महेंद्र कुमार । नई दिल्ली 10 दिसंबर 2025
संसद में मंगलवार का दिन कुछ ऐसा दिखाई दिया मानो कोई गंभीर बहस की बीन बजा रहा हो और पूरा सदन अपनी-अपनी राजनीति की पघुराहट में खोया हो। स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (SIR) जैसा गंभीर लोकतांत्रिक मुद्दा सामने था, लेकिन माहौल इस कदर शोर-शराबे, तंज, कटाक्ष और आरोपों से भर गया कि बहस का उद्देश्य बार-बार ध्वनि-गर्जना में खो जाता रहा। विपक्ष “वोट चोरी” और “संस्थाओं पर कब्ज़े” का राग अलापता रहा, सत्ता पक्ष “झूठा प्रचार”, “ग़लतफ़हमियाँ” और “लोकतंत्र का अपमान” बताता रहा। भारी-भरकम शब्दों, तल्ख़ तेवरों और राजनीतिक आक्रोश के बीच नतीजा वही रहा—ढाक के तीन पात। लोकतंत्र की रक्षा की दुहाई दी गई, लेकिन ठोस निष्कर्ष कहीं भी नहीं दिखा।
संसद के शीतकालीन सत्र के आठवें दिन लोकसभा में SIR पर बहस शुरू तो लोकतांत्रिक गंभीरता के साथ हुई, लेकिन जल्द ही यह राजनीतिक कटाक्षों, आरोपों और तंज के तूफ़ान में बदल गई। विपक्ष का कहना था कि चुनाव आयोग वोटर लिस्ट में भारी गड़बड़ी कर रहा है, जबकि सरकार इसे विपक्ष की “घबराहट” और “गुमराह करने वाली राजनीति” बता रही थी। नतीजा यह कि बहस अपने मूल उद्देश्य से जितनी बार लौटी, उससे कहीं ज्यादा बार भटकती नजर आई।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अपने भाषण में RSS पर संस्थागत कब्ज़े का बड़ा आरोप लगाया। उन्होंने हरियाणा चुनाव का उदाहरण देते हुए कहा कि एक विदेशी महिला का नाम 22 बार दिखाई दिया, और एक ही बूथ पर 200 बार एक ही नाम दर्ज मिला। राहुल का दावा था कि मतदाता सूची में “सुनियोजित चोरी” कराई जा रही है। यह बयान सत्ता पक्ष के भीतर आग की तरह फैला। संबित पात्रा ने इसे “झूठ का पुलिंदा” बताया, जबकि निशिकांत दुबे ने कहा कि “हम RSS से हैं और हमें गर्व है,” और राहुल की हर टिप्पणी को राजनीतिक थकान का परिणाम बताया।
बहस अपने चरम पर तभी पहुँची जब गृह मंत्री अमित शाह सदन में आए। शाह ने विपक्ष पर 30 दिन तक “झूठा प्रचार” करने का आरोप लगाया और कहा कि SIR पूरी तरह चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है। उनका वक्तव्य—“जब दो बड़े बोलते हैं तो बीच में नहीं बोलना चाहिए”—पूरे सदन में हलचल और ठहाके दोनों का कारण बना। शाह का कहना था कि SIR कोई साजिश नहीं, बल्कि मतदाता सूची को शुद्ध बनाने की प्रक्रिया है, जो कांग्रेस के शासनकाल में भी कई बार हो चुकी है।
उधर, ओवैसी ने SIR को “बैकडोर NRC” करार दिया। उनका आरोप था कि 35 लाख से अधिक नाम बिना सार्वजनिक आदेश के काटे गए। इस बीच अखिलेश यादव और डिंपल यादव ने बैलेट पेपर की मांग कर सदन का रुख पुराने चुनावी ढांचे की ओर मोड़ दिया। दोनों ने SIR के दौरान बीएलओ पर बढ़ते दबाव और आत्महत्याओं की घटनाओं का मुद्दा उठाया—जिस पर सदन में कुछ देर के लिए गंभीरता लौटी, लेकिन जल्दी ही फिर राजनीतिक घमासान ने उसे ढक लिया।
सदन में हलचल तब और बढ़ी जब BJP सांसद कंगना रनौत ने कहा—“ये लोग EVM हैक की बात करते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री दिलों को हैक करते हैं।” उनका तंज विपक्ष की नाराज़गी का कारण बना और माहौल और अधिक गर्म हो गया। पप्पू यादव ने सदन को “सर्कस” बताया और कहा कि संस्थाएँ गिरवी रख दी गई हैं। वहीं रवि शंकर प्रसाद ने करारा तंज किया—“जनता आपको वोट नहीं देती, तो हम क्या करें?”
अनुप्रिया पटेल ने स्पष्ट कहा कि अवैध मतदाता कोई भी हो, किसी भी राज्य में हो, उसका नाम काटना ही चाहिए। राजीव प्रताप रूडी ने बिहार की राजनीति को घसीटा और लालू यादव पर समस्या का ठीकरा फोड़ दिया। इस बीच असली मुद्दा—मतदाता सूची की पारदर्शिता, चुनाव आयोग की भूमिका, मतदाता अधिकार—लगातार शोर में दबते रहे।
पूरे दिन की बहस में ऐसा प्रतीत हुआ कि लोकसभा में हर नेता अपनी-अपनी ढपली पर अपना-अपना राग बजा रहा था। बीन लोकतंत्र सुधार की थी, लेकिन पघुराहट राजनीति की। जनता के अधिकारों पर चर्चा शुरू हुई, लेकिन अंत में नतीजा वही—ढाक के तीन पात।
बहस के अंत में यह साफ दिखाई दिया कि भारत के चुनावी ढांचे पर भरोसे की लड़ाई अब और तेज़ होगी। SIR हो, EVM हो या वोटर लिस्ट—हर मुद्दा आने वाले समय में राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाला है। लेकिन जिस दिन इतनी लंबी बहस के बाद भी देश को ठोस निर्णय नहीं मिलता, यह सवाल जरूर उठता है—लोकतंत्र की बीन कब तक बजती रहेगी और राजनीति की भैंस पघुराती रहेगी?




