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अपने मुंह मियां मिट्ठू बना ‘गोदी आयोग’: ज्ञानेश कुमार का ‘बेमिसाल पारदर्शिता’ का दावा, विपक्ष पूछ रहा—इतने निष्पक्ष हैं तो बार-बार कठघरे में क्यों?

जैसे सत्ता के आगे नतमस्तक मीडिया के लिए ‘गोदी मीडिया’ शब्द चला, वैसे ही विपक्ष के आरोपों के बीच चुनाव आयोग पर चिपक रहा ‘गोदी आयोग’ का ठप्पा; राहुल गांधी से कांग्रेस, SP, TMC, RJD, DMK और शिवसेना तक उठा चुके निष्पक्षता पर सवाल—आयोग को आत्मप्रशंसा नहीं, अपने फैसलों और आंकड़ों से भरोसा जीतना होगा

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | 6 अगस्त 2026

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने चुनाव आयोग की पारदर्शिता को ‘बेमिसाल’ बताया है। लेकिन सवाल यह है कि किसी संवैधानिक संस्था को अपनी निष्पक्षता का प्रमाणपत्र खुद क्यों बांटना पड़ रहा है? जिस तरह सत्ता से सवाल पूछने के बजाय उसकी भाषा बोलने वाले मीडिया के एक हिस्से के लिए देश की राजनीतिक शब्दावली में ‘गोदी मीडिया’ शब्द पैदा हुआ, उसी तरह विपक्ष के लगातार आरोपों के बीच अब चुनाव आयोग के लिए भी ‘गोदी आयोग’ जैसी तीखी राजनीतिक उपमा इस्तेमाल होने लगी है। यह कोई न्यायिक निष्कर्ष नहीं, बल्कि आयोग के प्रति पैदा हुए गहरे राजनीतिक अविश्वास की अभिव्यक्ति है। और किसी भी संवैधानिक संस्था के लिए इससे ज्यादा चिंताजनक बात क्या होगी कि देश की प्रमुख विपक्षी पार्टियां उसके फैसलों को एक निष्पक्ष रेफरी के फैसले की तरह देखने के बजाय बार-बार यह आरोप लगाने लगें कि मैदान में खड़ा रेफरी सत्ता पक्ष की तरफ झुका हुआ है? ऐसे माहौल में ज्ञानेश कुमार का खुद अपनी संस्था को ‘बेमिसाल पारदर्शी’ बताना जख्म पर मरहम लगाने के बजाय अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने जैसा ज्यादा दिखाई देता है।

राहुल गांधी चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूचियों को लेकर लगातार गंभीर सवाल उठा चुके हैं। कांग्रेस के अलावा समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल, DMK और शिवसेना समेत कई विपक्षी दल अलग-अलग मौकों पर चुनाव आयोग के फैसलों, मतदाता सूचियों और उसकी कार्यप्रणाली को लेकर शिकायतें कर चुके हैं। चुनावी विवाद अदालतों तक भी पहुंचे हैं। यह जरूरी नहीं कि विपक्ष द्वारा लगाया गया प्रत्येक आरोप अपने आप सत्य हो जाए; लोकतंत्र में आरोप को प्रमाण की कसौटी पर ही परखा जाना चाहिए। लेकिन ठीक इसी कसौटी पर चुनाव आयोग की जिम्मेदारी भी तय होती है। जब देश का नेता प्रतिपक्ष आंकड़े और दस्तावेज लेकर सवाल उठा रहा हो, कई बड़े राजनीतिक दल निष्पक्षता पर संदेह व्यक्त कर रहे हों और विवाद न्यायपालिका तक पहुंच रहे हों, तब आयोग का काम यह कहना नहीं होना चाहिए कि ‘हमसे ज्यादा पारदर्शी कोई नहीं।’ उसका जवाब होना चाहिए—यह रहा पूरा रिकॉर्ड, यह रहा डेटा, यह रही प्रक्रिया; हमारे खिलाफ लगाए गए आरोपों को इन तथ्यों पर परख लीजिए।

असल संकट चुनाव आयोग पर लग रहे आरोपों से भी बड़ा है—यह विश्वास का संकट है। चुनाव आयोग भारत के लोकतंत्र का रेफरी है। रेफरी का काम केवल नियमों के अनुसार मैच पूरा करा देना नहीं होता; दोनों टीमों और दर्शकों को यह भरोसा भी होना चाहिए कि उसकी सीटी किसी खास टीम की जर्सी देखकर नहीं बजती। यदि हर बड़े चुनाव के आसपास विपक्ष आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए, मतदाता सूची को लेकर विवाद हो, कार्रवाई में कथित दोहरे मापदंड की शिकायतें आएं और फिर आयोग अपनी निष्पक्षता साबित करने के बजाय अपनी ही पीठ थपथपाता दिखाई दे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। किसी संस्था की निष्पक्षता का सबसे बड़ा प्रमाण उसका अपना बयान नहीं होता; उसका सबसे बड़ा प्रमाण यह होता है कि उसका सबसे कट्टर आलोचक भी उसके सामने रखे गए तथ्यों को आसानी से झुठला न सके।

यही कारण है कि ‘गोदी आयोग’ जैसा शब्द राजनीतिक विमर्श में जितना तीखा है, उतना ही चुनाव आयोग के लिए चेतावनी भी है। चुनाव आयोग वास्तव में किसी सरकार की ‘गोद’ में है—इसे स्थापित तथ्य की तरह नहीं लिखा जा सकता; इसके लिए ठोस प्रमाण और सक्षम संस्थागत निष्कर्ष चाहिए। लेकिन विपक्ष के बड़े हिस्से में यदि ऐसी धारणा बन रही है कि आयोग बीजेपी के प्रति नरम और विपक्ष के प्रति कठोर दिखाई देता है, तो उस धारणा को केवल ‘राजनीतिक आरोप’ कहकर कूड़ेदान में फेंक देना भी समाधान नहीं है। संवैधानिक संस्थाओं की साख केवल कानून की किताब से नहीं बनती, सार्वजनिक विश्वास से बनती है। अदालत को निष्पक्ष होना ही नहीं, निष्पक्ष दिखाई भी देना होता है; ठीक यही सिद्धांत चुनाव आयोग पर लागू होता है।

राहुल गांधी के आरोपों को ही कसौटी मान लीजिए। यदि उनके लगाए आरोप गलत हैं तो चुनाव आयोग के पास उन्हें राजनीतिक रूप से समाप्त करने का सबसे शक्तिशाली हथियार है—पूर्ण पारदर्शिता। राहुल गांधी ने जिस मतदाता सूची का सवाल उठाया, उसका सत्यापन योग्य डेटा सामने रखिए। जिस प्रक्रिया पर प्रश्न है, उसकी पूरी कार्यप्रणाली सार्वजनिक कीजिए। जिन आंकड़ों को लेकर आरोप हैं, उनके मूल रिकॉर्ड उपलब्ध कराइए। प्रत्येक प्रश्न का क्रमवार उत्तर दीजिए। जहां गोपनीयता या कानून बाधा नहीं बनता वहां डेटा को स्वतंत्र विशेषज्ञों और राजनीतिक दलों के परीक्षण के लिए खोल दीजिए। यदि आरोप झूठे निकलेंगे तो विपक्ष की विश्वसनीयता गिरेगी और चुनाव आयोग की बढ़ेगी। लेकिन यदि जवाब के बदले केवल यह सुनने को मिले कि आयोग दुनिया में सबसे पारदर्शी है, तो प्रश्न खत्म होने के बजाय और बड़ा होगा—यदि सब कुछ इतना साफ है तो दिखाने में परेशानी क्या है?

Special Intensive Revision यानी SIR का पैमाना ही इस जवाबदेही की आवश्यकता बताता है। ज्ञानेश कुमार के मुताबिक लगभग 70 करोड़ मतदाताओं से जुड़ी प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और करीब 35 करोड़ अन्य मतदाताओं का सत्यापन चल रहा है। यह कोई मामूली सरकारी फाइल नहीं है। मतदाता सूची में किसी नागरिक का नाम उसके लोकतांत्रिक अधिकार से जुड़ा है। एक गलत नाम जुड़ना चुनावी शुचिता का सवाल है और किसी वैध मतदाता का नाम गलत तरीके से कटना उसके सबसे बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार पर चोट हो सकती है। ऐसे में विपक्ष यदि पूछता है कि नाम किस आधार पर जोड़े और हटाए गए, सत्यापन कैसे हुआ, कौन से दस्तावेज स्वीकार हुए और शिकायत का निवारण कैसे होगा, तो आयोग को इन प्रश्नों का स्वागत करना चाहिए। जितनी बड़ी प्रक्रिया, उतनी बड़ी पारदर्शिता—यही लोकतंत्र का सामान्य सिद्धांत होना चाहिए।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों की राजनीति में चुनाव आयोग और विपक्ष का रिश्ता ऐसा बनता दिखाई दिया है जिसमें शिकायत आते ही दोनों पक्ष आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है। चुनाव आयोग विपक्ष का विरोधी नहीं है और विपक्ष आयोग का दुश्मन नहीं होना चाहिए। विपक्ष का काम सत्ता और संस्थाओं से सवाल पूछना है; आयोग का काम उन सवालों का निष्पक्ष उत्तर देना है। यदि अखिलेश यादव की पार्टी शिकायत करती है, ममता बनर्जी की पार्टी आरोप लगाती है, कांग्रेस डेटा मांगती है, RJD या DMK चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं या कोई दल अदालत पहुंचता है, तो आयोग को इसे अपनी प्रतिष्ठा पर हमला समझने के बजाय अपनी निष्पक्षता प्रदर्शित करने का अवसर मानना चाहिए। जो संस्था वास्तव में निष्पक्ष है, उसे जांच से डर कैसा और सवाल से परेशानी क्यों?

ज्ञानेश कुमार के बयान की विडंबना यहीं है। पारदर्शिता का सबसे सुंदर गुण यह है कि उसे अपनी तारीफ करने की जरूरत नहीं पड़ती। शीशा साफ हो तो सामने वाला खुद देख लेता है कि उसके पार क्या है। बार-बार यह बताना कि ‘हम बहुत पारदर्शी हैं’, ‘हमारी व्यवस्था बेमिसाल है’, उस समय अटपटा लगता है जब बाहर खड़े राजनीतिक दल उसी शीशे पर धुंध होने की शिकायत कर रहे हों। ऐसे में चुनाव आयोग को विशेषण कम और दस्तावेज ज्यादा देने चाहिए। आत्मप्रशंसा कम, सार्वजनिक जवाब ज्यादा। प्रेस वक्तव्य कम, सत्यापन योग्य डेटा ज्यादा। क्योंकि लोकतंत्र में विश्वसनीयता प्रचार से नहीं, व्यवहार से अर्जित होती है।

और यही वह जगह है जहां ‘गोदी मीडिया’ और ‘गोदी आयोग’ की राजनीतिक तुलना सामने आती है। ‘गोदी मीडिया’ शब्द इसलिए लोकप्रिय हुआ क्योंकि आलोचकों ने मीडिया के एक हिस्से पर आरोप लगाया कि वह सरकार से प्रश्न पूछने के बजाय विपक्ष से प्रश्न करता है, सत्ता की जवाबदेही तय करने के बजाय सत्ता के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। चुनाव आयोग को हर कीमत पर इस धारणा से बचना होगा कि वह भी सत्ता के लिए सहज और विपक्ष के लिए कठोर रेफरी बन रहा है। मीडिया की विश्वसनीयता गिरने पर एक चैनल या अखबार का नुकसान होता है; लेकिन चुनाव आयोग की विश्वसनीयता गिरने पर लोकतंत्र की चुनावी नींव प्रभावित होती है। इसलिए आयोग पर जिम्मेदारी कहीं ज्यादा बड़ी है।

यहां एक बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को ‘भ्रष्ट’ कहना तब तक स्थापित तथ्य नहीं है जब तक किसी सक्षम जांच या अदालत ने भ्रष्टाचार सिद्ध न किया हो। विपक्ष उन्हें पक्षपाती बताता है, उनकी भूमिका पर गंभीर सवाल उठाता है और आयोग पर बीजेपी के पक्ष में झुकाव के आरोप लगाता है—इन राजनीतिक आरोपों को उसी रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। लेकिन आरोप जितने गंभीर हैं, चुनाव आयोग से अपेक्षित उत्तर भी उतना ही गंभीर होना चाहिए। संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को आलोचना से ऊपर नहीं रखा जा सकता। उलटे पद जितना बड़ा है, जांच और जवाबदेही की कसौटी उतनी ही कठोर होनी चाहिए।

चुनाव आयोग को समझना होगा कि उसकी सबसे मूल्यवान संपत्ति EVM नहीं है, उसका विशाल प्रशासनिक तंत्र नहीं है, लाखों चुनाव कर्मचारी नहीं हैं और न ही उसकी संवैधानिक शक्तियां हैं। उसकी सबसे बड़ी पूंजी जनता का भरोसा है। यदि मतदाता को भरोसा है कि उसका वोट सुरक्षित है, उसका नाम मतदाता सूची में निष्पक्ष तरीके से दर्ज है और उसका वोट उसी रूप में गिना जाएगा जिस रूप में उसने दिया है, तभी लोकतंत्र जीवित है। जिस दिन मतदाता के मन में यह संदेह बैठ गया कि रेफरी किसी एक खिलाड़ी के ज्यादा करीब है, उस दिन चुनाव परिणाम भले कानूनी रूप से वैध हो, उसकी नैतिक विश्वसनीयता पर राजनीतिक विवाद पैदा होना तय है।

इसलिए ज्ञानेश कुमार को अपनी संस्था के लिए प्रमाणपत्र लिखने की जरूरत नहीं है। चुनाव आयोग का असली प्रमाणपत्र भारत का मतदाता लिखेगा। यदि आयोग सचमुच ‘बेमिसाल पारदर्शी’ है तो राहुल गांधी के हर सवाल का डेटा से जवाब दीजिए, SP-TMC-RJD-DMK और दूसरे दलों की शिकायतों को सार्वजनिक रिकॉर्ड पर निपटाइए, विवादित फैसलों का तर्क बताइए और जहां जरूरत हो स्वतंत्र जांच तथा न्यायिक समीक्षा का खुले मन से सामना कीजिए। फिर किसी को चुनाव आयोग को ‘गोदी आयोग’ कहने की राजनीतिक जमीन ही नहीं मिलेगी।

लेकिन यदि सवाल बढ़ते रहें और जवाब की जगह आत्मप्रशंसा सुनाई देती रहे, तो यह ठप्पा भाषण देकर नहीं मिटेगा। रेफरी को खुद चिल्लाकर यह नहीं बताना पड़ता कि वह निष्पक्ष है—उसकी सीटी, उसके फैसले और दोनों टीमों के लिए एक जैसे नियम खुद बोलते हैं। चुनाव आयोग भी यही करके अपनी प्रतिष्ठा बचा सकता है। वरना ‘बेमिसाल पारदर्शिता’ के दावे के बीच देश पूछता रहेगा—आयोग इतना पाक-साफ है, तो उसकी निष्पक्षता पर बार-बार इतना बड़ा सवाल आखिर खड़ा क्यों हो रहा है?

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