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डॉलर के सामने रुपये की दौड़ थमी — क्या 100 का आंकड़ा अब दूर नहीं?

नई दिल्ली, 30 अक्तूबर 

 भारतीय रुपये की गिरावट ने एक बार फिर आर्थिक विशेषज्ञों और निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ते असंतुलन, डॉलर की मजबूती और घरेलू आर्थिक दबावों के चलते यह सवाल अब गंभीरता से उठ रहा है कि क्या रुपया जल्द ही 100 के स्तर को छू सकता है?

पिछले छह महीनों में रुपये की कीमत में करीब 6% की गिरावट आई है। भारतीय मुद्रा की यह कमजोरी ऐसे समय में देखने को मिल रही है जब अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 10% तक मजबूत हो चुका है। विदेशी निवेशकों का रुझान उभरते बाजारों से हटकर विकसित देशों की ओर बढ़ गया है। भारत में भी विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) में गिरावट देखी गई है, जिससे पूंजी प्रवाह पर दबाव पड़ा है।

वैश्विक कारक और डॉलर का दबदबा

रुपये की गिरावट का एक बड़ा कारण अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की सख्त मौद्रिक नीति है। उच्च ब्याज दरों ने डॉलर को मजबूत बनाया है, जिससे भारत समेत कई देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है। अमेरिका, चीन और यूरोप की आर्थिक मंदी की आशंका ने भी निवेशकों को जोखिम से बचने की दिशा में धकेला है। इस कारण रुपये की मांग घट रही है, जबकि डॉलर की मांग तेज़ी से बढ़ी है।

घरेलू मोर्चे पर चुनौतियाँ

भारत की आर्थिक वृद्धि दर अभी भी स्थिर है, लेकिन चालू खाते के घाटे (Current Account Deficit) में वृद्धि, कच्चे तेल की ऊँची कीमतें और आयात में बढ़ोतरी ने रुपये पर असर डाला है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार असंतुलन के चलते डॉलर की मांग बढ़ी है जबकि निर्यात में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाती हैं तो रुपये पर और अधिक दबाव आएगा।

आरबीआई की रणनीति और सरकारी प्रयास

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) का उपयोग किया है। फिलहाल भारत के पास लगभग 640 अरब डॉलर का विदेशी भंडार है, लेकिन लगातार बाजार में हस्तक्षेप करने से यह धीरे-धीरे घट रहा है। वित्त मंत्रालय ने यह भी संकेत दिए हैं कि निर्यात को बढ़ावा देने और विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए नई नीतियाँ लाई जा सकती हैं।

विशेषज्ञों की राय

आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि रुपये की कमजोरी को लेकर अत्यधिक चिंता करने की जरूरत नहीं है। भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद अब भी मजबूत है। कृषि, उद्योग और सेवाओं के क्षेत्र में वृद्धि जारी है। हालांकि, अगर डॉलर इंडेक्स और मजबूत हुआ तो रुपया 100 के स्तर तक जा सकता है, लेकिन यह गिरावट अस्थायी रहेगी।

संतुलन की आवश्यकता

फिलहाल रुपये की स्थिति नाजुक जरूर है, पर नियंत्रण से बाहर नहीं। भारत को मजबूत निर्यात नीति, आत्मनिर्भर उत्पादन और ऊर्जा निर्भरता में कमी जैसे उपाय अपनाने होंगे। वैश्विक मंदी और भू-राजनीतिक तनाव के इस दौर में स्थायी आर्थिक वृद्धि ही रुपये को स्थिर रखने की सबसे बड़ी कुंजी है।

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