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ओपिनियन | सत्ता की राजनीति बनाम विचारधारा: महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव क्या संकेत दे रहे हैं?

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अमरनाथ प्रसाद | मुंबई 7 जनवरी 2026

महाराष्ट्र में दिसंबर 2025 में हुए नगर परिषद और नगर पंचायत चुनावों के बाद जो तस्वीर सामने आई है, उसने भारतीय राजनीति की एक पुरानी लेकिन अक्सर अनदेखी सच्चाई को फिर उजागर कर दिया है—स्थानीय सत्ता की राजनीति में विचारधारा अक्सर पीछे छूट जाती है और कुर्सी सबसे आगे आ जाती है। अकोला के अकोट से लेकर मुंबई से सटे अंबरनाथ तक, ऐसे गठबंधन बने हैं जो राष्ट्रीय राजनीति में लगभग असंभव माने जाते हैं। यही वजह है कि ये गठबंधन न सिर्फ जनता को चौंकाते हैं, बल्कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम और असंतोष भी पैदा करते हैं।

अकोट: जब BJP और AIMIM एक मंच पर आए

अकोला जिले के अकोट नगर परिषद में BJP और AIMIM का साथ आना सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। BJP की 10 और AIMIM की 3 सीटें—संख्या के हिसाब से यह गठबंधन बहुमत के लिए जरूरी था। ‘अकोट विकास मंच’ के नाम से बना यह गठजोड़ साफ तौर पर सत्ता हासिल करने के लिए किया गया फैसला था। यहां विचारधारा का कोई साझा आधार नहीं दिखता—एक तरफ हिंदुत्व की राजनीति करने वाली BJP, दूसरी तरफ मुस्लिम पहचान की राजनीति करने वाली AIMIM। दिलचस्प यह है कि AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इसे ‘B टीम’ के आरोपों से अलग बताते हुए इसे स्थानीय मजबूरी बताया, जबकि राज्य स्तर पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस गठबंधन को “अस्वीकार्य” कहकर BJP को तुरंत इससे बाहर निकलने का आदेश दिया। यह साफ संकेत है कि पार्टी नेतृत्व और स्थानीय इकाइयों की सोच में गहरी खाई है।

अंबरनाथ: जहां BJP और कांग्रेस एक हो गए

अंबरनाथ नगर परिषद का मामला तो और भी चौंकाने वाला है। यहां BJP, कांग्रेस और NCP (अजित पवार गुट) ने मिलकर ‘अंबरनाथ विकास आघाड़ी’ बनाई और सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) को सत्ता से बाहर कर दिया। राष्ट्रीय स्तर पर BJP और कांग्रेस एक-दूसरे के सबसे बड़े राजनीतिक विरोधी हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर “शिवसेना को रोकना” साझा एजेंडा बन गया। इस गठबंधन पर कांग्रेस नेतृत्व ने कड़ा रुख अपनाते हुए अपने काउंसलरों को सस्पेंड किया, वहीं फडणवीस ने BJP की स्थानीय इकाई को चेतावनी दी। खुद एकनाथ शिंदे ने सवाल उठाया कि अगर यह गठबंधन गलत है तो BJP को खुलकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

विचारधारा बनाम व्यावहारिक राजनीति

इन दोनों उदाहरणों से एक बात साफ है—स्थानीय निकाय चुनावों में विचारधारा से ज्यादा अंकगणित और सत्ता मायने रखती है। कार्यकर्ता जमीन पर एक-दूसरे से लड़ते रहते हैं, नारे लगते हैं, झंडे टकराते हैं, लेकिन जब बात सत्ता की आती है तो वही दल हाथ मिला लेते हैं जिनके खिलाफ कल तक सबसे तीखे भाषण दिए जा रहे थे। यह स्थिति सिर्फ राजनीतिक नैतिकता का सवाल नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता का भी है। जब मतदाता किसी पार्टी को उसकी विचारधारा के आधार पर वोट देता है और बाद में वह पार्टी उसके ठीक उलट विचारधारा वाली ताकत से गठबंधन कर लेती है, तो जनता खुद को ठगा हुआ महसूस करती है।

ऊपरी नेतृत्व की चिंता और संदेश

BJP और कांग्रेस—दोनों के शीर्ष नेतृत्व ने इन गठबंधनों को अस्वीकार कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि राष्ट्रीय राजनीति में विचारधारा अब भी मायने रखती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ डैमेज कंट्रोल है? अगर स्थानीय स्तर पर बार-बार ऐसे प्रयोग होते रहे, तो कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को यह समझाना मुश्किल होगा कि “विचारधारा” वास्तव में क्या है।

महाराष्ट्र के ये स्थानीय गठबंधन हमें यह सिखाते हैं कि भारतीय राजनीति दो समानांतर पटरियों पर चल रही है—एक विचारधारा की और दूसरी सत्ता की। फिलहाल स्थानीय निकायों में सत्ता की पटरी ज्यादा तेज चल रही है। अगर राजनीतिक दल सच में अपने कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को साथ रखना चाहते हैं, तो उन्हें यह तय करना होगा कि विचारधारा सिर्फ चुनावी भाषणों तक सीमित रहेगी या सत्ता के सौदों में भी उसका कोई मूल्य होगा।

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