महेंद्र कुमार | नई दिल्ली 7 जनवरी 2026
सुप्रीम कोर्ट के दो अलग-अलग दिनों के फैसलों ने एक बार फिर देश की न्याय व्यवस्था पर बहस छेड़ दी है। सोमवार को शीर्ष अदालत ने दिल्ली दंगों से जुड़े UAPA मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि ट्रायल में देरी और लंबे समय तक जेल में रहना, अपने-आप में जमानत का आधार नहीं हो सकता। कोर्ट के इस फैसले से इन दोनों आरोपियों की राहत की उम्मीदों को झटका लगा। लेकिन इसी फैसले के ठीक अगले दिन, यानी मंगलवार को, सुप्रीम कोर्ट की एक दूसरी पीठ ने एक अलग मामले में बिल्कुल अलग रुख अपनाया। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि स्पीडी ट्रायल (तेज सुनवाई) आरोपी का मौलिक अधिकार है और अगर राज्य या अभियोजन एजेंसी यह अधिकार सुनिश्चित नहीं कर पा रही है, तो गंभीर अपराध होने के बावजूद जमानत का विरोध नहीं किया जाना चाहिए।
मंगलवार के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी आरोपी को सालों तक जेल में रखकर ट्रायल लटकाए रखना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने माना कि अगर ट्रायल में अनुचित देरी हो रही है, तो आरोपी को जमानत मिलना चाहिए, भले ही आरोप गंभीर क्यों न हों।
इन दोनों फैसलों के सामने आने के बाद सोशल मीडिया और कानूनी हलकों में यह सवाल उठने लगे हैं कि एक ही अदालत में, एक ही सप्ताह में, जमानत और स्पीडी ट्रायल को लेकर दो अलग-अलग मानक क्यों दिख रहे हैं। कई लोग इसे “सोमवार और मंगलवार का न्याय” कहकर टिप्पणी कर रहे हैं और न्यायिक समानता पर सवाल उठा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के ये फैसले सिर्फ उमर खालिद और शरजील इमाम तक सीमित नहीं हैं, बल्कि देश की आपराधिक न्याय प्रणाली, UAPA जैसे कठोर कानूनों और आरोपी के मौलिक अधिकारों पर एक बड़ी बहस को जन्म दे रहे हैं।




