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ओपिनियन | नोटबंदी से मनरेगा तक: मनमानी फैसले और उनका बोझ उठाता देश

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एबीसी डेस्क | 27 नवंबर 2025

पिछले कुछ सालों में देश ने बार-बार एक ही सच्चाई महसूस की है—बड़े फैसले अचानक आते हैं, बिना तैयारी, बिना संवाद और बिना यह सोचे कि उनका असर आम आदमी की ज़िंदगी पर क्या पड़ेगा। फैसले सत्ता के ऊपरी कमरों में लिए जाते हैं, लेकिन उनकी कीमत चुकाता है सड़क पर खड़ा आदमी—किसान, मज़दूर, छोटा दुकानदार, नौकरीपेशा और बेरोज़गार युवा।

नोटबंदी की वह रात आज भी देश की सामूहिक स्मृति में दर्ज है। घरों में रखी मेहनत की कमाई एक झटके में बेकार हो गई। बैंकों के बाहर लंबी कतारें लगीं, बुज़ुर्ग घंटों खड़े रहे, मज़दूरों के पास घर लौटने तक के पैसे नहीं बचे। असंगठित क्षेत्र, जो देश की आधी से ज़्यादा आबादी को रोज़गार देता है, सबसे ज़्यादा टूटा। कई छोटे कारख़ाने और दुकानें कभी दोबारा नहीं खुल पाईं। दावा काले धन को खत्म करने का था, लेकिन चोट ईमानदार मेहनतकश को लगी। उस फैसले का असर आज भी रोज़गार, आय और भरोसे में दिखाई देता है।

इसके बाद GST आया। कर सुधार की ज़रूरत से कोई इनकार नहीं करता, लेकिन जिस तरह इसे लागू किया गया, उसने व्यापार को राहत देने के बजाय उलझा दिया। बार-बार बदलते नियम, जटिल पोर्टल, तकनीकी दिक्कतें और भारी जुर्माने का डर—इन सबने छोटे व्यापारियों की नींद उड़ा दी। जिनके पास अकाउंटेंट और तकनीक थी, वे किसी तरह टिक गए, लेकिन छोटे दुकानदार और मध्यम उद्योग कर्ज़ और अनिश्चितता में फँसते चले गए। नतीजा यह हुआ कि रोज़गार बढ़ने के बजाय घटता गया।

खेती के मामले में भी यही रवैया दिखा। बिना किसानों से सही संवाद किए, बिना राज्यों की राय लिए ऐसे फैसले लाए गए, जिनसे किसानों को लगा कि उनकी ज़मीन, उनकी फसल और उनका भविष्य खतरे में है। महीनों तक देश ने किसानों को सड़कों पर बैठे देखा—कभी कड़ाके की ठंड में, कभी बारिश में, कभी तेज़ गर्मी में। सैकड़ों किसानों की जान चली गई। आखिरकार फैसले वापस लेने पड़े, लेकिन तब तक बहुत कुछ टूट चुका था—विश्वास, उम्मीद और कई घरों के चिराग।

इसी बीच महामारी आई। उस दौर में करोड़ों मज़दूरों को पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलकर घर लौटते देखा गया। उस समय यह साफ़ हो गया कि संकट के वक्त सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ कितनी ज़रूरी होती हैं। ऐसे में रोज़गार और गरीबों के सहारे से जुड़ी योजनाओं को कमजोर करने की बातें डर पैदा करती हैं। गाँवों में जिनके लिए रोज़ का काम ही जीवन है, जिनके लिए दिहाड़ी ही बच्चों की पढ़ाई और घर का चूल्हा है, उनके लिए ये योजनाएँ आख़िरी सहारा होती हैं। इन्हें सिर्फ़ खर्च समझना, ज़मीनी हकीकत से आँख चुराने जैसा है।

यह सब सिर्फ़ आर्थिक फैसलों की कहानी नहीं है, यह शासन की सोच की कहानी है। लोकतंत्र का मतलब सिर्फ़ वोट डालना नहीं होता। लोकतंत्र का मतलब है सुनना, समझना और साथ लेकर चलना। जब संसद, राज्यों, विशेषज्ञों और जनता की आवाज़ को नज़रअंदाज़ कर फैसले थोपे जाते हैं, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। संस्थाएँ चुप होती जाती हैं और सत्ता कुछ हाथों तक सिमट जाती है।

आज देश जिस बोझ को ढो रहा है, वह केवल पैसों का नहीं है। यह उस भरोसे का बोझ है जो धीरे-धीरे टूट रहा है। यह उस असुरक्षा का बोझ है कि पता नहीं अगला अचानक लिया गया फैसला किसकी ज़िंदगी उलट देगा। इतिहास बताता है कि ऐसे फैसले देर-सवेर वापस लेने पड़ते हैं, लेकिन तब तक आम आदमी बहुत कुछ खो चुका होता है—रोज़गार, सम्मान और भविष्य पर भरोसा।

देश को मज़बूत नेतृत्व की ज़रूरत है, लेकिन ऐसा नेतृत्व नहीं जो अकेले फैसले लेने को ताक़त समझे। असली ताक़त लोगों के साथ चलने में होती है, उनकी बात सुनने में होती है और यह मानने में होती है कि देश किसी एक आदमी से नहीं चलता। देश उन करोड़ों आम लोगों से बनता है, जो हर मनमाने फैसले का सबसे भारी बोझ उठाते हैं—खामोशी से, लेकिन गहरी चोट के साथ।

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