ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026
चुनाव लोकतंत्र की सबसे बुनियादी प्रक्रिया है और मतदाता सूची उसकी पहली सीढ़ी। ऐसे में अगर मतदाता के नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें, तो मामला केवल एक राज्य या एक चुनाव तक सीमित नहीं रहता। सवाल सीधे चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पहुंच जाता है।
कर्नाटक में SIR के दौरान Form-7 के बड़े पैमाने पर दाखिल होने को लेकर विवाद अब इतना बढ़ गया है कि चुनाव अधिकारियों ने जांच के आदेश दिए हैं। यह घटनाक्रम कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के चुनाव अधिकारी के कार्यालय पर धरने और कार्रवाई की मांग के बाद सामने आया।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—अगर शिकायतें पहले से सामने आ रही थीं, तो चुनाव आयोग को जांच के लिए राजनीतिक दबाव और धरने का इंतजार क्यों करना पड़ा?
शिवकुमार ने कई विधानसभा क्षेत्रों में बड़ी संख्या में Form-7 आवेदन दाखिल किए जाने का मुद्दा उठाया। उन्होंने 22 से 24 सितंबर के बीच कुछ क्षेत्रों में असामान्य संख्या में आवेदन आने का दावा किया और आपराधिक जांच की मांग की।
अब कर्नाटक के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने सभी Electoral Registration Officers को निर्देश दिया है कि Form-6, 6A, 7 और 8 में जानबूझकर गलत बयान या घोषणा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
यानी सवाल अब सिर्फ राजनीतिक आरोप का नहीं रहा। आवेदनों की सत्यता और प्रक्रिया की जांच खुद चुनावी प्रशासन के सामने है।
सवाल सिर्फ Form-7 का नहीं
Form-7 अपने आप में कोई अवैध दस्तावेज नहीं है। कानून के तहत इसका इस्तेमाल मतदाता का नाम हटाने के अनुरोध के लिए किया जा सकता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब बड़ी संख्या में आवेदन संदिग्ध तरीके से दाखिल होने के आरोप सामने आएं।
खुद चुनाव आयोग ने पहले कर्नाटक के अलंद मामले में बताया था कि 6,018 Form-7 आवेदन मिले थे, जिनमें जांच के बाद 5,994 आवेदन गलत पाए गए और केवल 24 स्वीकार किए गए। आयोग के अनुसार इस मामले में FIR भी दर्ज हुई थी।
तो फिर सवाल और गंभीर हो जाता है—चुनावी सूची से किसी नागरिक का नाम हटाने की कोशिश करने वाले को रोकने की व्यवस्था कितनी मजबूत है?
लोकतंत्र में मतदाता सूची कोई सामान्य सरकारी रिकॉर्ड नहीं है। किसी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से हटना उसके सबसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार को प्रभावित कर सकता है।
जांच देर से क्यों?
यहां चुनाव आयोग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। आयोग को किसी राजनीतिक दल के दबाव में नहीं, बल्कि शिकायत सामने आते ही पारदर्शी तरीके से तथ्यों की जांच करनी चाहिए।
आज स्थिति यह है कि एक तरफ सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप चल रहे हैं, दूसरी तरफ मतदाता इस सवाल के साथ खड़ा है कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है या नहीं।
राजनीतिक आरोपों की सच्चाई जांच से ही सामने आएगी। लेकिन चुनाव आयोग की जिम्मेदारी उससे पहले शुरू होती है—हर शिकायत को समय पर सुनना, हर संदिग्ध आवेदन की जांच करना और हर पात्र मतदाता का नाम सुरक्षित रखना।
विश्वसनीयता बयान से नहीं, कार्रवाई से बनती है
चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है। उसकी सबसे बड़ी ताकत किसी राजनीतिक दल का समर्थन नहीं, बल्कि जनता का भरोसा है।
अगर किसी मामले में गड़बड़ी नहीं है तो जांच से वह साफ हो जाएगी। और अगर गड़बड़ी है तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। दोनों स्थितियों में पारदर्शी जांच ही चुनाव आयोग की विश्वसनीयता मजबूत कर सकती है।
लेकिन हर बार पहले शिकायतों को नजरअंदाज किया जाए, फिर विवाद बढ़े, सड़क पर प्रदर्शन हो और उसके बाद जांच शुरू हो—तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठेंगे।
चुनाव आयोग से सवाल पूछना लोकतंत्र के खिलाफ नहीं है। सवालों का जवाब देना ही लोकतंत्र की ताकत है।
कर्नाटक का Form-7 विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल कुछ हजार या कुछ लाख नामों का नहीं है। मामला उस भरोसे का है जिसके आधार पर नागरिक मानता है कि चुनाव में उसका वोट सुरक्षित है।
वोटर का नाम सूची में रहेगा या नहीं—इसका फैसला किसी राजनीतिक दल की ताकत, दबाव या आरोप से नहीं, बल्कि कानून, पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रक्रिया से होना चाहिए। और यही वह कसौटी है जिस पर आज चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता को परखा जा रहा है।



