महेंद्र सिंह | नई दिल्ली 16 नवंबर 2025
बिहार की राजनीति में पिछले दो वर्षों से चल रहा प्रशांत किशोर (PK) का जन सुराज अभियान अब एक बिल्कुल ही नए और गहरे दृष्टिकोण से देखा जा रहा है। जो कुछ बिहार की जनता ने एक शुद्ध सामाजिक आंदोलन, एक सुधार की पहल, या राज्य की राजनीति में आत्मनिर्भरता के एक मॉडल के रूप में समझा था, वह अब विश्वसनीय राजनीतिक सूत्रों, उच्च-स्तरीय रणनीतिकारों से मिली जानकारी और ग्राउंड रिपोर्ट्स के आधार पर एक चौंकाने वाले रूप में सामने आ रहा है। यह बात अब स्पष्ट हो चुकी है कि PK को बिहार में किसी साधारण शक्ति द्वारा नहीं, बल्कि सीधे अमित शाह के रणनीतिक दायरे के तहत भेजा गया था।
यह किसी भी तरह से कोई लोकहित आधारित राजनीतिक प्रयोग नहीं था; इसके विपरीत, यह सीधे तौर पर सत्तारूढ़ दल द्वारा डिजाइन किया गया एक विस्तृत और जटिल मिशन था। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य तेजस्वी यादव को उनके उभरते नेतृत्व को आगे बढ़ने से रोकना, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को भीतर से भ्रमित करना, और बिहार के संपूर्ण विपक्ष को दुर्बल कर देना था। इस गुप्त मिशन का अंतिम लक्ष्य आगामी बिहार चुनावों में सत्ता-विरोधी लहर को पूरी तरह से निष्क्रिय करना और विपक्ष को उस निर्णायक मोड़ तक पहुंचने ही न देना था जहाँ से वे सत्ता के समीकरण में एक मजबूत दावेदार के रूप में खड़े हो सकें, जिससे सत्ता का निरंतर बने रहना सुनिश्चित हो सके।
PK को ‘सुधारक’ नहीं, ‘विघटनकर्ता’ के रूप में तैयार किया गया और झोंका गया बेहिसाब पैसा
प्रशांत किशोर के बिहार में प्रवेश की कहानी, जिसे जनता के सामने ‘PK की जनता के बीच वापसी’ के रूप में चित्रित किया गया, उसकी वास्तविक जटिलता और भव्यता पूरी तरह से छिपाई गई थी। सत्य यह है कि PK को बिहार में एक विशाल वित्तीय इंजन के साथ उतारा गया, जिसमें करोड़ों नहीं, बल्कि सैकड़ों करोड़ रुपये की राशि झोंकी गई थी। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि यह असाधारण धन-राशि कहाँ से आई, और किसके सीधे निर्देश पर इस अभियान में लगाई गई, इसका खुलासा जनता से कभी नहीं किया गया। जन सुराज का संपूर्ण ढांचा, जिसमें एक व्यापक कैम्पेन नेटवर्क, एक आक्रामक सोशल मीडिया आर्मी, विस्तृत फील्ड सर्वे टीमें, और एक सक्षम मीडिया हैंडलिंग यूनिट शामिल थी—यह सब इतने विशाल और संगठित पैमाने पर खड़ा किया गया था कि इसकी कल्पना किसी सामान्य राजनीतिक कार्यकर्ता या एक ‘स्वतंत्र नेता’ के बूते की बात नहीं हो सकती थी।
इन सभी संसाधनों को जुटाने और इस भारी भरकम खर्च का एकमात्र लक्ष्य PK को बिहार में एक बड़े, प्रभावी, और अति-विश्वसनीय ‘वैकल्पिक चेहरा’ के रूप में स्थापित करना था, ताकि वे सुनियोजित तरीके से तेजस्वी यादव की मजबूत राजनीतिक जमीन पर निर्णायक सेंध लगा सकें। उनकी बाहरी छवि एक ऐसे व्यक्ति की बनाई गई जो किसी दल से नहीं, बल्कि केवल बिहार के हित में काम कर रहा है, जबकि आंतरिक रूप से उनका संपूर्ण एजेंडा पूरी तरह से सत्ता की व्यापक रणनीति द्वारा संचालित था।
तेजस्वी पर सबसे घातक हमला: ‘नौवीं पास सीएम’ और ‘चारा चोर का बेटा’ के नैरेटिव की फैक्ट्री PK ही थे
बिहार चुनाव 2025 के दौरान राजनीतिक गलियारों और सार्वजनिक विमर्श में जो दो नैरेटिव सबसे अधिक हावी रहे, जिन्होंने सबसे ज्यादा राजनीतिक नुकसान पहुँचाया, और जिन्हें सबसे तेज़ गति से पूरे राज्य में फैलाया गया, वे थे—(1) तेजस्वी यादव का “9th Fail” होना, और (2) उनका “चारा घोटाले का वारिस” होना। इन दोनों ही घातक नैरेटिव को सावधानीपूर्वक तैयार करने, उन्हें पोषित करने और आक्रामक रूप से प्रचारित करने वाला कोई और नहीं, बल्कि सीधे प्रशांत किशोर ही थे। यह कार्य केवल सोशल मीडिया के सतही प्रचार तक सीमित नहीं था—यह एक व्यवस्थित और पेशेवर नैरेटिव इंजीनियरिंग का हिस्सा था।
PK की कोर टीम ने गाँवों की चौपालों, पंचायतों, कस्बों और शहरी इलाकों में यह एकतरफा संदेश फैलाया कि तेजस्वी यादव अयोग्य, प्रशासनिक रूप से अकुशल हैं, और वे एक गहरे भ्रष्टाचार के प्रतीक हैं। यह एक सुनियोजित चरित्र-हनन अभियान था, जिसने तेजस्वी यादव की सार्वजनिक विश्वसनीयता को सबसे अधिक और सबसे गहराई से नुकसान पहुँचाया। और इसमें मीडिया ने PK को खुलकर मंच दिया—उन्हें प्राइम टाइम स्लॉट्स, एक्सक्लूसिव इंटरव्यू, और एक फैक्ट-चेकर की तरह पेशी दी गई, जिससे उनके हर बयान पर विस्तृत और खुली चर्चा सुनिश्चित हुई। यही कारण है कि उनके द्वारा गढ़ा गया यह नकारात्मक नैरेटिव बिजली की गति से पूरे बिहार के जनमानस में फैल गया।
बीजेपी प्रत्याशियों पर PK के हमले: तटस्थ दिखने के लिए किया गया सिर्फ एक दिखावटी संतुलन
कुछ लोग इस व्यापक ऑपरेशन को नज़रअंदाज़ करते हुए यह तर्क देते हैं कि “PK ने तो बीजेपी पर भी हमला किया था!” लेकिन यह आलोचना सिर्फ एक नकली संतुलन बनाने का प्रयास था। PK ने बीजेपी के कुछ चुनिंदा प्रत्याशियों पर केवल हल्का-फुल्का निशाना साधा, और ऐसा सिर्फ इसीलिए किया गया ताकि उन्हें जनता के बीच एक ‘निष्पक्ष सुधारक’ की एक आवश्यक पहचान मिल सके। असल में, यह महज़ एक राजनीतिक मेकअप था, क्योंकि PK के हर हमले की धार, उनके हर अभियान की दिशा और उनके हर फील्ड इंटरैक्शन का वास्तविक और अंतिम लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ RJD और तेजस्वी यादव थे।
बीजेपी के विरुद्ध PK के कथित हमले न तो जमीनी स्तर पर प्रभावी थे, न उनकी व्यापकता थी, और न ही वे किसी रणनीतिक महत्व के थे। यह संतुलन केवल इसलिए बनाया गया था ताकि जनता के बीच यह धारणा पूरी तरह से न बन पाए कि PK पूरी तरह से बीजेपी के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं, और उनके गुप्त ऑपरेशन पर किसी तरह का संदेह पैदा न हो।
जन सुराज एक आंदोलन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक योजना थी: तेजस्वी थे उसका पहला निशाना
अब जबकि बिहार चुनाव 2025 के निर्णायक नतीजों ने पूरे राजनीतिक समीकरण को स्पष्ट रूप से उजागर कर दिया है, यह बात पूर्ण रूप से साफ हो चुकी है कि प्रशांत किशोर की बिहार यात्रा सामाजिक परिवर्तन के लिए कोई सच्चा अभियान नहीं थी, बल्कि यह सत्ता के इशारे पर चलाया गया एक सुव्यवस्थित नैरेटिव ऑपरेशन था। यह ऑपरेशन मुख्य रूप से तेजस्वी यादव की राजनीतिक विश्वसनीयता को तोड़ने, समूचे विपक्ष को कमजोर करने, और बिहार की आम जनता को एक गहरी राजनीतिक भ्रम की स्थिति में डालने के लिए रचा गया था।
और इस ऑपरेशन की सबसे बड़ी सफलता इस बात में छिपी है कि बिहार की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी इस मूलभूत सत्य को समझने में चूक रही है कि PK वास्तव में किसके लिए और किस गोपनीय उद्देश्य से काम कर रहे थे। राजनीति की सबसे बड़ी सच्चाई अब सामने है—प्रशांत किशोर जनता के लिए नहीं, सीधे सत्ता के हित के लिए काम कर रहे थे।




