अनिल यादव | 14 जनवरी 2026
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के संभल जिले में 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा के मामले में अब एक बड़ा और अहम मोड़ सामने आया है। चंदौसी स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) कोर्ट ने इस मामले में पुलिस कार्रवाई को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए तत्कालीन सर्किल ऑफिसर (CO) अनुज चौधरी, इंस्पेक्टर अनुज तोमर और कुल 12 पुलिसकर्मियों (कुछ रिपोर्टों में 15–20 अज्ञात पुलिसकर्मियों का भी जिक्र) के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया है। यह आदेश 9 जनवरी 2026 को पारित किया गया, जिसे न्यायिक प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
यह मामला पीड़ित युवक आलम से जुड़ा है, जिसकी ओर से उसके पिता यामीन ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यामीन, जो संभल के नखासा थाना क्षेत्र के मोहल्ला खग्गू सराय अंजुमन के निवासी हैं, उन्होंने 6 फरवरी 2025 को CJM कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में उन्होंने आरोप लगाया था कि हिंसा के दौरान उनके बेटे को पुलिस फायरिंग में गोली लगी, लेकिन इसके बावजूद न तो सही जांच की गई और न ही समय पर इलाज की व्यवस्था की गई।
याचिका के मुताबिक, 24 वर्षीय आलम हिंसा वाले दिन किसी प्रदर्शन या उपद्रव का हिस्सा नहीं था। वह रोज़ की तरह रस्क, टोस्ट और बिस्किट बेचने के लिए घर से निकला था। इसी दौरान वह शाही जामा मस्जिद क्षेत्र में पहुंच गया, जहां हालात बिगड़ चुके थे। आरोप है कि पुलिस की फायरिंग में आलम को गोली लग गई। परिवार का कहना है कि गिरफ्तारी और फर्जी मुकदमे के डर से उन्होंने उसका इलाज छुपकर कराया, जिससे उसकी हालत और मानसिक पीड़ा दोनों बढ़ीं।
यामीन की याचिका में यह भी कहा गया कि घटना के बाद पुलिस ने न तो घायल युवक को अस्पताल पहुंचाने में तत्परता दिखाई और न ही निष्पक्ष जांच की। कोर्ट ने मामले की प्रारंभिक सुनवाई और तथ्यों के आधार पर यह माना कि इसमें संज्ञेय अपराध बनता है। इसी आधार पर CJM कोर्ट ने संबंधित धाराओं में पुलिस अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया।
हालांकि, पुलिस प्रशासन ने कोर्ट के इस फैसले से असहमति जताई है। संभल के एसपी कृष्ण कुमार बिश्नोई ने कहा है कि इस हिंसा की पहले ही ज्यूडिशियल इंक्वायरी हो चुकी है, जिसमें पुलिस कार्रवाई को सही ठहराया गया था। उनका कहना है कि ऐसे में फिलहाल FIR दर्ज नहीं की जाएगी और CJM कोर्ट के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाएगी। पुलिस का दावा है कि हिंसा के दौरान हालात बेहद तनावपूर्ण थे और कार्रवाई कानून के दायरे में की गई थी।
संभल हिंसा के दौरान पुलिस फायरिंग में चार नागरिकों की मौत हुई थी, जबकि कई पुलिसकर्मी भी घायल हुए थे। यह घटना पहले से ही राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय रही है। अब CJM कोर्ट के इस आदेश के बाद मामला एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है और यह सवाल तेज हो गया है कि क्या पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच होगी और पीड़ित परिवार को न्याय मिल पाएगा। संभल हिंसा से जुड़ा यह आदेश न सिर्फ पीड़ित पक्ष के लिए एक बड़ी राहत माना जा रहा है बल्कि यह भी दर्शाता है कि न्यायपालिका पुलिस कार्रवाई की भी न्यायिक समीक्षा से पीछे नहीं हटती। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि उच्च न्यायालय इस मामले में क्या रुख अपनाता है और आगे की कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में जाती है।




