नई दिल्ली 30 अक्टूबर
बिहार की चुनावी हवा में राहुल गांधी ने ऐसा तीर छोड़ा है, जो सीधे बीजेपी के दिल में जाकर लगा है। उनके हालिया भाषण और टिप्पणियाँ न केवल सत्ताधारी दल के नेताओं को असहज कर रही हैं, बल्कि तथाकथित “गोदी मीडिया” के गलियारों में भी हलचल मचा दी है। राहुल गांधी ने जिस आत्मविश्वास, सटीक भाषा और तर्क के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों पर सवाल उठाए हैं, उसने राजनीतिक विमर्श को नए सिरे से गरमा दिया है।
बिहार से उठी नई राजनीतिक धारा
बिहार, जहाँ चुनाव हमेशा जनभावनाओं और सामाजिक समीकरणों से तय होते हैं, वहाँ राहुल गांधी का यह आक्रामक तेवर विपक्षी एकजुटता के लिए नई ऊर्जा लेकर आया है। उन्होंने बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा और पलायन जैसे जमीनी मुद्दों को केंद्र में रखकर सीधा सवाल पूछा — “बीस साल में बिहार को क्या मिला?” यह सवाल सिर्फ नीतीश कुमार या बीजेपी सरकार के लिए नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के लिए भी है जो युवाओं की उम्मीदों से लगातार समझौता कर रही है।
बीजेपी नेताओं और गोदी मीडिया की छटपटाहट
राहुल गांधी के भाषण के बाद जिस तरह से बीजेपी नेताओं ने तुरंत पलटवार शुरू किया और गोदी मीडिया ने इसे “विवाद” में बदलने की कोशिश की, वह खुद इस बात का प्रमाण है कि तीर सही निशाने पर लगा है। जो मीडिया अब तक राहुल गांधी के हर बयान को हल्के में लेती थी, वह आज उनकी एक-एक बात पर “डिबेट” कर रही है। इसका मतलब साफ़ है — राहुल गांधी ने अब उस नर्व पर प्रहार किया है, जहाँ सत्ता और प्रचारतंत्र दोनों को दर्द महसूस होता है।
विपक्ष के लिए नयी रणनीतिक दिशा
राहुल गांधी का यह आक्रामक तेवर विपक्ष के लिए एक नई दिशा तय कर सकता है। उनकी भाषा अब सिर्फ आलोचना की नहीं, बल्कि जवाबदेही की मांग करती है। उन्होंने यह दिखा दिया है कि यदि विपक्ष अपने मुद्दों को सही ढंग से जनता तक पहुँचाए, तो बीजेपी का “इमेज मैनेजमेंट” मॉडल भी डगमगा सकता है।
जनता बनाम प्रचार: असली लड़ाई यहीं है
बिहार की जनता के सामने आज दो तस्वीरें हैं — एक, महंगाई और बेरोज़गारी से जूझता यथार्थ; दूसरी, टीवी पर दिखाया जाने वाला “विकास का तमाशा।” राहुल गांधी ने पहली तस्वीर को सामने लाकर जनता के मन की बात कही है। यही कारण है कि सत्ता और उसके समर्थक पत्रकारों के पेट में मरोड़ उठना स्वाभाविक है।
तीर सही निशाने पर लगा है
राहुल गांधी का यह हमला महज़ बयानबाज़ी नहीं, एक राजनीतिक संकेत है कि विपक्ष अब समझौते की नहीं, संघर्ष की राह पर है। बीजेपी और गोदी मीडिया की बेचैनी यह बताने के लिए काफी है कि यह तीर अब केवल चुनावी नहीं, वैचारिक लड़ाई का हिस्सा बन चुका है।
जब जवाब मिलता है, तो सच्चाई चुभती है
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने भाषणों में विपक्ष, खासकर राहुल गांधी, पर तीखे और व्यक्तिगत हमले करने से कभी नहीं चूकते। वे दूसरों पर व्यंग्य, तंज और कटाक्ष के तीर बरसाते रहते हैं — कभी “पप्पू” कहकर, कभी “नासमझ” बताकर। लेकिन जैसे ही कोई उनकी नीतियों, उनके झूठे वादों या उनकी राजनीति की सच्चाई पर सवाल उठाता है, तो ऊपर से लेकर नीचे तक पूरी पार्टी में बेचैनी फैल जाती है। मोदी जी के आलोचनात्मक जवाब का साहस दिखाने भर से बीजेपी नेताओं को सूई चुभ जाती है — मानो कोई अघोषित नियम हो कि प्रधानमंत्री पर सवाल उठाना “देशद्रोह” है। यही वह मानसिकता है जो लोकतंत्र की असली आत्मा — सवाल करने के अधिकार — को चोट पहुँचाती है।




