Home » National » SIR का कहर: 19 दिनों में 16 बीएलओ की मौत, चुनाव सुधार के नाम पर अफ़रा-तफ़री—क्या यह नाकामी नहीं, षड्यंत्र है?

SIR का कहर: 19 दिनों में 16 बीएलओ की मौत, चुनाव सुधार के नाम पर अफ़रा-तफ़री—क्या यह नाकामी नहीं, षड्यंत्र है?

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

नई दिल्ली/भोपाल/कोलकाता/अहमदाबाद/कोट्टायम/चेन्नई | 23 नवंबर 25

देश के 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) ने चुनावी व्यवस्था में सुधार लाने के बजाय भय, तनाव और अराजकता का माहौल पैदा कर दिया है। पिछले 19 दिनों में पांच राज्यों में 50 से अधिक बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) गंभीर मानसिक और शारीरिक दबाव में काम कर रहे थे, जिनमें से 16 की मौत हो चुकी है। इनमें हार्ट अटैक, तनावजनित मौतें, सड़क हादसे और आत्महत्या जैसी घटनाएँ शामिल हैं। मध्य प्रदेश, गुजरात, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, केरल और तमिलनाडु से लगातार मौतों की रिपोर्ट सामने आ रही है। यह स्थिति सिर्फ एक प्रशासनिक असफलता नहीं, बल्कि एक गहरे सिस्टमेटिक संकट का संकेत देती है, जिसे चुनाव सुधार के नाम पर जनता और कर्मचारियों पर थोप दिया गया है।

मध्य प्रदेश में हालात बेहद भयावह हो गए हैं। केवल 24 घंटे के भीतर दो बीएलओ की मौत हो गई और एक महिला बीएलओ लापता है। रायसेन जिले में बीएलओ रमाकांत पांडे की मौत के बाद परिवार ने बताया कि वे चार रातों से सो नहीं पाए थे और ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम का लगातार दबाव उन पर था। शिवपुरी में एक महिला बीएलओ को हार्ट अटैक आया जबकि श्योपुर जिले में एक अन्य बीएलओ की मौत से कर्मचारियों में भय और नाराज़गी फैली हुई है। परिवारों और स्थानीय कर्मचारियों का कहना है कि प्रशासन की ओर से असंभव लक्ष्य और अतार्किक समयसीमा थोपने के कारण यह हालात बने हैं। स्वास्थ्य की स्थिति बिगड़ने, रोज़ाना घंटों फील्डवर्क और रात में ऑनलाइन रिपोर्टिंग ने मानसिक तनाव को चरम पर पहुँचा दिया है।

गुजरात में स्थिति और भी चौंकाने वाली है। वडोदरा में चार दिनों के भीतर चार बीएलओ की मौत हुई—एक ने आत्महत्या कर ली, जबकि तीन अन्य की मौत हार्ट अटैक के कारण हुई। परिजनों का कहना है कि निरंतर दबाव, धमकियाँ और काम पूरा न होने पर कार्रवाई की चेतावनी ने इन कर्मचारियों को टूटने पर मजबूर कर दिया। अहमदाबाद में भी दो बीएलओ में गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ देखी गई हैं और कई कर्मचारी अस्पतालों में भर्ती हैं। प्रशासन के लिए ये मौतें “कार्य संबंधी दुर्घटनाएँ” भर हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि यह मानव लागत चुनाव प्रणाली पर थोपे गए अव्यवस्थित प्रयोग का परिणाम है।

पश्चिम बंगाल से और भी भयावह खबरें आई हैं। नदिया जिले में एक बीएलओ का शव फंदे से लटका मिला और उसके पास से सुसाइड नोट बरामद हुआ, जिसमें उसने SIR की अत्यधिक दबाव वाली कार्यप्रणाली को आत्महत्या का कारण बताया। राज्य में अब तक तीन बीएलओ की मौत हो चुकी है। परिवारों और कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि चुनाव आयोग कर्मचारियों को मशीन समझ रहा है—न भोजन, न विश्राम, न सुरक्षा—सिर्फ लक्ष्यों की पूर्ति का दबाव। इसी दौरान उत्तर बंगाल में एक महिला बीएलओ के हार्ट अटैक की पुष्टि हुई है।

इसी बीच, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची सुधार के लिए जो ढांचा बनाया है, उसने नागरिकों को भी भारी परेशानी में डाल दिया है। SIR के तहत मतदाताओं को अपने नाम की पुष्टि करने के लिए 22 साल पुरानी मतदाता सूचियों के स्कैन पन्नों को खंगालना पड़ रहा है। हजारों लोगों को आशंका है कि उनका नाम मतदाता सूची से गायब कर दिया गया है। देश जो दुनिया के लिए अत्याधुनिक सॉफ्टवेयर और डिजिटल सिस्टम तैयार करता है, वही देश अब भी चुनावी व्यवस्था को फाइलों, कागज़ों और स्कैन कॉपियों के जंगल में उलझाए हुए है। यदि नीयत पारदर्शिता और सुधार की होती, तो मतदाता सूची डिजिटल, सर्चेबल और मशीन-रीडेबल बनाई जाती। लेकिन 30 दिनों की हड़बड़ी में किया गया यह अभियान सवाल खड़े करता है कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक जल्दबाज़ी है या सोच-समझकर रची गई रणनीति?

आरोप यह भी है कि इस पूरी प्रक्रिया का वास्तविक उद्देश्य मतदाताओं की सुविधा नहीं, बल्कि वैध मतदाताओं को थकाकर प्रक्रिया से बाहर कर देना है। कई चुनाव विश्लेषक और नागरिक संगठन मानते हैं कि SIR एक “vote chori mechanism” बन चुका है—जहां वैध मतदाता अपना नाम ढूँढने में असमर्थ होते हैं, जबकि मनचाही प्रविष्टियाँ जोड़ने में प्रशासन को खुली छूट मिल जाती है। मतदाता सूची में व्यापक कटौती, संदिग्ध नए नामों की बढ़ोतरी और असंगत डेटा बदलाव इस आशंका को और गहरा करते हैं।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि बीएलओ की मौतों को प्रशासन “कॉलैटरल डैमेज” की तरह देख रहा है—जैसे यह चुनावी प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा हो। न कोई मुआवज़ा नीति स्पष्ट है, न जिम्मेदारी तय हुई है, न सुरक्षा उपाय। कर्मचारी संगठनों का कहना है कि यह न सिर्फ़ नाकामी है, बल्कि षड्यंत्र है—जहां सत्ता की रक्षा के लिए लोकतंत्र की बुनियाद पर काम करने वालों की बलि दी जा रही है।

SIR का यह मॉडल यह दिखाता है कि चुनाव आयोग की नीयत और प्राथमिकताएँ पारदर्शिता और सुविधा पर नहीं, बल्कि नियंत्रण और परिणाम प्रबंधन पर केंद्रित हो चुकी हैं। यदि यही चुनाव सुधार है, तो यह सुधार नहीं, लोकतंत्र पर थोपे गए अत्याचार के समान है। प्रश्न अब यह है—कितने और बीएलओ की जान जाएगी? कितने नागरिक मताधिकार से वंचित होंगे? और कब तक चुनावी सुधार के नाम पर यह दमन जारी रहेगा? देश का लोकतंत्र यदि मानव जीवन और नागरिक अधिकारों की कीमत पर चलाया जाएगा, तो यह चुनावी प्रक्रिया नहीं, सत्ता संरक्षित करने वाली मशीन बनकर रह जाएगी।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments