एबीसी डेस्क 7 जनवरी 2026
देश में न्याय की रफ्तार अक्सर सुर्खियों में रहती है—कभी तारीख़ पर तारीख़, कभी सालों का इंतज़ार, और कभी-कभी एक घोषणा के साथ ही तुरंत फैसला। दिल्ली हाईकोर्ट ने 7 जनवरी 2026 को बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम की मानहानि याचिका पर जिस तेज़ी से अंतरिम राहत दी, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है: क्या न्याय की गति सभी के लिए एक-सी है?
मामले की पृष्ठभूमि दिसंबर 2025 से जुड़ी है, जब सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट और वीडियो वायरल हुए, जिनमें दुष्यंत गौतम का नाम 2022 के अंकिता भंडारी हत्याकांड से कथित तौर पर जोड़ा गया। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और कुछ अन्य विपक्षी दलों द्वारा साझा किए गए इन क्लिप्स के ज़रिये यह संकेत दिया गया कि गौतम किसी तरह इस मामले से जुड़े हैं। जबकि सच्चाई यह है कि जांच, FIR या चार्जशीट—कहीं भी उनका नाम दर्ज नहीं है।
याचिका दाख़िल होते ही अदालत ने तत्काल आदेश पारित कर दिए। विपक्षी दलों को निर्देश मिला कि वे 24 घंटे के भीतर सभी सोशल मीडिया पोस्ट, वीडियो और सामग्री हटा दें, जिनमें दुष्यंत गौतम को कथित ‘VIP’ बताकर जोड़ा गया है। अदालत ने यह भी साफ किया कि भविष्य में ऐसा कोई कंटेंट पोस्ट न किया जाए।
न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया (प्राइमा फेसी) मानहानि का मामला बनता है और यदि विवादित सामग्री पर रोक नहीं लगी तो याचिकाकर्ता को “अपूरणीय क्षति” हो सकती है। साथ ही चेतावनी दी गई कि यदि राजनीतिक दल खुद सामग्री नहीं हटाते, तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स—X, फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब—को सीधे हटाने का आदेश दिया जाएगा।
इस आदेश के आते ही बहस तेज़ हो गई। सोशल मीडिया पर आम नागरिक पूछ रहे हैं कि अगर किसी बड़े नेता के लिए अदालत इतनी तेज़ी से सक्रिय हो सकती है, तो आम आदमी के मामलों में यही तत्परता क्यों नहीं दिखती? मानहानि और निजी अधिकारों से जुड़े अनगिनत मामले सालों तक अदालतों में लटके रहते हैं, लेकिन यहां याचिका पर अगले ही दिन अंतरिम राहत मिल गई।
दूसरी ओर, पक्षकारों का तर्क है कि अदालत ने कानून के दायरे में रहते हुए झूठे और मानहानिकारक प्रचार पर रोक लगाई है, जो न्यायपालिका का दायित्व है। यह तर्क अपनी जगह है। लेकिन सवाल फिर भी बना रहता है—क्या न्यायपालिका की संवेदनशीलता और प्राथमिकताएं हर नागरिक के लिए समान हैं?
यह भी याद रखना ज़रूरी है कि अंकिता भंडारी हत्याकांड 2022 का मामला है, जिसमें दोषियों को आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है, और दुष्यंत गौतम का नाम किसी भी आधिकारिक दस्तावेज़ या न्यायिक आदेश में नहीं है। इसके बावजूद जैसे ही सोशल मीडिया पर नाम जोड़ने का नैरेटिव तेज़ हुआ, अदालत ने फौरन हस्तक्षेप किया।
इस पूरी घटना ने एक बार फिर न्याय की समानता और न्यायपालिका की प्राथमिकताओं पर बहस छेड़ दी है। जब न्याय की गति और जवाबदेही में भेदभाव-सा महसूस हो, तो आम जनता का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। न्याय अगर समय पर और सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध न हो, तो लोकतंत्र की बुनियाद पर सवाल उठना तय है।




