राज्य | ABC NATIONAL NEWS | पटना/बेगूसराय | 6 अगस्त 2026
बिहार की बीजेपी सरकार ने राज्य के 551 मॉडल स्कूलों की पहचान बदलने की बड़ी कवायद शुरू कर दी है। कक्षा 9 से 12 तक संचालित इन सरकारी मॉडल स्कूलों का नाम बदलकर ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ किया जा रहा है और उनकी बाहरी दीवारों को सरकार द्वारा निर्धारित ‘सनराइज’ रंग में रंगने का निर्देश दिया गया है। यह रंग भगवा रंग से काफी मिलता-जुलता है। यहीं से इस प्रशासनिक फैसले पर राजनीतिक सवाल भी खड़े हो रहे हैं—क्या सरकार सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था बदल रही है या उनकी वैचारिक पहचान? नाम में ‘सरस्वती’, दीवारों पर भगवा जैसा रंग और एक साथ राज्य के 551 विद्यालयों की ब्रांडिंग बदलने के फैसले को आलोचक शिक्षा के ‘भगवाकरण’ से जोड़कर देख सकते हैं। हालांकि इसे सीधे RSS के निर्देश पर उठाया गया कदम बताने का कोई तथ्य यहां सामने नहीं है, लेकिन नाम और रंग के चुनाव के कारण संघ-बीजेपी की वैचारिक छाप को लेकर बहस होना स्वाभाविक है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने शिक्षा मंत्री मिथिलेश तिवारी के साथ 19 जुलाई को बेगूसराय के बी.पी. इंटर स्कूल का दौरा किया था और इसी दौरान सभी मॉडल स्कूलों के नाम और रंग बदलने की घोषणा की थी। आदेश का असर अब जमीन पर दिखाई देने लगा है। बेगूसराय के बी.पी. इंटर स्कूल की बाहरी दीवारें ‘सनराइज’ रंग में रंगी जा चुकी हैं और ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ नाम वाले नए संकेतक भी लगाए गए हैं। लेकिन इस बदलाव की रफ्तार ने एक और सवाल खड़ा कर दिया है। सामने आई जानकारी के मुताबिक नए नाम की पॉलिमर प्लास्टिक शीट और दूसरे काम बेहद कम समय में कराए गए और लाखों रुपये खर्च होने की बात सामने आई है। यानी सरकार केवल स्कूलों का नाम नहीं बदल रही, नई पहचान को जमीन पर उतारने के लिए सरकारी संसाधन भी खर्च किए जा रहे हैं।
सबसे असहज सवाल खुद एक स्कूल के भीतर से आया है। बी.पी. इंटर स्कूल की प्रिंसिपल कामिनी कुमारी ने हैरानी जताई कि स्कूल को कुछ ही दिन पहले नए सिरे से रंगा गया था तो नई सरकार के निर्देश के बाद उसे दोबारा रंगने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? यही सवाल अब 551 स्कूलों के संदर्भ में बड़ा हो जाता है। जिन विद्यालयों की दीवारें पहले से ठीक हैं या हाल में पेंट हुई हैं, क्या सिर्फ सरकार द्वारा पसंद किया गया नया रंग चढ़ाने के लिए उन पर दोबारा सार्वजनिक धन खर्च करना जरूरी है? बिहार के सरकारी स्कूलों में कहीं शिक्षक चाहिए, कहीं बेहतर प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, कंप्यूटर, खेल सुविधाएं और बुनियादी ढांचे की जरूरत है। ऐसे में यदि अच्छी-भली दीवार पर केवल उसका रंग बदलने के लिए दोबारा सरकारी पैसा लगाया जा रहा है तो सरकार को यह भी बताना चाहिए कि इस पूरी कवायद की कुल लागत कितनी है और इससे बच्चों की पढ़ाई में क्या बदलाव आएगा।
मामला केवल रंग तक सीमित नहीं है। ‘मॉडल स्कूल’ से ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ किया गया नाम भी राजनीतिक और वैचारिक चर्चा को जन्म देता है। ‘सरस्वती’ भारतीय परंपरा में ज्ञान और विद्या की देवी हैं और इस नाम में अपने आप कोई विवाद नहीं है। सवाल इसलिए उठता है क्योंकि सरकार ने राज्य के एक-दो नहीं बल्कि सभी 551 मॉडल स्कूलों के लिए एक साथ यही नाम चुना है, और उसी के साथ भगवा से मिलता-जुलता एक निर्धारित रंग भी तय किया है। सरकारी शिक्षा संस्थानों की एक समान नई पहचान तैयार करने की इस कोशिश को इसलिए केवल सामान्य नामकरण मानकर छोड़ देना आसान नहीं होगा। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इसके पीछे कोई शैक्षणिक अवधारणा है, प्रशासनिक जरूरत है या महज नई राजनीतिक सरकार की अपनी पसंद।
इस फैसले की राजनीतिक आलोचना करते समय तथ्य और आरोप के बीच फर्क भी जरूरी है। यह तथ्य है कि मॉडल स्कूलों का नाम ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ करने और ‘सनराइज’ रंग में रंगने का निर्देश दिया गया है। यह भी सामने आया है कि निर्धारित रंग भगवा से मिलता-जुलता है। लेकिन इसे ‘RSS का आदेश’ या प्रत्यक्ष रूप से संघ द्वारा संचालित अभियान कहना तब तक स्थापित तथ्य नहीं होगा, जब तक उसके समर्थन में कोई सरकारी दस्तावेज या अन्य ठोस प्रमाण सामने न आए। इसके बावजूद सरकार से यह राजनीतिक सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि सार्वजनिक शिक्षा संस्थानों के लिए नाम और रंग चुनते समय ऐसी पहचान क्यों चुनी गई जो सत्तारूढ़ बीजेपी की व्यापक वैचारिक राजनीति से जुड़ी प्रतीत होती है।
बिहार की ‘डबल इंजन’ सरकार के सामने असली कसौटी स्कूलों की दीवारों का रंग नहीं बल्कि कक्षाओं के भीतर की शिक्षा है। किसी बच्चे का भविष्य इस बात से नहीं बदलेगा कि उसके स्कूल की दीवार सफेद है, नीली है या ‘सनराइज’। उसकी जिंदगी तब बदलेगी जब स्कूल में पर्याप्त शिक्षक होंगे, विज्ञान की प्रयोगशाला चलेगी, पुस्तकालय में किताबें होंगी, कंप्यूटर काम करेंगे, साफ शौचालय और पीने का पानी मिलेगा तथा पढ़ाई की गुणवत्ता ऐसी होगी कि सरकारी स्कूल का विद्यार्थी निजी स्कूल के विद्यार्थी से अवसरों की दौड़ में पीछे न रहे। यदि नाम और रंग बदलने के साथ सरकार इन बुनियादी क्षेत्रों में भी बड़ा निवेश करती है तो नई ब्रांडिंग का कोई व्यापक अर्थ निकल सकता है; लेकिन यदि बदलाव केवल दीवार और बोर्ड तक सीमित रहा तो सवाल उठेगा कि शिक्षा बदली या सिर्फ स्कूल का रंग?
सार्वजनिक धन का सवाल भी सरकार का पीछा करेगा। किसी नई सरकार को पिछली सरकार की योजनाओं की समीक्षा करने और प्रशासनिक बदलाव करने का अधिकार है, लेकिन लोकतंत्र में हर रुपये का हिसाब जनता के प्रति जवाबदेही से जुड़ा है। यदि कोई स्कूल चंद दिन पहले ही सरकारी पैसे से रंगा गया और अब उसी दीवार पर केवल नई सरकार की पसंद का रंग चढ़ाने के लिए फिर सरकारी पैसा खर्च हो रहा है तो यह सामान्य प्रशासनिक निर्णय भर नहीं रह जाता। जनता यह पूछ सकती है कि पहले की पेंटिंग पर कितना पैसा लगा, नई पेंटिंग पर कितना लगेगा और पूरे राज्य के 551 स्कूलों की रीब्रांडिंग की कुल लागत कितनी होगी।
अब सरकार के सामने एक सीधा सवाल है—बिहार के मॉडल स्कूलों को बेहतर बनाना प्राथमिकता है या उनका नाम और रंग बदलना? ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ नाम रखने से यदि विद्यालयों में ज्ञान की गुणवत्ता भी बेहतर होती है तो सबसे ज्यादा खुशी विद्यार्थियों और अभिभावकों को होगी। लेकिन यदि शिक्षक वही, सुविधाएं वही और समस्याएं वही रहें तथा केवल बोर्ड पर नया नाम और दीवार पर नया रंग दिखाई दे, तो यह शिक्षा सुधार कम और राजनीतिक ब्रांडिंग ज्यादा नजर आएगी।
बिहार के 551 मॉडल स्कूलों पर अब ‘सरस्वती विद्या निकेतन’ का नया नाम और ‘सनराइज’ रंग चढ़ना शुरू हो गया है, लेकिन इसके साथ एक बहस भी दीवारों से निकलकर सार्वजनिक क्षेत्र में आ गई है—सरकारी स्कूल सत्ता बदलने पर राजनीतिक पसंद के रंग में क्यों रंगे जाएं? और सबसे बड़ा सवाल वही है जो बेगूसराय की प्रिंसिपल की हैरानी से निकलता है: जब स्कूल कुछ दिन पहले ही रंगा गया था, तो जनता का पैसा खर्च करके उसे दोबारा रंगने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी?




