नई दिल्ली, 23 अक्टूबर 2025
चुनावी रेवड़ियों की सुनामी और संस्थागत रिश्वत का नया मॉडल
देश के आठ प्रमुख राज्यों में हालिया विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, सत्तारूढ़ सरकारों ने जनकल्याण योजनाओं की आड़ में ₹67,928 करोड़ की चौंकाने वाली विशाल राशि खर्च कर दी है। आर्थिक और नीति विश्लेषकों का कहना है कि यह खर्च अब केवल सामान्य ‘कल्याण’ नहीं रहा, बल्कि यह “जनता की जेब से निकली सियासी रेवड़ियों की सुनामी” है, जो चुनावी मौसम में सत्ता की मजबूती के लिए एक प्रलोभन भरी लहर बनकर बह रही है। इन आंकड़ों ने भारत की चुनावी राजनीति में एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है।
2023 के बाद से हुए हर चुनाव में, चाहे वह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) शासित राज्य हो या विपक्षी दल शासित, सत्ताधारी सरकारों ने ‘वोट से पहले वेलफेयर का तीर’ चलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। नीति विशेषज्ञों के अनुसार, इन योजनाओं के नाम पर देश में “संस्थागत रिश्वत (Institutionalized Bribery)” का एक नया और खतरनाक मॉडल उभर रहा है—जहाँ राजनीतिक दल जनता के टैक्स के पैसे का उपयोग करके सीधे-सीधे मतदाताओं के वोट खरीद रहे हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सीधा आघात है।
सबसे ज्यादा खर्च करने वाले राज्य: महाराष्ट्र, बिहार और महिला मतदाता का केंद्र
इस चुनावी खर्च की दौड़ में सबसे आगे रहे दो बड़े राज्य महाराष्ट्र और बिहार, जिन्होंने अपने वित्तीय संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा चुनावी सीजन में खपा दिया। महाराष्ट्र की महायुति सरकार ने विधानसभा चुनावों से पहले ₹23,300 करोड़ की भारी-भरकम राशि कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च की, जो राज्य के कुल टैक्स रेवेन्यू का 6.79% हिस्सा है। महाराष्ट्र में खासकर ‘माईलादी बहिन योजना’ जैसी महिला-केंद्रित नकद हस्तांतरण स्कीमें चुनाव से ठीक पहले शुरू की गईं।
महाराष्ट्र के बाद, दूसरे स्थान पर रहा बिहार, जहां तत्कालीन एनडीए (NDA) सरकार ने ₹19,333 करोड़ के प्री-पोल गिफ्ट्स दिए। यह राशि बिहार जैसे विकासशील राज्य के कुल टैक्स रेवेन्यू का चौंका देने वाला 32.48% हिस्सा है। बिहार में भी मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना और इसी तरह की अन्य नकद हस्तांतरण योजनाओं पर भारी खर्च किया गया
इस सूची में अन्य प्रमुख राज्य भी शामिल रहे: मध्य प्रदेश (BJP) ने ₹10,483 करोड़ (10.27%), राजस्थान (कांग्रेस) ने ₹6,247 करोड़ (5.47%), और झारखंड (JMM/INDIA) ने ₹5,615 करोड़ (15.95%) खर्च किए। इन सभी राज्यों में चुनावों से कुछ महीने पहले हुए इस भारी वित्तीय वितरण को विशेषज्ञ “संस्थागत रेवड़ीवाद” करार दे रहे हैं, जिसके कारण राज्यों के वित्तीय अनुशासन और दीर्घकालिक विकास योजनाओं पर गंभीर दबाव पड़ रहा है।
राजनीतिक विडंबना, व्यंग्य और लोकतंत्र पर गहराता प्रश्न
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं चुनावी मंचों से “रेवड़ी संस्कृति” को देश के आर्थिक भविष्य के लिए एक घातक राजनीतिक प्रवृत्ति बताकर उसकी कड़ी आलोचना करते रहे हैं।
हालांकि, ये आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि कई भाजपा-शासित राज्यों (जैसे महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश) ने भी चुनावों से पहले इसी उदार योजनाओं की बरसात की है, जो विपक्षी दलों द्वारा किए गए खर्च से कम नहीं है। विश्लेषकों का सीधा मत है कि “यह अब वास्तविक कल्याण नहीं, बल्कि वोटों की सीधी खरीद है।” इस चुनावी गणित में एक महत्वपूर्ण बदलाव यह आया है कि महिला मतदाता अब चुनावी परिणामों की नई धुरी बन चुकी हैं।
बिहार, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में शुरू की गईं नकद हस्तांतरण स्कीमें और महिला-केंद्रित वेलफेयर प्रोग्राम सीधे तौर पर चुनावी परिणामों को प्रभावित कर रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह चलन भारतीय लोकतंत्र के नैतिक ढांचे को कमजोर कर रहा है, जहाँ पहले पारदर्शिता, सुशासन और विकास की राजनीति को महत्व दिया जाता था, अब वहाँ ‘रेवड़ी प्रतिस्पर्धा’ का एक नया और खतरनाक दौर शुरू हो गया है।
इस नए दौर में हर राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए “सबसे ऊँची वेलफेयर बोली” लगाने की होड़ में शामिल है। ₹67,928 करोड़ की यह “वेलफेयर बारिश” अब केवल जनकल्याण नहीं रही—यह भारतीय लोकतंत्र पर एक गहरा प्रश्न बन चुकी है कि क्या हमारा लोकतंत्र अब वोटों की कीमत तय करने वाले एक ‘रेवड़ी बाजार’ में बदल गया है?




