राजनीति/ दिल्ली | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 सितंबर 2026
सोनिया गांधी की पुरानी मतदाता सूची में एंट्री को लेकर चल रहा मामला एक बार फिर अदालत पहुंच गया है। दिल्ली की एक अदालत ने सोमवार को उस मजिस्ट्रेट आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सोनिया गांधी का नाम भारतीय नागरिकता हासिल करने से पहले मतदाता सूची में शामिल होने के आरोप की जांच कराने से इनकार कर दिया गया था। अदालत के इस फैसले के बाद अब इस शिकायत पर आगे कानूनी प्रक्रिया का रास्ता खुल गया है।
मामला उस शिकायत से जुड़ा है जिसमें अधिवक्ता विकास त्रिपाठी ने आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी का नाम 1980 की दिल्ली की मतदाता सूची में दर्ज था, जबकि उन्होंने भारतीय नागरिकता 30 अप्रैल 1983 को हासिल की थी। शिकायत में सवाल उठाया गया था कि अगर नागरिकता 1983 में मिली तो उससे पहले 1980 की मतदाता सूची में नाम किस आधार पर दर्ज हुआ और उस समय कौन से दस्तावेज इस्तेमाल किए गए थे। शिकायतकर्ता ने इस मामले में पुलिस जांच और FIR दर्ज करने की मांग की थी।
यह मामला नया नहीं है। सितंबर 2025 में मजिस्ट्रेट अदालत ने शिकायत को खारिज करते हुए FIR दर्ज कराने से इनकार कर दिया था। उस समय अदालत ने कहा था कि शिकायत में कथित धोखाधड़ी और जालसाजी के अपराधों के जरूरी तत्व पर्याप्त रूप से सामने नहीं रखे गए हैं। अदालत ने यह भी कहा था कि शिकायतकर्ता जिस 1980 की मतदाता सूची पर निर्भर कर रहा था, वह प्रमाणित मूल रिकॉर्ड नहीं बल्कि एक फोटोकॉपी की फोटोकॉपी थी।
मजिस्ट्रेट अदालत के उस फैसले के खिलाफ विकास त्रिपाठी ने दिल्ली की Rouse Avenue अदालत में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की। अब Special Judge Vishal Gogne ने उस पुराने आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने मजिस्ट्रेट के आदेश को “non-speaking” माना, यानी अदालत के मुताबिक उसमें शिकायत के मूल सवाल पर पर्याप्त कारण और स्पष्ट विचार दर्ज नहीं किए गए थे।
यहां अदालत की टिप्पणी बेहद महत्वपूर्ण है। Special Judge Vishal Gogne ने कहा कि मजिस्ट्रेट को सबसे पहले यह देखना चाहिए था कि शिकायत में किसी cognisable offence के होने का खुलासा होता है या नहीं। इसके बजाय निचली अदालत नागरिकता के सवाल की तरफ चली गई। यानी इस स्तर पर अदालत ने यह फैसला नहीं दिया है कि सोनिया गांधी ने कोई अपराध किया था या 1980 की मतदाता सूची में उनकी एंट्री अवैध थी। अदालत ने केवल उस आदेश को पलटा है जिसमें शिकायत पर जांच से इनकार किया गया था।
अब आगे की कानूनी प्रक्रिया में यही सवाल महत्वपूर्ण होगा कि 1980 की मतदाता सूची में नाम दर्ज होने का वास्तविक रिकॉर्ड क्या है, उस समय नाम दर्ज करने के लिए कौन से दस्तावेज उपलब्ध थे और शिकायत में लगाए गए आरोपों की जांच के लिए कानूनी आधार बनता है या नहीं। India Today की रिपोर्ट के मुताबिक अगली सुनवाई 29 सितंबर को होनी है और शिकायतकर्ता को मजिस्ट्रेट अदालत के सामने FIR की मांग वाली शिकायत दोबारा रखने का रास्ता दिया गया है।
इस मामले में एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू भी है। पिछले साल जब मजिस्ट्रेट अदालत ने शिकायत खारिज की थी, तब अदालत ने नागरिकता से जुड़े सवालों को अलग तरीके से देखा था। उसके आदेश में कहा गया था कि नागरिकता से जुड़े प्रश्नों पर फैसला संबंधित वैधानिक और संवैधानिक व्यवस्था के तहत होता है और मतदाता सूची में किसी व्यक्ति की पात्रता तय करने का अधिकार निर्वाचन व्यवस्था के अंतर्गत आता है। अब पुनरीक्षण अदालत ने यह देखा कि शिकायत पर आपराधिक जांच के सवाल को उसी आधार पर बिना पर्याप्त कारण बताए खारिज नहीं किया जा सकता था।
इस पूरे मामले का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ गया है क्योंकि यह ऐसे समय सामने आया है जब दिल्ली में मतदाता सूची को लेकर SIR की प्रक्रिया पहले से ही बहस के केंद्र में है। दिल्ली में लाखों मतदाताओं के रिकॉर्ड में ‘unmapped’ या अन्य विसंगतियां मिलने के बाद नोटिस जारी किए गए हैं। इनमें केंद्रीय मंत्री एस जयशंकर, मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कई अन्य प्रमुख लोगों के नाम भी सामने आए हैं। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि SIR नोटिस मिलने का मतलब अपने आप मतदाता सूची से नाम हटना नहीं है और संबंधित व्यक्ति को दस्तावेज देने तथा अपना पक्ष रखने का अवसर मिलता है।
इसी पृष्ठभूमि में सोनिया गांधी से जुड़ा पुराना मतदाता सूची विवाद फिर अदालत में सक्रिय होना चुनावी रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर चल रही बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है। एक तरफ लाखों वर्तमान मतदाताओं के रिकॉर्ड की जांच हो रही है, दूसरी तरफ दशकों पुराने मतदाता रिकॉर्ड को लेकर अदालत में सवाल उठ रहे हैं। दोनों मामलों की कानूनी प्रकृति अलग है, लेकिन दोनों में एक समान सवाल जरूर दिखाई देता है—मतदाता सूची में दर्ज किसी व्यक्ति के नाम का आधार क्या था और उस रिकॉर्ड की प्रमाणिकता कैसे सुनिश्चित की जाती है।
हालांकि इस पूरे मामले में यह स्पष्ट रहना चाहिए कि दिल्ली कोर्ट के सोमवार के फैसले ने सोनिया गांधी के खिलाफ कोई अपराध सिद्ध नहीं किया है। अदालत ने सिर्फ मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द किया है जिसमें शिकायत पर जांच से इनकार किया गया था। अब शिकायत में लगाए गए आरोपों की कानूनी जांच और आगे की प्रक्रिया तय होगी। यही अंतर इस मामले को समझने में सबसे जरूरी है।
सोनिया गांधी की 1980 की मतदाता सूची में एंट्री और 1983 में भारतीय नागरिकता हासिल करने के बीच का सवाल अब एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया के सामने है। अदालत ने जांच से इनकार करने वाला आदेश पलट दिया है, लेकिन आरोपों को सही या गलत ठहराने का फैसला अभी नहीं हुआ है। अब असली महत्व दस्तावेजों, मूल मतदाता रिकॉर्ड और आगे होने वाली कानूनी जांच का है। अदालत में सवाल फिर खुल गया है—1980 में नाम कैसे दर्ज हुआ, किस आधार पर दर्ज हुआ और उस रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति क्या थी? इन सवालों का जवाब अब दस्तावेज और कानून की प्रक्रिया से सामने आना है।



