय की उम्मीद लेकर पुलिस और अदालत तक जाता है। यह मामला अब हत्या से आगे बढ़कर जांच की निष्पक्षता और कानून की समानता का सवाल बन चुका है। जब तक इन सवालों के स्पष्ट, लिखित और सार्वजनिक जवाब नहीं मिलते, तब तक यह आशंका बनी रहेगी कि उत्तराखंड में कानून सबके लिए एक जैसा नहीं, बल्कि सत्ता के हिसाब से परिभाषित किया जा रहा है।




