एबीसी नेशनल न्यूज | 1 फरवरी 2026 | नई दिल्ली
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने केंद्रीय बजट 2026-27 पर तीखा हमला बोलते हुए इसे “थकी हुई और रिटायर हो चुकी सरकार का बजट” करार दिया। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार न तो जनता को पैसा देना चाहती है और न ही जो बजट आवंटित होता है, उसे ईमानदारी से खर्च करती है। गुड गवर्नेंस के बड़े-बड़े दावों के बावजूद आम आदमी की भलाई के लिए इस बजट में कोई ठोस कदम नहीं दिखता। खड़गे ने साफ शब्दों में कहा कि यह बजट जनता के किसी काम का नहीं है और इसलिए कांग्रेस इसे पूरी तरह खारिज करती है।
खड़गे ने कहा कि बजट की घोषणा के बाद शेयर बाजार का गिरना खुद इस बात का सबूत है कि सरकार की आर्थिक नीतियों पर भरोसा कमजोर पड़ा है। उनके मुताबिक सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है—यह बजट न गरीबों के हित में है, न युवाओं के भविष्य के लिए। महंगाई कैसे काबू में आएगी, रोजगार कैसे पैदा होंगे, इन बुनियादी सवालों पर बजट पूरी तरह खामोश है। उन्होंने कहा कि यह बजट सिर्फ पुराने ऐलानों की रिपीटेशन और रीसाइक्लिंग है, जबकि देश को इस वक्त नई सोच और नई दिशा की जरूरत थी।
कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि यह बजट भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों का समाधान देने के बजाय सवाल खड़े करता है। गरीब तबके के लिए इसमें कुछ भी ठोस नहीं है और महंगाई को कंट्रोल करने के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए गए। इकॉनमिक सर्वे खुद बताता है कि व्यापार में अनिश्चितता एक बड़ी चुनौती है, लेकिन बजट इस सच्चाई को स्वीकार करने से भी बचता दिखता है। रुपये की गिरावट से निपटने के लिए भी सरकार के पास कोई स्पष्ट योजना नहीं है।
खड़गे ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल संकट ठहरे हुए वेतन, कमजोर उपभोक्ता मांग और निजी निवेश में सुस्ती है, लेकिन बजट में उपभोक्ता मांग को गति देने का कोई रोडमैप नजर नहीं आता। बढ़ते कर्ज के बोझ पर भी सरकार ने आंखें मूंद ली हैं। शिक्षित युवाओं में फैलती बेरोजगारी के संकट पर बजट में एक शब्द नहीं है, जो सरकार की गंभीरता पर सवाल खड़े करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि वित्त आयोग की सिफारिशों का हवाला जरूर दिया जाता है, लेकिन गंभीर वित्तीय दबाव झेल रही राज्य सरकारों को इस बजट से कोई राहत नहीं मिलती दिख रही। देश में असमानता ब्रिटिश राज के दौर को भी पार कर चुकी है, फिर भी बजट में इसका जिक्र तक नहीं किया गया। SC-ST, पिछड़े वर्ग, EWS और अल्पसंख्यकों के लिए किसी तरह की ठोस सहायता या नई पहल का अभाव इस बजट की संवेदनहीनता को उजागर करता है।
कांग्रेस अध्यक्ष ने सरकार को यह भी याद दिलाया कि पिछले साल शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे अहम क्षेत्रों में पूरा आवंटित बजट तक खर्च नहीं किया गया। ‘सबका साथ, सबका विकास’ के नारे के बावजूद आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा का बजट न सिर्फ खर्च नहीं हुआ बल्कि पिछले साल के मुकाबले घटा भी दिया गया। वित्त मंत्री के भाषण में स्कूलों का जिक्र तक नहीं आया, न सामाजिक सुरक्षा और कल्याण को लेकर कोई घोषणा हुई। मनरेगा की जगह लाए गए नए कानून के बजट पर भी सरकार ने चुप्पी साधे रखी।
खड़गे ने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि यह बजट देश को आगे ले जाने वाला नहीं, बल्कि समस्याओं को और गहराने वाला है। जनता जिन सवालों के जवाब चाहती थी, यह बजट उन सभी सवालों से बचता हुआ नजर आया।




