हिरन व्यास | गांधीनगर | 5 जनवरी 2026
इंदौर के बाद अब गुजरात की राजधानी गांधीनगर से सामने आई यह खबर पूरी व्यवस्था पर करारी चोट करती है। जिस नल से मासूम बच्चों की प्यास बुझनी थी, उसी नल से बीमारी और ज़हर निकल आया। दूषित पानी पीने से 104 बच्चे अचानक बीमार पड़ गए, जिससे पूरे शहर में अफरा-तफरी मच गई। हालात इतने गंभीर हो गए कि अस्पतालों में मरीजों की बढ़ती संख्या को संभालने के लिए अलग से नए वार्ड खोलने पड़े। बच्चों में उल्टी, दस्त, पेट दर्द और तेज बुखार जैसे लक्षण सामने आए, जिससे माता-पिता की चिंता और गुस्सा दोनों बढ़ गए। यह घटना कोई मामूली तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और जल प्रबंधन की विफलता का साफ उदाहरण है। शुरुआती जांच में पाइपलाइन लीकेज के कारण पानी में सीवेज मिलने की बात सामने आई है, लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी गड़बड़ी समय रहते पकड़ी क्यों नहीं गई। यह हादसा बताता है कि चमकदार दावों के बीच आम लोगों को आज भी सुरक्षित पीने का पानी तक नसीब नहीं, और इसकी सबसे भारी कीमत बच्चों को चुकानी पड़ रही है।
प्रारंभिक जांच में साफ हुआ है कि पानी की पाइपलाइन में लीकेज के चलते पीने के पानी में सीवेज की गंदगी मिल गई। यानी जो पानी सुरक्षित होना चाहिए था, वही पानी नालियों की गंदगी से दूषित होकर घरों तक पहुंचता रहा। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी गड़बड़ी इतने समय तक कैसे अनदेखी रही? क्या नगर निगम और जल विभाग को बदबू, रंग और स्वाद में बदलाव की खबरें नहीं मिलीं—या फिर सब जानते हुए भी आंखें मूंद ली गईं?
बीमार बच्चों में उल्टी, दस्त, तेज बुखार और पेट दर्द जैसे गंभीर लक्षण सामने आए हैं। कई बच्चे इतनी नाज़ुक हालत में अस्पताल पहुंचे कि माता-पिता की सांसें अटक गईं। अस्पतालों के बाहर बदहवास मां-बाप का एक ही सवाल है—“अगर पानी ही ज़हरीला होगा, तो हमारे बच्चे कैसे बचेंगे?” यह सिर्फ कुछ परिवारों का दर्द नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम पर जनता का गुस्सा है।
हैरानी इस बात की है कि इंदौर में दूषित पानी से मौतों और सैकड़ों लोगों के बीमार होने की खबरें अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थीं कि गांधीनगर में वही कहानी दोहराई जा रही है। क्या एक शहर की त्रासदी से भी सबक लेना इस व्यवस्था के बस की बात नहीं? क्या हर बार जांच कमेटी, बयान और आश्वासन देकर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा—और अगली त्रासदी का इंतजार होगा?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि उन्होंने पहले ही पानी की बदबू और रंग बदलने की शिकायतें की थीं, लेकिन अधिकारियों ने गंभीरता नहीं दिखाई। अब जब बच्चे अस्पतालों में भर्ती हैं, तब जाकर पाइपलाइन, सीवेज और सप्लाई सिस्टम की जांच शुरू हुई है। सवाल फिर वही—कार्रवाई हमेशा देर से क्यों? क्या प्रशासन को हर बार अस्पतालों की भीड़ और मासूमों की तकलीफ के बाद ही नींद आती है?
यह मामला केवल गांधीनगर या इंदौर तक सीमित नहीं है; यह देश के शहरी जल प्रबंधन की पोल खोलता है। करोड़ों के प्रोजेक्ट, स्मार्ट सिटी के दावे और चमकदार भाषण—लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि पीने का पानी तक सुरक्षित नहीं। अगर यही हाल रहा, तो अगली खबर किसी और शहर से आएगी—और फिर किसी और मां की गोद सूनी हो सकती है। जरूरत सिर्फ जांच और बयानबाज़ी की नहीं, बल्कि जिम्मेदारी तय करने और सख्त कार्रवाई की है। क्योंकि यह मामला पाइपलाइन का नहीं, जनता की ज़िंदगी का है—और इस पर चुप्पी भी एक अपराध है।




