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इंदिरा गांधी की विदेश नीति पर गर्व — राहुल गांधी के बयान से गूंजा पुराना गौरव

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नई दिल्ली, 31 अक्टूबर 2025

 जब 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, तो सिर्फ भारत ही नहीं, पूरा विश्व शोक में डूब गया था। ग़ाज़ा में घरों में चूल्हे नहीं जले, ईरान और इराक में मातम का माहौल था, और फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात फूट-फूट कर रो पड़े थे। उन्होंने कहा था — “मेरी बहन चली गई।” यह सिर्फ एक भारतीय प्रधानमंत्री की मौत पर दुख नहीं था, बल्कि उस नेता के खोने का दर्द था जिसने तीसरी दुनिया के देशों को आवाज़ दी थी। यह था भारत के सम्मान और इंदिरा गांधी की विदेश नीति की ऊँचाई का प्रमाण।

आज जब राहुल गांधी ने अपने भाषण में इंदिरा गांधी का ज़िक्र किया, तो वह केवल पारिवारिक श्रद्धांजलि नहीं थी। वह उस विदेश नीति पर गर्व का बयान था, जिसने भारत को दुनिया की नज़रों में एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और न्यायप्रिय देश के रूप में स्थापित किया था। राहुल गांधी ने याद दिलाया कि कैसे उनकी दादी ने उस दौर में भी विश्व राजनीति में भारत की नैतिक और सांस्कृतिक पहचान को जिंदा रखा, जब महाशक्तियाँ दो धड़ों में बंटी हुई थीं।

इंदिरा गांधी ने कभी यासिर अराफात को आतंकवादी नहीं, बल्कि स्वतंत्रता सेनानी माना था। उन्होंने ईरान से सिर्फ तेल का रिश्ता नहीं बनाया, बल्कि संस्कृति, साहित्य और सभ्यता का आदान-प्रदान किया। उन्होंने इराक से व्यापारिक समझौते ही नहीं, बल्कि भरोसे और बराबरी का रिश्ता कायम किया। यही कारण था कि 1971 में जब पूरा पश्चिमी जगत भारत के खिलाफ खड़ा था, तब ईरान, इराक और फिलिस्तीन जैसे देश भारत के साथ थे — क्योंकि उन्हें भरोसा था कि भारत न्याय के लिए खड़ा है, सत्ता के लिए नहीं।

परंतु आज का भारत उस युग से अलग दिखाई देता है। ग़ाज़ा में निर्दोषों पर हमले हो रहे हैं, और भारत चुप है। वह वही भारत है जिसने कभी पीड़ितों के साथ खड़ा होकर अंतरराष्ट्रीय नैतिकता का नेतृत्व किया था। लेकिन अब वही भारत इज़रायल की गोद में बैठकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” का जाप कर रहा है। शब्दों की सजावट बची है, पर आत्मा खो चुकी है।

आज जब राहुल गांधी ने इंदिरा गांधी की नीतियों की प्रशंसा की, तो दरअसल उन्होंने उस युग की याद दिलाई जब भारत सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि तीसरी दुनिया की आवाज़ था। इंदिरा गांधी ने धर्म या विचारधारा नहीं देखी — उन्होंने हमेशा देश और न्याय को प्राथमिकता दी।

आज की परिस्थिति में जब भारत की विदेश नीति “मौन” और “मित्रता के नाम पर झुकाव” के बीच झूल रही है, तब इंदिरा गांधी की याद इसलिए आती है — क्योंकि वो नेता धर्म नहीं, देश को आगे बढ़ाती थीं।

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