महेंद्र सिंह । नई दिल्ली 2 दिसंबर 2025
कर्नाटक की राजनीति इन दिनों एक बार फिर हलचल के दौर से गुजर रही है। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उनके डिप्टी डी.के. शिवकुमार के बीच संभावित सत्ता परिवर्तन को लेकर पिछले सप्ताह से लगातार चर्चाएँ तेज़ थीं। इसी पृष्ठभूमि में दोनों नेताओं ने चार दिनों में दूसरी बार संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अपने राजनीतिक संबंधों में एकता का संदेश देने की कोशिश की। हालांकि उनके संयुक्त बयान के बीच भी यह स्पष्ट है कि कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के भीतर नेतृत्व को लेकर अंदरूनी तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इस मुलाक़ात का सबसे अहम हिस्सा सिद्धारमैया का वह बयान रहा, जिसमें उन्होंने कहा—“शिवकुमार तब मुख्यमंत्री बनेंगे, जब हाईकमान कहेगा।” यह टिप्पणी न सिर्फ मीडिया में चल रही अटकलों को हवा देती है बल्कि यह भी दर्शाती है कि राज्य के नेतृत्व का अंतिम फैसला अभी भी दिल्ली स्थित कांग्रेस आलाकमान पर निर्भर है।
सिद्धारमैया ने स्पष्ट किया कि वे और शिवकुमार दोनों पार्टी हाईकमान के बुलावे पर तुरंत दिल्ली जाने को तैयार हैं। उन्होंने राहुल गांधी, सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम लेते हुए कहा कि “राज्य का नेतृत्व कौन संभालेगा, यह निर्णय वे ही लेंगे और हम दोनों उसका पालन करेंगे।” यह बयान ऐसे समय आया है जब शिवकुमार के दिल्ली में अपने समर्थकों से मुलाक़ात करने और कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे की इच्छा जताने की खबरों ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया था। इसने राज्य के नेतृत्व में संभावित बदलाव की अटकलों को और तेज़ किया था।
दोनों नेताओं के बीच हाल की परस्पर मुलाक़ातें भी चर्चा का विषय रही हैं। शनिवार को जब डी.के. शिवकुमार ने मुख्यमंत्री को नाश्ते पर बुलाया था, उसे राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने ‘आइस-ब्रेकिंग मीटिंग’ बताया था। मंगलवार सुबह सिद्धारमैया की ओर से वापसी में शिवकुमार के घर नाश्ते पर जाना इस बात का संकेत माना गया कि दोनों नेता सतह पर एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि विरोधी दलों को कोई राजनीतिक मौका न मिले। जनता के बीच भेजा गया यह संदेश कि “हम भाई हैं और एकजुट हैं”, सत्ता की स्थिरता दिखाने का प्रयास माना जा रहा है।
पिछले महीने सिद्धारमैया के कार्यकाल के ढाई साल पूरे होने के साथ ही ‘रोटेशनल सीएम सिस्टम’ का दावा दोबारा चर्चा में आ गया। कांग्रेस के भीतर लंबे समय से यह कहा जा रहा था कि 2023 के विधानसभा चुनावों के बाद पार्टी ने सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच एक ढाई-ढाई साल का फॉर्मूला तय किया था। उस हिसाब से अब मुख्यमंत्री पद शिवकुमार को मिलना चाहिए। हालांकि कांग्रेस हाईकमान ने इस कथित समझौते की कभी सार्वजनिक पुष्टि नहीं की। फिर भी इत्मीनान से सत्ता संभाल रहे सिद्धारमैया के ढाई साल पूरा करते ही इस पर राजनीतिक बहस तेज़ हो गई और शिवकुमार कैंप के समर्थकों ने दिल्ली में डेरा डालना शुरू कर दिया।
सिद्धारमैया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी कहा कि कर्नाटक कांग्रेस के सभी विधायक एकजुट हैं और वे विपक्ष का सामना सामूहिक रूप से करेंगे। लेकिन राजनीतिक समीकरणों पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि यह एकजुटता सिर्फ दिखावे की हो सकती है, क्योंकि राज्य सरकार के कई फैसलों, खासकर विकास कार्यों और विभागीय नियुक्तियों में दोनों खेमों का असंतोष लंबे समय से सामने आता रहा है। सरकार के अंदर दो-शक्ति केंद्रों का होना प्रशासनिक स्तर पर भी चुनौती पैदा कर रहा है।
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार मई 2023 में बनी थी, और तब पार्टी ने सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री और डी.के. शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री बनाकर संतुलन साधने की कोशिश की थी। यह सत्ता-साझेदारी अब एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखती है। शिवकुमार का कद राज्य में बेहद मजबूत है और वित्तीय, जातीय तथा संगठनात्मक स्तर पर उनकी पकड़ पार्टी के लिए अनदेखी नहीं की जा सकती। दूसरी ओर, सिद्धारमैया का प्रशासनिक अनुभव, OBC समर्थन आधार और उनकी प्रतिष्ठा भी उन्हें पद पर मजबूती देती है। यही वजह है कि कांग्रेस हाईकमान के लिए फैसला आसान नहीं होने वाला।
कुल मिलाकर, कर्नाटक कांग्रेस का यह विवाद न केवल राज्य की राजनीति को प्रभावित कर रहा है बल्कि 2026 के लोकसभा-पूर्व राजनीतिक समीकरणों पर भी असर डाल सकता है। अब सबकी निगाहें कांग्रेस हाईकमान पर टिकी हुई हैं—क्या रोटेशनल सीएम फॉर्मूला लागू होगा, या सिद्धारमैया ही अपना पूरा कार्यकाल पूरा करेंगे? फिलहाल इतना साफ है कि कर्नाटक की सत्ता की असली चाभी बेंगलुरु में नहीं, बल्कि दिल्ली में है।




