सुमन कुमार। नई दिल्ली 10 दिसंबर 2025
संसद के भीतर बुधवार का दिन चुनावी व्यवस्था, लोकतांत्रिक मूल्यों और पारदर्शिता पर तीखी बहस का दिन बन गया। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने लोकसभा में गृह मंत्री अमित शाह को सीधे कटघरे में खड़ा करते हुए कई गंभीर और ठोस सवाल उठाए—लेकिन आश्चर्यजनक रूप से शाह ने इन सवालों का एक भी सीधा जवाब नहीं दिया। विपक्ष के आरोपों और सत्ता पक्ष की सफाई के बीच सदन का माहौल असामान्य रूप से तनावपूर्ण रहा। राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने चुनाव की पारदर्शिता को लेकर जो मुद्दे उठाए थे, उन पर अमित शाह ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, बल्कि एकतरफा बचाव में समय बिताया। राहुल का कहना था—“आपने उनका चेहरा देखा होगा। वे मेरे सवालों का जवाब देने के बजाय सिर्फ अपना बचाव कर रहे थे।”
राहुल गांधी ने सदन में पाँच बेहद गंभीर प्रश्न रखे, जिनकी गूँज आज भी राजनीतिक गलियारों में सुनाई दे रही है। पहला—“हमें एक पारदर्शी वोटर लिस्ट दीजिए”, ताकि चुनाव की बुनियाद ही साफ-सुथरी रहे। दूसरा—“हमें EVM का पूरा आर्किटेक्चर बताइए”, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि मशीनें किसी बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित हैं या नहीं। तीसरा—राहुल ने आरोप लगाया कि “BJP के नेता हरियाणा और बिहार में खुलेआम दो-दो जगह वोट डाल रहे हैं”, और यह लोकतंत्र के लिए सीधा खतरा है। चौथा—उन्होंने कहा कि उनके प्रेस कॉन्फ्रेंस में ‘वोट चोरी’ के ठोस, दस्तावेज़ी सबूत मौजूद हैं। और पाँचवाँ—राहुल ने सवाल उठाया कि चुनाव आयुक्त को ‘फुल इम्यूनिटी’ क्यों दी जा रही है, और यह किस उद्देश्य से किया जा रहा है। ये सभी सवाल चुनावी सुधारों और लोकतंत्र की सुरक्षा के मूल मुद्दे हैं—but सदन में इनके जवाब नहीं आए।
राहुल गांधी ने बाद में प्रेस को बताया कि इन सबके बावजूद अमित शाह ने कोई प्रत्यक्ष जवाब नहीं दिया। “इतने गंभीर सवालों पर चुप्पी अपने आप में बहुत कुछ कहती है,” राहुल ने टिप्पणी की। उनका रुख साफ था—वे यह बताना चाहते थे कि देश का लोकतंत्र सवालों के घेरे में है और सत्ता पक्ष इन सवालों को टालने में लगा हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर सरकार के पास जवाब नहीं है, तो इसका मतलब है कि समस्या बहुत गहरी है और उसे छुपाया जा रहा है।
इस पूरे राजनीतिक तूफ़ान के बीच कांग्रेस महासचिव और सांसद प्रियंका गांधी ने भी अमित शाह की प्रतिक्रिया पर तीखी टिप्पणी की। प्रियंका ने कहा—“अमित शाह जी ने डेढ़ घंटे सिर्फ यही सफाई दी कि उन्होंने वोट चोरी नहीं की है। जो निर्दोष होता है, वो इतनी लंबी सफाई नहीं देता।” उनकी इस टिप्पणी ने बहस को और भी तेज़ कर दिया। प्रियंका गांधी का इशारा साफ था—लंबी सफाई का मतलब है कि आरोप कहीं न कहीं चुभ रहे हैं। उनका यह बयान सत्ता पक्ष की जवाबदेही पर सीधा हमला था और इसने राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया।
प्रियंका ने आगे कहा कि राहुल गांधी के सवाल न केवल तथ्यात्मक थे बल्कि लोकतंत्र की आत्मा को बचाने से जुड़े थे। “अगर सरकार सच में पारदर्शिता चाहती है तो राहुल जी ने जो सवाल उठाए हैं, उनके जवाब देना अनिवार्य है,” उन्होंने कहा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर चुनाव प्रक्रिया पर संदेह बढ़ा, तो इससे देश के लोकतांत्रिक ढांचे को भारी नुकसान होगा, जिसकी भरपाई करना मुश्किल होगा।
संसद में यह बहस सिर्फ एक दिन का राजनीतिक घटनाक्रम नहीं थी—यह आने वाले महीनों की राजनीतिक दिशा तय करने वाली बहस थी। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी दोनों ने जिस स्पष्टता और आक्रामकता के साथ सवाल उठाए, उससे विपक्ष का रुख बेहद मजबूत दिखाई दिया। वहीं अमित शाह की चुप्पी और सफाई ने इन सवालों को और भी गहरा बना दिया है।
देश अब यह जानना चाहता है—क्या सरकार इन गंभीर आरोपों का ठोस जवाब देगी या बहस को सफाई तक ही सीमित रखा जाएगा? लोकतंत्र की बुनियाद पर उठे इन सवालों का असर आने वाले दिनों में और गहराएगा।




