पटना, 25 सितंबर 2025
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 नज़दीक आते ही राज्य की राजनीति और भी गरमा गई है। चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर ने अब प्रत्यक्ष तौर पर राजद और उसके नेता तेजस्वी यादव को निशाने पर लिया है। किशोर ने कहा कि राजद हमेशा मुसलमानों के हितैषी होने का दावा करता है और मुस्लिम वोट बैंक को अपने पक्ष में होने की बात करता है, लेकिन असलियत यह है कि पार्टी ने कभी मुसलमानों को उनके अनुपात के अनुसार टिकट या प्रतिनिधित्व नहीं दिया। उन्होंने सीधी चुनौती दी कि अगर तेजस्वी यादव और राजद को वास्तव में मुसलमानों की इतनी चिंता है, तो वे उनके “फार्मूले” को अपनाएं और अल्पसंख्यक समाज को चुनावी प्रतिनिधित्व में उचित हिस्सेदारी दें।
प्रशांत किशोर ने यह ऐलान करते हुए कहा कि उनकी पार्टी जन सुराज आगामी विधानसभा चुनाव में लगभग 40 मुस्लिम उम्मीदवार उतारेगी। यह संख्या बिहार की मुस्लिम आबादी के अनुपात को देखते हुए तय की गई है। किशोर का कहना है कि वे केवल बयानबाज़ी नहीं कर रहे, बल्कि मुसलमानों को प्रत्यक्ष राजनीतिक शक्ति और हिस्सेदारी देने के पक्षधर हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अगर राजद किसी सीट पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारता है, तो उनकी पार्टी उस सीट पर मुस्लिम प्रत्याशी नहीं खड़ा करेगी बल्कि हिंदू उम्मीदवार उतारेगी, ताकि विपक्षी दलों को यह आरोप लगाने का मौका न मिले कि वे मुस्लिम वोटों में बंटवारा कर रहे हैं।
राजद की ओर से फिलहाल इस चुनौती पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। तेजस्वी यादव या पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है। हालांकि राजनीतिक हलकों में यह चर्चा ज़रूर है कि किशोर की इस चाल ने राजद को असहज स्थिति में डाल दिया है। लंबे समय से मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानने वाली राजद को अब यह दिखाना पड़ेगा कि वह सचमुच मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के अनुरूप टिकट और अवसर देने के लिए तैयार है या केवल चुनावी वक्त पर उनका सहारा लेती है।
बिहार की राजनीति में मुसलमान निर्णायक वोटर रहे हैं। करीब 16-17% आबादी वाले मुस्लिम समुदाय का समर्थन जिस पार्टी को मिलता है, उसके चुनावी नतीजे पर असर पड़ता है। अब तक यह समर्थन राजद को मजबूती देता रहा है, लेकिन प्रशांत किशोर का यह कदम राजद के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। अगर जन सुराज मुस्लिम समाज में विश्वास कायम करने में सफल हो जाती है और उन्हें बड़े पैमाने पर उम्मीदवार बनाती है, तो यह RJD के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने वाला साबित हो सकता है।
किशोर का यह फार्मूला केवल चुनावी दांव नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। वे यह साबित करना चाहते हैं कि उनकी राजनीति “वोट बैंक” तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अल्पसंख्यकों और वंचित तबकों को सत्ता में साझेदारी देने की सोच रखते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि तेजस्वी यादव इस चुनौती का कैसे जवाब देते हैं — क्या वे वास्तव में टिकट बंटवारे में मुसलमानों को अधिक हिस्सेदारी देंगे या फिर चुनावी समीकरण बिगड़ने के डर से पुराने ढर्रे पर ही कायम रहेंगे।




