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सऊदी अरब का 100 मील लंबा भविष्य का शहर ‘द लाइन’ अब छोटा होगा, मेगाप्रोजेक्ट पर लगी ब्रेक

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अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो 5 नवंबर 2025

सऊदी अरब द्वारा रेगिस्तान में 100 मील लंबा भविष्य का मेगासिटी बनाने की महत्वाकांक्षी योजना—जिसे द लाइन के नाम से दुनिया भर में प्रचारित किया गया था—अब बड़े पैमाने पर घटाई जा रही है। यह परियोजना देश की 2 ट्रिलियन डॉलर की पुनर्निर्माण रणनीति का अहम हिस्सा थी, जिसे क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान की विजन 2030 का चेहरा माना जाता रहा है। उद्देश्य था—तेल पर निर्भर अर्थव्यवस्था को रियल एस्टेट, टेक्नोलॉजी, पर्यटन और वैश्विक निवेश की ओर मोड़ना। लेकिन हाल ही में सरकार ने संकेत दिए हैं कि खर्च और बजट घाटे के दबाव में इस मेगाप्लान को पुनर्संतुलित करना जरूरी हो गया है।

“हमने बहुत तेजी दिखाई और ज़रूरत से ज़्यादा पैसा खर्च कर दिया,” रियाद में आयोजित एक निवेश सम्मलेन में एक वरिष्ठ सऊदी अधिकारी ने स्वीकार किया। उनके अनुसार, 100 मील प्रति घंटा की रफ्तार से भागते हुए अब देश घाटे में जा रहा है, इसलिए प्राथमिकताएँ बदलनी होंगी। यह खुलासा साबित करता है कि भविष्य की चमकदार कल्पना अब वास्तविक आर्थिक सीमाओं से टकरा गई है।

द लाइन को एक भविष्यवादी रेखीय शहर के रूप में विकसित किया जाना था—लाल सागर के तट के पास, रेगिस्तान के बीचों-बीच। कोई सड़क नहीं, कोई कार नहीं, कोई कार्बन उत्सर्जन नहीं—पूरा शहर 100% नवीकरणीय ऊर्जा पर चलता। लगभग 9 मिलियन की आबादी के लिए 200 मीटर चौड़ी, 500 मीटर ऊंची और 170 किलोमीटर लंबी एक सीधी नगरी—जिसके 95% हिस्से में प्रकृति को संरक्षित रखना था। यह दुनिया में शहरी बुनियादी ढांचे की परिभाषा ही बदल देने की महत्वाकांक्षा थी।

लेकिन कई वर्षों से यह प्रोजेक्ट समय पर आगे नहीं बढ़ सका। अनगिनत देरी, बढ़ती लागत और विस्थापन को लेकर आलोचनाएँ भी बढ़ीं। अब जो नया प्रस्ताव सामने आया है, वह मूल योजना का बहुत छोटा संस्करण है—जहाँ आबादी सिर्फ 3 लाख के आसपास होगी और शहर भी केवल कुछ मील तक सीमित रह जाएगा। यानि भविष्य का लंबा शहर अब आकार में बहुत ही छोटा रह जाने की संभावना है।

यह बदलाव केवल द लाइन तक सीमित नहीं है। नेओम प्रोजेक्ट के अंतर्गत कई अन्य योजनाएँ भी निर्धारित समय से पीछे हैं। फ्लोटिंग इंडस्ट्रियल हब ऑक्सागॉन, पहाड़ों में ट्रोज़ेना टूरिज्म प्रोजेक्ट, और लक्ज़री आइलैंड सिंदालाह — सभी या तो अधूरी हैं या समय से कई साल पीछे। कई इलाकों में स्थानीय समुदायों को हटाए जाने की वजह से मानवाधिकारों पर भी गंभीर सवाल उठे हैं।

विजन 2030 जब 2016 में शुरू हुआ था, तब तेल की कीमतें औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल थीं। लेकिन अब तेल लगातार उतार-चढ़ाव में है और सऊदी अर्थव्यवस्था का 50% हिस्सा अभी भी तेल पर निर्भर है। यही कारण है कि अब निवेश रणनीति को पुनर्निर्धारित कर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा सेंटर और हाइड्रोकार्बन आधारित ऊर्जा के साथ संतुलन बनाने की दिशा में काम हो रहा है। साथ ही 2034 फुटबॉल विश्व कप जैसे बड़े आयोजनों के लिए समयबद्ध परियोजनाओं पर भी भारी दबाव है।

PIF (पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड) के प्रमुख ने संकेत दिया है कि देश जल्द ही अपनी नई रणनीति दुनिया के सामने रखेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह परिवर्तन मेगा-ड्रीम्स से हटकर यथार्थवादी विकास नीति की ओर वापसी है।

भविष्य का यह रेगिस्तानी शहर भले ही अब अपनी पूरी लंबाई में न बन पाए, पर यह सऊदी की उस महत्वाकांक्षा का प्रतीक बना रहेगा जिसमें वह खुद को दुनिया के सामने एक हाई-टेक, पोस्ट-ऑयल सुपरकंट्री के रूप में पेश करना चाहता है। लेकिन फिलहाल कहानी यह है —

सपनों का शहर छोटा हो रहा है, ताकि वास्तविकता को जगह मिल सके।

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