ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/बेंगलुरु | 20 जून 2026
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियांग खड़गे द्वारा उठाए गए सवाल अब केवल राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रह गए हैं। मामला एक बड़े संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रश्न में बदलता दिखाई दे रहा है—क्या देश के सबसे प्रभावशाली संगठनों में शामिल RSS को भी वही पारदर्शिता और जवाबदेही स्वीकार करनी चाहिए, जो अन्य सामाजिक, धार्मिक और गैर-सरकारी संस्थाओं पर लागू होती है?
प्रियांग खड़गे ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को लिखे पत्र में पूछा है कि RSS की कानूनी स्थिति क्या है, उसका संगठनात्मक ढांचा क्या है, वह किस व्यवस्था के तहत संचालित होता है और उसके वित्तीय स्रोत क्या हैं। सवाल यह भी है कि यदि संघ सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक और सार्वजनिक जीवन के इतने बड़े हिस्से को प्रभावित करता है, तो उसकी संस्थागत जवाबदेही का ढांचा क्या है?
यह बहस इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि RSS आज केवल एक वैचारिक संगठन भर नहीं माना जाता। उसके स्वयंसेवक देश के प्रधानमंत्री से लेकर अनेक केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और सार्वजनिक संस्थाओं में प्रभावशाली भूमिकाओं में दिखाई देते हैं। संघ से प्रेरित या उससे जुड़े संगठनों का विशाल नेटवर्क शिक्षा, सेवा, श्रमिक, छात्र, किसान, महिला और आदिवासी क्षेत्रों तक फैला हुआ है।
यहीं से मूल प्रश्न शुरू होता है। भारत में कोई भी ट्रस्ट, सोसायटी, एनजीओ या धार्मिक संस्था कानूनी ढांचे के भीतर पंजीकृत होती है। उसे आय-व्यय का हिसाब रखना पड़ता है, ऑडिट कराना पड़ता है और विभिन्न नियामक संस्थाओं को जवाब देना पड़ता है। लेकिन RSS की केंद्रीय कानूनी संरचना को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है।
संघ के समर्थक कहते हैं कि RSS कोई कंपनी या कॉरपोरेट संस्था नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों का सांस्कृतिक संगठन है। उसकी शाखाएं खुले मैदानों में लगती हैं, उसके कार्यक्रम सार्वजनिक होते हैं और उसका काम किसी से छिपा नहीं है। उनका तर्क है कि पारदर्शिता केवल कागजी पंजीकरण से नहीं, बल्कि सार्वजनिक गतिविधियों से भी साबित होती है।
दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि जब किसी संगठन का प्रभाव राष्ट्रीय नीति, शिक्षा, राजनीति और सार्वजनिक संस्थाओं तक पहुंचता है, तब केवल वैचारिक या सांस्कृतिक पहचान पर्याप्त नहीं होती। लोकतंत्र में प्रभाव जितना बड़ा होता है, जवाबदेही की अपेक्षा भी उतनी ही अधिक होती है।
दिलचस्प बात यह है कि विदेशों में संघ से जुड़े कई संगठन स्थानीय कानूनों के तहत बाकायदा पंजीकृत संस्थाओं के रूप में काम करते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में उन्हें वित्तीय और प्रशासनिक विवरण संबंधित एजेंसियों को उपलब्ध कराने पड़ते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि भारत में इसी तरह की पारदर्शिता की मांग को राजनीतिक हमला क्यों माना जाता है?
इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू वित्तीय जवाबदेही भी है। देशभर में संघ से जुड़े विद्यालय, सेवा संस्थान, प्रशिक्षण केंद्र और अन्य परिसंपत्तियां मौजूद हैं। लाखों स्वयंसेवक हर वर्ष विभिन्न माध्यमों से आर्थिक योगदान भी देते हैं। ऐसे में यह जानना लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा है कि इन संसाधनों का संचालन किस व्यवस्था के तहत होता है और उनका लेखा-जोखा किस प्रकार रखा जाता है।
हालांकि यह भी उतना ही सच है कि किसी संगठन को केवल राजनीतिक मतभेद के आधार पर कठघरे में खड़ा करना भी उचित नहीं होगा। यदि सवाल उठते हैं तो उनका जवाब तथ्यों और संस्थागत प्रक्रियाओं के आधार पर दिया जाना चाहिए। लोकतंत्र में किसी भी संस्था की विश्वसनीयता सवालों से भागने में नहीं, बल्कि उनका उत्तर देने में बढ़ती है।
असल मुद्दा RSS के पक्ष या विपक्ष का नहीं है। मुद्दा यह है कि क्या भारत में कानून और पारदर्शिता के मानदंड सभी पर समान रूप से लागू होंगे? यदि जवाबदेही लोकतंत्र की बुनियादी शर्त है, तो यह अपेक्षा देश की सबसे प्रभावशाली संस्थाओं से भी स्वाभाविक रूप से की जाएगी।
आखिर लोकतंत्र में ताकत का सबसे बड़ा प्रमाण प्रभाव नहीं, बल्कि जवाबदेही होती है। और जवाबदेही की शुरुआत पारदर्शिता से होती है।




