सपना मुखर्जी | 30 अक्टूबर 2025
भारत — जहाँ प्रेम की गहराई को “कामसूत्र” ने शास्त्र का रूप दिया था, आज उसी धरती पर सेक्स एक ‘वर्जित शब्द’ बन चुका है। घर की चारदीवारी में यह “शर्म” का विषय है, स्कूलों में “अनुचित”, और समाज में “चरित्र का सवाल”। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जिस भावना से जीवन की शुरुआत होती है, उसी को सबसे ज़्यादा छिपाया जाता है?सेक्स कोई अश्लील क्रिया नहीं, बल्कि मनुष्य की जैविक, भावनात्मक और मानसिक ज़रूरत है — पर भारत में इसे या तो अपराध की तरह देखा जाता है या “संस्कार” के नाम पर कुचल दिया जाता है।
लोक लाज और संस्कारों का बोझ: इच्छा का अपराधीकरण
हमारे समाज में बचपन से सिखाया जाता है — “इस विषय पर बात नहीं करनी चाहिए।” किशोरावस्था आते ही जब शरीर और मन स्वाभाविक रूप से नई अनुभूतियों से गुजरते हैं, तब उन्हें दबाने की सीख दी जाती है। परिणाम — जिज्ञासा अपराध बन जाती है और इच्छा ‘पाप’।
यही बच्चा जब विवाह करता है, तो सेक्स उसके लिए आनंद नहीं, “कर्तव्य” बन जाता है। पत्नी के प्रति प्रेम की जगह दायित्व और पति के प्रति आकर्षण की जगह संकोच आ जाता है। इस असहजता के बीच रिश्ते पनपते नहीं — बस निभाए जाते हैं।
संयुक्त परिवार की दीवारें और निजीपन की कमी
भारतीय संयुक्त परिवार में प्रेम तो भरपूर है, पर प्राइवेसी का कोई अस्तित्व नहीं। एक घर में तीन-चार पीढ़ियाँ — और हर रिश्ते के बीच “संकोच की दीवारें”। पति-पत्नी के लिए शारीरिक या भावनात्मक निकटता के क्षण ढूंढना भी अपराध जैसा लगता है। “परिवार की इज़्ज़त” के डर से अपनी इच्छाओं को दबाने की परंपरा धीरे-धीरे आदत में बदल जाती है। परिणामस्वरूप, संबंधों में दूरी और असंतोष पनपता है। कई जोड़े उम्र के साथ “भावनात्मक सहजीवन” में तो रह जाते हैं, पर “शारीरिक संवाद” समाप्त हो जाता है।
एकाकी परिवारों में तनाव, थकान और रूटीन का बंधन
शहरों में अब संयुक्त परिवारों की जगह एकाकी परिवारों ने ली है, लेकिन समस्या खत्म नहीं हुई — उसने बस रूप बदला है। अब पति-पत्नी दोनों कामकाजी हैं, पर रिश्ते में थकान और तनाव घुस आया है। ऑफिस का दबाव, ट्रैफिक की झुंझलाहट, मोबाइल और सोशल मीडिया की आदी दिनचर्या — इन सबने रोमांस की जगह “रूटीन” को दे दी है। रात में शरीर थका हुआ, मन तनावग्रस्त — ऐसे में सेक्स अब प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि “ड्यूटी” बन जाता है। परिणाम वही — दूरी, असंतोष और अधूरी आत्मीयता।
छोटे घर, सीमित दीवारें — और खोती निजता
महानगरों के छोटे-छोटे फ्लैटों में रहने वाले दंपतियों के लिए “प्राइवेसी” अब विलासिता है। बच्चे की मौजूदगी, बुजुर्गों की निगरानी और पतली दीवारों के पार से आती पड़ोस की आवाज़ें — सब मिलकर माहौल को ‘संवेदनाहीन’ बना देती हैं। इन छोटी-छोटी असुविधाओं का असर बड़ा होता है — अंतरंगता का माहौल खत्म होता है, और धीरे-धीरे प्रेम का ताप ठंडा पड़ जाता है।
सेक्स को गलत समझना — संस्कृति बनाम मनोविज्ञान
भारतीय समाज ने सेक्स को या तो पाप बना दिया या मनोरंजन। सिनेमा इसे उत्तेजना का प्रतीक दिखाता है, जबकि समाज इसे लज्जा का कारण। बीच में गायब है — “सेक्स की समझ”। यदि सेक्स को एक स्वस्थ भावनात्मक और शारीरिक संवाद की तरह देखा जाए, तो यह जीवन में ऊर्जा, आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन लाता है। पर जब इसे “गलत” ठहराया जाता है, तो मन में अपराधबोध और तनाव का जाल बन जाता है। यही जाल धीरे-धीरे अवसाद, अनिद्रा और दांपत्य विफलता का कारण बनता है।
तनाव, बीमारी और मौन अवसाद: दबी इच्छाओं का परिणाम
दबी हुई इच्छाएं कभी शांत नहीं रहतीं — वे रास्ता निकाल ही लेती हैं। कभी चिड़चिड़ाहट बनकर, कभी निराशा या गुस्से के रूप में। मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि हार्मोनल असंतुलन, हाई ब्लड प्रेशर, सिरदर्द और यहां तक कि डिप्रेशन भी अक्सर यौन असंतुलन से जुड़ा होता है। पति-पत्नी के बीच संवाद की कमी, दूरी और अविश्वास बढ़ता है। धीरे-धीरे रिश्ता सिर्फ सामाजिक समझौता रह जाता है — बिना गर्मजोशी, बिना आत्मीयता।
खुलापन जरूरी है, अश्लीलता नहीं
सेक्स पर बात करना अश्लीलता नहीं, परिपक्वता है।
सेक्स कोई गंदा शब्द नहीं, बल्कि जीवन का वह आयाम है जो मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक संतुलन और रिश्तों की गहराई तय करता है। जैसे हम भोजन, नींद या व्यायाम को आवश्यक मानते हैं, वैसे ही सेक्स भी एक प्राकृतिक ज़रूरत है। जरूरत है, समाज में इसे सभ्यता और संवाद की भाषा में शामिल करने की — ताकि अगली पीढ़ी इसे समझे, न कि छिपाए।
शरीर नहीं, मन का संवाद है सेक्स
सेक्स केवल शरीरों का मिलन नहीं, बल्कि आत्माओं का संवाद है। यह दो लोगों के बीच भरोसे, अपनत्व और भावनात्मक सुरक्षा का विस्तार है। जब पति-पत्नी दोनों एक-दूसरे की थकान, तनाव और भावनाओं को समझते हैं, तभी उनका संबंध परिपक्व और गहरा बनता है।
लोक लाज और समाज की झूठी दीवारें इस प्राकृतिक जुड़ाव को कुचलती हैं — और फिर यही दबा हुआ प्रेम धीरे-धीरे उदासी में बदल जाता है।
नियमित सेक्स — शरीर और मन का स्वाभाविक उपचार
रेगुलर सेक्स न केवल आनंद देता है, बल्कि यह शरीर का प्राकृतिक ‘थेरेपी सिस्टम’ है। इससे एंडोर्फिन, ऑक्सीटोसिन और डोपामाइन जैसे हैप्पी हार्मोन्स निकलते हैं — जो तनाव घटाते हैं, नींद गहरी करते हैं और दिल की सेहत बेहतर रखते हैं। जो दंपति एक नियमित और आत्मीय यौन जीवन जीते हैं, वे अधिक खुश, आत्मविश्वासी और मानसिक रूप से स्थिर रहते हैं। शोध बताते हैं कि ऐसे लोगों का इम्यून सिस्टम भी बेहतर होता है — यानी सेक्स वास्तव में “जीवनशक्ति का स्रोत” है, न कि कोई अपराध।
शर्म नहीं, संवाद चाहिए
भारत को सेक्स पर नहीं, अपनी चुप्पी पर शर्म आनी चाहिए। सेक्स को दबाने से न समाज पवित्र बनता है, न व्यक्ति शांत। इसके विपरीत, संवाद, समझ और शिक्षा ही स्वस्थ यौन संस्कृति की नींव हैं। जब हम सेक्स को अपराध नहीं, अपनापन समझेंगे — जब हम इसकी चर्चा को खुलकर स्वीकारेंगे — तभी तनाव, कुंठा और बीमारियों से भरी ज़िंदगी की जगह प्रेम, सामंजस्य और संतुलन से भरा भारत गढ़ पाएँगे।




