महेंद्र सिंह। नई दिल्ली 2 दिसंबर 2025
संसद का सत्र इस बार किसी शांतिपूर्ण विधायी चर्चा से अधिक, गूंजते नारों, तीखे आरोपों और “SIR” को लेकर जारी सियासी टकराव का अखाड़ा बना हुआ है। विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा है कि सरकार SIR (Status of India Report या Special Investigation Review जैसे आरोपों से जुड़े विवादित मसलों) को लेकर जवाब देने से बच रही है। दूसरी ओर, सरकार विपक्ष पर संसद की कार्यवाही बाधित करने का आरोप जड़ रही है। इन सबके बीच एक बड़ा राजनीतिक संकेत देते हुए केंद्र सरकार ने घोषणा की है कि वह चुनाव सुधारों (Electoral Reforms) पर विस्तृत और गंभीर बहस के लिए पूरी तरह तैयार है। साथ ही लोकसभा में इस बहस की औपचारिक तारीख भी तय कर दी गई है।
यह घोषणा ऐसे समय आई है जब संसद के भीतर SIR को लेकर भारी हंगामा चल रहा है। विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि देश में चुनावी प्रक्रिया लगातार अविश्वास का सामना कर रही है—चाहे वह ईवीएम की विश्वसनीयता का मुद्दा हो, धनबल–बाहुबल का असर, चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवाल या चुनावी फंडिंग में पारदर्शिता की कमी। इन मुद्दों पर विपक्ष की दृढ़ मांग थी कि सरकार संसद में चुनाव सुधारों पर खुली चर्चा करवाए, और अब सरकार की सहमति उस गतिरोध को तोड़ने की संभावना दिखाती है जो कई दिनों से कार्यवाही को ठप कर रहा था।
सरकार का कहना है कि वह चुनावी प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी, विश्वसनीय और आधुनिक बनाना चाहती है। सत्ता पक्ष के वरिष्ठ मंत्रियों का दावा है कि इस बहस के माध्यम से “लोकतंत्र को और मजबूत करने के लिए ठोस, वास्तविक और लागू किए जा सकने वाले सुझाव सामने आएंगे।” हालांकि विपक्ष इसे अपनी जीत मान रहा है कि सरकार आखिरकार दबाव में आकर बहस के लिए तैयार हुई। कई विपक्षी सांसदों ने कहा कि “यदि संसद जनता की आवाज़ है, तो चुनाव सुधारों पर चर्चा ही लोकतंत्र का पहला कदम है।”
लेकिन राजनीति सिर्फ घोषणा से नहीं चलती—सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह बहस सिर्फ औपचारिकता होगी या वास्तव में सरकार चुनावी व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलावों को स्वीकार करने का साहस दिखाएगी? विपक्ष ईवीएम के विकल्प के रूप में VVPAT की 100% गिनती की मांग कर रहा है। कुछ दल मतदाता सूची में पारदर्शिता, चुनाव आयोग की स्वायत्तता, और चुनावी बॉन्ड जैसे वित्तीय मॉडल पर व्यापक समीक्षा चाहते हैं। कई दलों ने इस मुद्दे को केंद्र में रखकर कहा है कि “चुनाव की ईमानदारी ही लोकतंत्र की असली रीढ़ है—और यदि रीढ़ कमजोर हो जाए, तो लोकतंत्र सिर्फ एक शब्द भर रह जाता है।”
उधर, SIR के मुद्दे पर गतिरोध अभी भी समाप्त नहीं हुआ है। विपक्ष बार-बार नियम 267 और 184 के तहत तत्काल चर्चा की मांग कर रहा है, जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि SIR पर बहस तभी होगी जब संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलने दी जाएगी। इस टकराव का सीधा प्रभाव विधायी कार्य पर पड़ा है, क्योंकि महत्वपूर्ण बिल और चर्चाएँ सूची में होने के बावजूद लगातार स्थगन और शोरगुल के कारण रुकी हुई थीं।
चुनाव सुधारों की बहस की तारीख तय होते ही राजनीतिक विश्लेषक इसे संसद सत्र के मोड़ बदलने वाला क्षण बता रहे हैं। कई विशेषज्ञ कह रहे हैं कि सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया है ताकि विपक्ष को नैतिक रूप से घेरा जा सके—कि अब जब बहस तय हो गई है, तो अगर विपक्ष हंगामा जारी रखता है, तो उसकी गंभीरता खुद कटघरे में खड़ी हो जाएगी। वहीं विपक्ष का दावा है कि बहस की घोषणा स्वागत योग्य है, लेकिन असली सवाल सरकार की नीयत का है—क्या वह वास्तव में सुधार चाहती है, या सिर्फ सियासी दबाव कम करने के लिए यह नाटक किया गया है?
देश की जनता भी इस बहस पर नजरें जमाए हुए है, क्योंकि चुनावी प्रक्रिया सीधे-सीधे हर नागरिक के अधिकार, विश्वास और लोकतांत्रिक भागीदारी से जुड़ी है। यदि बहस ईमानदार और व्यापक होती है, तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक मुकाम बन सकती है। लेकिन यदि यह सिर्फ शोर के बीच एक प्रतीकात्मक कार्रवाई रह गई, तो यह भी संसद की बाकी बहसों की तरह राजनीतिक ड्रामा बनकर रह जाएगी।
अब निगाहें बहस की तारीख पर टिक गई हैं—क्या संसद में रचनात्मक चर्चा होगी या फिर राजनीतिक टकराव एक बार फिर संवाद को निगल जाएगा? यह आने वाले दिनों में साफ हो जाएगा।




