आलोक कुमार | नई दिल्ली 26 दिसंबर 2025
विदेश मंत्रालय का यह बयान कि “ऐसे भगोड़ों को कानून से नहीं बचने देंगे” सुनने में जितना सख़्त और राष्ट्रवादी लगता है, उतना ही यह आम आदमी के ज़हन में एक पुराना, चुभता हुआ सवाल भी जगा देता है। सवाल यह नहीं है कि सरकार आज क्या कह रही है, सवाल यह है कि जब ये लोग भाग रहे थे, तब सरकार क्या कर रही थी? ललित मोदी और विजय माल्या आज विदेश में बैठकर भारतीय कानून और व्यवस्था पर हँस रहे हैं, खुद को “सबसे बड़े भगोड़े” कहकर मज़ाक उड़ा रहे हैं, और हम एक दशक बाद यह सुन रहे हैं कि उन्हें भारत लाने की पूरी कोशिश हो रही है। यह बयान भरोसा पैदा करने से ज़्यादा उस लापरवाही की याद दिलाता है, जिसकी कीमत देश आज तक चुका रहा है।
यह मान लेना मासूमियत होगी कि मेहुल चौकसी, नीरव मोदी, विजय माल्या या ललित मोदी अचानक एक रात में अपराधी बन गए और भाग निकले। इन सबके मामलों में जांच, आरोप और चेतावनियाँ उनके भागने से पहले ही मौजूद थीं। बैंकों का पैसा डूब चुका था, एजेंसियों के पास सूचनाएँ थीं, फिर भी उन्हें देश छोड़ने से नहीं रोका गया। कोई एयरपोर्ट पर नहीं पकड़ा गया, कोई पासपोर्ट ज़ब्त नहीं हुआ, कोई कड़ी कानूनी कार्रवाई समय रहते नहीं हुई। आज सरकार जब “कानून के शिकंजे” की बात करती है, तो जनता यह पूछने को मजबूर है कि वह शिकंजा तब क्यों ढीला था?
दस साल बीत चुके हैं। इस दौरान न जाने कितने प्रेस बयान आए, कितनी बार कहा गया कि “प्रत्यर्पण की प्रक्रिया चल रही है”, “विदेशी अदालतों में मामला है”, “अंतरराष्ट्रीय कानून आड़े आ रहे हैं”। यह सब तकनीकी बातें हैं, जिनका सहारा लेकर मूल सवाल से बचा जाता रहा—क्या शुरुआती स्तर पर जानबूझकर आंखें मूंदी गईं? अगर सरकार सच में इतनी ही गंभीर थी, तो विजय माल्या को बार-बार विदेश जाने की अनुमति क्यों मिली? नीरव मोदी और मेहुल चौकसी के खिलाफ लुकआउट नोटिस आख़िरी वक्त पर क्यों लगाए गए? और ललित मोदी वर्षों तक खुलेआम विदेश में राजनीतिक और कारोबारी गतिविधियाँ क्यों करता रहा?
आज स्थिति यह है कि जब सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते हैं, जब जनता सरकार की नाकामी पर सवाल उठाती है, और जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि पर चोट पड़ती है, तब अचानक बयान सख़्त हो जाते हैं। विदेश मंत्रालय को आगे कर दिया जाता है, ताकि यह दिखाया जा सके कि सरकार “कुछ कर रही है”। लेकिन सच्चाई यह है कि विदेश मंत्रालय भगोड़ों को भागने से नहीं रोकता, यह काम होता है देश की आंतरिक व्यवस्था, जांच एजेंसियों और राजनीतिक नेतृत्व का। अगर वही व्यवस्था समय पर सक्रिय होती, तो आज यह नौबत ही नहीं आती।
सबसे पीड़ादायक बात यह है कि इन भगोड़ों द्वारा लूटा गया पैसा किसी अमूर्त संस्था का नहीं था। यह पैसा देश के बैंकों का था, आम लोगों की जमा पूंजी का था। किसान, कर्मचारी, छोटे कारोबारी—सबके हिस्से का पैसा। और जब यही लोग विदेश में बैठकर ऐश करते हैं, तब आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कानून सिर्फ़ कमजोर के लिए ही सख़्त है?
कानून की असली ताक़त घोषणाओं में नहीं, जवाबदेही में होती है। अगर सरकार आज सच में यह दिखाना चाहती है कि वह भगोड़ों के खिलाफ गंभीर है, तो सिर्फ़ प्रत्यर्पण की बातें काफी नहीं हैं। यह भी बताना होगा कि पिछले दस वर्षों में चूक कहाँ हुई, ज़िम्मेदार कौन था और उस पर क्या कार्रवाई हुई। जब तक यह ईमानदार आत्ममंथन नहीं होगा, तब तक ऐसे बयान लोगों को भरोसा नहीं, बल्कि यह एहसास ही कराएंगे कि देर से दिखाई गई सख़्ती दरअसल सिर्फ़ फेस सेविंग है।
आख़िरकार सवाल बहुत सीधा है— कानून से भागने वालों को रोकना ज़रूरी था, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी था उन्हें भागने ही न देना। अगर यह काम समय पर किया गया होता, तो आज विदेश मंत्रालय को ऐसे सख़्त शब्दों में बयान देने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।




