एबीसी डेस्क | 4 जनवरी 2026
बीसीसीआई के निर्देश पर कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) ने बांग्लादेशी तेज़ गेंदबाज़ मुस्तफिज़ुर रहमान को IPL 2026 की टीम से रिलीज़ कर दिया। यह फैसला इसलिए भी चौंकाने वाला रहा क्योंकि महज़ एक महीने पहले, दिसंबर 2025 के मिनी-ऑक्शन में KKR ने मुस्तफिज़ुर को 9.20 करोड़ रुपये में खरीदा था—जो किसी भी बांग्लादेशी खिलाड़ी के लिए IPL इतिहास की सबसे बड़ी बोली है। लेकिन बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों के बीच पैदा हुए राजनीतिक दबाव और सार्वजनिक आक्रोश के आगे यह क्रिकेटिंग निवेश टिक नहीं सका। बीसीसीआई सचिव देवजीत सैकिया ने साफ़ कहा कि यह निर्देश “हालिया घटनाक्रमों” के कारण दिया गया, जबकि KKR ने भी आधिकारिक बयान में पुष्टि की कि रिलीज़ बीसीसीआई के कहने पर हुई है और टीम को रिप्लेसमेंट खिलाड़ी लेने की अनुमति दी गई है।
बांग्लादेश में जून से दिसंबर 2025 के बीच कम से कम 71 घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें कथित ईशनिंदा के आरोपों के बाद हिंदुओं पर हमले हुए—मॉब लिंचिंग, घर जलाना, मंदिरों को नुकसान पहुँचाना। दिसंबर में दीपू चंद्र दास और खोकन दास जैसे मामलों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बटोरीं। ये घटनाएँ निस्संदेह निंदनीय हैं और मानवाधिकारों पर गंभीर चोट हैं। लेकिन बुनियादी सवाल यही है—क्या इन अपराधों की सज़ा एक क्रिकेटर को दी जा सकती है?
मुस्तफिज़ुर रहमान का इन घटनाओं से कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष संबंध नहीं है। वह न किसी राजनीतिक संगठन से जुड़े हैं, न किसी हिंसा के समर्थक, न किसी नफरत भरे बयान के दोषी। इसके बावजूद उन्हें उनके देश की सामाजिक-राजनीतिक विफलताओं का सामूहिक दंड दे दिया गया। यह न्याय नहीं, राजनीतिक सुविधा है।
यह फैसला बताता है कि कैसे राजनीति अब खेल के मैदान में खुलेआम दख़ल देने लगी है। IPL 2026 ऑक्शन में मुस्तफिज़ुर इकलौते बांग्लादेशी खिलाड़ी थे जिन्हें किसी टीम ने खरीदा। तस्कीन अहमद, रिशाद हुसैन जैसे अन्य खिलाड़ी अनसोल्ड रहे। शाकिब अल हसन जैसे विश्वस्तरीय ऑल-राउंडर तो ऑक्शन सूची में भी जगह नहीं बना सके। ठीक वैसे ही जैसे सालों पहले पाकिस्तानी खिलाड़ियों को IPL से बाहर कर दिया गया था, अब बांग्लादेशी खिलाड़ियों पर भी एक अनकही पाबंदी जैसी स्थिति बनती दिख रही है। सवाल यह है—क्या यह सिद्धांत आधारित नीति है, या सिर्फ़ माहौल के हिसाब से लिया गया फैसला?
यहीं से दोहरा मापदंड साफ़ नज़र आता है। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले पर आक्रोश जायज़ है, लेकिन क्या भारत के भीतर हुई त्रासदियों पर भी वही तत्परता दिखाई जाती है? मणिपुर दो साल से ज़्यादा समय तक जलता रहा—हत्याएँ, बलात्कार, विस्थापन—लेकिन क्या कभी वैसी निर्णायक कार्रवाई हुई? इंदौर में दूषित पानी पीने से लोगों की मौत हुई, लेकिन कोई बड़ा नैतिक या राजनीतिक फैसला नहीं लिया गया। क्योंकि ये घटनाएँ न तो अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव से जुड़ती हैं, न ही उनसे कोई आसान राजनीतिक लाभ निकलता है। लेकिन IPL में एक विदेशी खिलाड़ी पर तुरंत एक्शन—तो यह चयनात्मक नैतिकता नहीं तो क्या है?
इस पूरे प्रकरण में एक और असहज सच भी सामने आता है। KKR के मालिक शाहरुख़ खान मुस्लिम हैं, और उनकी टीम में एक मुस्लिम बांग्लादेशी खिलाड़ी का होना अचानक “राष्ट्रवाद” की कसौटी बन गया। तथाकथित राष्ट्रवादी, स्वयंभू साधु-संन्यासी और कथावाचक टीवी स्टूडियो, सोशल मीडिया और धार्मिक मंचों से शाहरुख़ खान के खिलाफ ज़हर उगलते रहे—उन्हें “देशद्रोही” और “राष्ट्रविरोधी” तक कहा गया। हैरानी यह है कि यही लोग मणिपुर की आग, इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों, और अन्य प्रशासनिक विफलताओं पर पूरी तरह चुप्पी साधे रहे। न कोई उपदेश, न कोई आक्रोश, न कोई नैतिक भाषण। साफ़ है कि इनका राष्ट्रवाद न पीड़ितों के साथ खड़ा होता है, न जवाबदेही मांगता है—वह सिर्फ़ एक मुस्लिम नाम दिखते ही सक्रिय हो जाता है।
पाखंड यहीं खत्म नहीं होता। अगर यही खिलाड़ी मुकेश अंबानी जैसे किसी हिंदू उद्योगपति की टीम में होता, तो क्या प्रतिक्रिया यही होती? तब शायद इसे “व्यावसायिक निर्णय” कहकर टाल दिया जाता। यही वह जगह है जहाँ पहचान की राजनीति नंगी हो जाती है—जहाँ धर्म और राष्ट्रवाद को ज़रूरत के मुताबिक हथियार बनाया जाता है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर का सवाल बिल्कुल वाजिब है—अगर खिलाड़ी हिंदू बांग्लादेशी होता, जैसे लिट्टन दास, तो क्या यही फैसला होता?
खेल का मूल सिद्धांत बेहद सरल है—खिलाड़ी का मूल्यांकन उसके प्रदर्शन से होना चाहिए, न कि उसके पासपोर्ट, धर्म या उसके देश की सरकार की नाकामियों से। मुस्तफिज़ुर रहमान ने IPL में 60 मैचों में 65 विकेट लिए हैं। मैदान पर उन्होंने कभी कोई गलती नहीं की। अगर हर देश की सामाजिक-राजनीतिक समस्याओं की सज़ा उसके खिलाड़ियों को देने लगें, तो अंतरराष्ट्रीय खेल की आत्मा ही खत्म हो जाएगी। फिर तो हर खिलाड़ी किसी न किसी विवाद का “दोषी” ठहरा दिया जा सकता है।
आज ज़रूरत स्पष्टता और ईमानदारी की है। बीसीसीआई को साफ़-साफ़ बताना चाहिए कि यह फैसला क्रिकेटिंग कारणों से लिया गया या राजनीतिक दबाव में। क्योंकि चुप्पी ही अन्याय को वैधता देती है और भविष्य में ऐसे फैसलों का रास्ता खोलती है। जब मणिपुर जैसी घरेलू त्रासदियों पर मौन और IPL में धर्म-देश देखकर फैसले हों, तो यह खेल नहीं, चयनात्मक राष्ट्रवाद है। और जब क्रिकेट की पिच पर राजनीति उतर आती है, तो हार सिर्फ़ खेल की नहीं होती—समाज की सहिष्णुता, निष्पक्षता और विवेक की भी होती है। खेल को राजनीति से मुक्त रखना ही सच्चा राष्ट्रवाद है।




