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जर्मनी में हर सातवें बच्चे पर गरीबी का खतरा — समृद्ध राष्ट्र के पीछे छुपा दुख

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अंतरराष्ट्रीय डेस्क 18 नवंबर 2025

यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था Germany में, जहाँ सबको ‘आरामदायक जीवन’ का अनुमान है, वहाँ एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है — लगभग हर सातवाँ बच्चा गरीबी या सामाजिक बहिष्कार के जोखिम में है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, बच्चों-युवा में गरीबी के जोखिम का आंकड़ा 14 % के करीब पहुँच चुका है — यानी देश में करीब 2.1 मिलियन बच्चे इस खतरे के घेरे में हैं। यह सिर्फ एक संख्या नहीं बल्कि एक राष्ट्रीय चेतावनी की तरह है — कि समृद्धि के आड़ में कितनी देर से इंकार किया गया सामाजिक असमानता खड़ी है। जब बच्चे, जो कि भविष्य की उम्मीद हैं, आज इस तरह की आर्थिक असुरक्षा झेल रहे हैं, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत परिवारों का संकट नहीं, बल्कि समाज-राजनीति की कमजोरी है।

कारण गहरे हैं—ऊँची महंगाई, अस्थिर मजदूरी, एकल-अभिभावक-परिवारों की बढ़ती संख्या

इस जोखिम का कारण केवल एक-दो फ़ैक्टर नहीं है — बल्कि जर्मनी में गरीबी-सम्बंधित कई कारक समय के साथ घनी हो गए हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, जो परिवार कम-शिक्षित अभिभावक रखते हैं, जिनकी नौकरी अस्थिर है या एकल-अभिभावक-परिवार हैं, उनमें गरीबी-खतरे का प्रतिशत 30-35 % तक बढ़ जाता है। इसके पीछे तीन बड़े मोटे कारण हैं: पहला, लागत-महंगाई (खासतौर पर उर्जा, किराया, खाद्य) में तेजी; दूसरा, “मिनी-जॉब्स” और कम वेतन-अस्थिर रोजगार का उछाल; तीसरा, बच्चों के देखभाल एवं शिक्षा-सुविधाओं में असमर्थता।

विशेष रूप से एकल-माता-पिता वाले परिवारों में यह खतरा अधिक है—क्योंकि इनके पास कम संसाधन होते हैं, सहायिकाएँ सीमित हैं और अतिरिक्त दबाव होता है कि वे बच्चों की देखभाल, शिक्षा और घर-खर्च के बीच संतुलन बनायें। गैप सिर्फ़ आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक अवसरों का भी है — उदाहरण के लिए पर्याप्त समय-सुधार स्कूल-डे, मुफ्त लंच-श्रेणियाँ, पढ़ाई-सामग्री की सहायता आदि। एक स्वतंत्र अध्ययन ने यह संकेत दिया है कि ये समर्थन-साधन अब भी जरूरत के मुकाबले बहुत कम हैं। 

परिणाम दर्दनाक हैं—शिक्षा, स्वास्थ्य और भावी अवसरों पर असर

जब बच्चे गरीबी-खतरे की श्रेणी में आ जाते हैं, तो सिर्फ आज की चुनौतियाँ नहीं सामने आतीं, बल्कि उनके कल के विकल्प भी सिकुड़ जाते हैं। गरीबी-संकट से प्रभावित बच्चों को अक्सर पर्याप्त पोषण, गर्म-कपड़े, किताबें, अतिरिक्त-क्लासरoom-सहायता, सुरक्षित आवास तथा तकनीकी पहुँच-इन्टरनेट मिलता नहीं। यह स्थिति उनकी पढ़ाई-प्रगति, आत्मविश्वास और सामाजिक समावेशन को प्रभावित करती है। परिणामस्वरूप, वे आगे चलकर रोजगार-संधियों और सामाजिक सुरक्षा-नेटवर्क में पिछड़ने का जोखिम उठाते हैं। इसका भावी असर यह है कि समाज में “उच्च-आगे उठने की कुर्सी” कम होने लगती है। यदि बच्चों को आज वह आधार नहीं मिला, जो समकक्ष-परिवारों को मिलता है, तो शेष जीवन-काल में उनका पिछड़ जाना लगभग तय-सी बात बन जाती है। इससे जर्मनी जैसे देश में, जहाँ निवेश, शिक्षा, नवाचार और श्रम-सक्रियता पर बल दिया जाता है, आने वाले दशक में सामाजिक-असमानता का भूत और गहरा हो सकता है।

सरकारी जवाब और आगे की चुनौतियाँ—क्या पर्याप्त कार्रवाई हो रही है?

जर्मन सरकार एवं सामाजिक कल्याण-सिस्टम ने इस खतरे को पहचानते हुए कुछ नीति-उपाय तय किये हैं—जैसे कि बच्चों-भत्ते (Kindergeld), अतिरिक्त-सहायता (Kinderzuschlag), शिक्षा-सहायता-पैकेज आदि। मगर सवाल यह है कि क्या ये उपाय पर्याप्त हैं और समय-बन्द तरीके से लागू हो रहे हैं? कई स्वतंत्र शोधों ने कहा है कि सामाजिक सुरक्षा-भत्ते आज की महंगाई-लहर, किराया-बढ़ोतरी, एवं शिक्षा-खर्च के मुकाबले कम-से-कम 25-40 % पीछे रह गए हैं। इसके अलावा, नीतिगत चुनौतियाँ भी सामने हैं—निर्देश-रहित लाभ-प्राप्ति प्रक्रियाएं, बच्चों-केवल-परिवारों में सहायता-पहुँच की कमी, और घरेलू देखभाल-बोझ का ऊँचा स्तर, विशेषकर महिलाओं में, जोखिम को बढ़ा रहा है। समाज-विज्ञानी सुझाव दे रहे हैं कि जर्मनी को “एकल-माता-पिता परिवारों के लिए विशेष योजना”, “विद्यालय-आधारित मुफ्त लंच एवं अतिरिक्त-क्लास समर्थन”, और “डिजिटल-सामग्री पहुँच सुनिश्चित करना” जैसी ठोस और समय-बद्ध नीतियाँ अपनानी होंगी।

एक चेतावनी और एक अवसर—समृद्धि के परदे के पीछे छुपी असमानता को उजागर करने का समय है

यह तथ्य कि जर्मनी में हर सातवाँ बच्चा गरीबी-खतरे में है, सिर्फ एक आँकड़ा नहीं—यह राष्ट्र के सामाजिक दर्शन और समृद्धि-दृष्टि पर चुनौती है। यदि बच्चों को समान अवसर नहीं दिए गए, तो अर्थव्यवस्था जितनी मजबूत हो, सामाजिक एकता उतनी ही कमजोर हो जाएगी। इस संकट को अवसर में बदलने के लिए जरूरी है—वित्तीय संसाधनों से अधिक, सामाजिक प्रतिबद्धता और समय-सक्रिय नीतियाँ। जर्मनी की तरह विकसित राष्ट्रों के लिए यह उदाहरण-स्थल बन सकता है कि गरीबी सिर्फ विकसित या विकास-रहीश देशों की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, श्रम-बाज़ार, शिक्षा-नीति, और देखभाल- व्यवस्था का प्रत्यक्ष परिणाम है। अगर आज उन्होंने इस खतरे को गंभीरता से नहीं लिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ पुरानी समृद्धि की छाया में भी पिछड़ सकती हैं।

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