नई दिल्ली / लखनऊ / पटना | 9 जनवरी 2026
‘राष्ट्रीय सहारा’ सिर्फ़ अख़बार नहीं, भरोसा था
जिस नाम का मतलब ही आसरा हो, उसका यूँ टूट जाना सबसे ज़्यादा चुभता है। सहारा न्यूज़ चैनल के बंद होने के बाद अब ‘राष्ट्रीय सहारा’ अख़बार का प्रकाशन भी रुक गया है। जिन पत्रकारों और कर्मचारियों ने पहले चैनल बंद होने का दर्द झेला था, उनके लिए यह दूसरी चोट है—और शायद ज़्यादा गहरी। 8–9 जनवरी 2026 के बीच लखनऊ, पटना सहित देश के अधिकांश संस्करण अचानक बंद कर दिए गए। दिल्ली संस्करण पहले ही खामोश हो चुका था। किसी सुबह अख़बार नहीं आया, और उसी के साथ हज़ारों लोगों की दिनचर्या, पहचान और उम्मीदें भी थम गईं।1991–92 में शुरू हुआ राष्ट्रीय सहारा हिंदी पत्रकारिता के उन चंद संस्थानों में था, जो ज़मीन से जुड़ी खबरों और आम आदमी की आवाज़ के लिए पहचाना जाता था। राजनीति की हलचल हो या किसी छोटे कस्बे की पीड़ा, यह अख़बार दोनों को बराबर जगह देता था। लाखों पाठकों के लिए सुबह की चाय इसी अख़बार से पूरी होती थी, और हजारों पत्रकारों के लिए यही दफ़्तर उनका दूसरा घर था। तीन दशक तक चला यह सफ़र अचानक रुक जाएगा, यह शायद किसी ने नहीं सोचा था।
एक सुबह सब बदल गया: न नोटिस, न विदाई, न कोई जवाब
अख़बार बंद होने की ख़बर किसी औपचारिक घोषणा से नहीं, बल्कि अचानक बंद हुए संस्करणों और शांत पड़े दफ्तरों से मिली। कई पत्रकार रोज़ की तरह न्यूज़ रूम पहुँचे, लेकिन काम नहीं था। मशीनें बंद थीं, फोन खामोश थे और सवाल हवा में लटके हुए थे—अब आगे क्या? सबसे पीड़ादायक यह था कि प्रबंधन की ओर से न कोई स्पष्ट संदेश आया, न कोई भविष्य की योजना बताई गई। जिन लोगों ने वर्षों तक दूसरों की ज़िंदगी की खबरें लिखीं, उन्हें अपनी ज़िंदगी की खबर खुद तलाशनी पड़ रही थी।
इस्तीफ़ा, इंतज़ार और अनिश्चितता: पत्रकारों के सामने सबसे कठिन घड़ी
अख़बार बंद होते ही कुछ कर्मचारियों से कहा गया कि इस्तीफ़ा दे दें, जबकि कुछ को कुछ दिन इंतज़ार करने को कहा गया। यह इंतज़ार सबसे भारी होता है—न नौकरी है, न भरोसा, न अगला कदम साफ़। कई पत्रकारों के बच्चे स्कूल में हैं, किसी के घर में बीमार माता-पिता हैं, किसी पर कर्ज़ है। एक झटके में सैकड़ों परिवारों के सामने रोज़ी-रोटी और भविष्य दोनों पर सवाल खड़े हो गए। यह सिर्फ़ आर्थिक संकट नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की भी लड़ाई है।
बकाया वेतन की टीस: मेहनत की कमाई के लिए दर-दर भटकते कर्मचारी
इस त्रासदी को और गहरा बनाता है लंबे समय से बकाया वेतन और ग्रेच्युटी का मुद्दा। कई कर्मचारियों को महीनों से पूरी तनख़्वाह नहीं मिली थी। अख़बार बंद होने के बाद मजबूरी में वे लेबर डिपार्टमेंट पहुँचे। वहां अपर श्रमायुक्त कल्पना श्रीवास्तव ने सहारा प्रबंधन को नोटिस जारी किया। काग़ज़ों में यह एक कानूनी प्रक्रिया है, लेकिन ज़मीन पर यह उन परिवारों की आख़िरी उम्मीद है, जिनके घर का चूल्हा किसी तरह जल रहा है।
पहले से दरक रहा था तंत्र: 2025 में ही दिखने लगे थे संकेत
सहारा समूह के मीडिया डिवीजन की हालत लंबे समय से ठीक नहीं थी। 2025 में कई बार वेतन न मिलने से कामकाज प्रभावित हुआ। कर्मचारी भीतर ही भीतर हालात संभालने की कोशिश करते रहे—कभी उधार लेकर, कभी उम्मीद के सहारे। लेकिन समस्याएं बढ़ती गईं। पहले न्यूज़ चैनल बंद हुआ और अब अख़बार भी। यह एक दिन का हादसा नहीं, बल्कि धीरे-धीरे टूटी एक पूरी व्यवस्था की कहानी है।
मजीठिया वेज बोर्ड और अदालतें: इंसाफ़ अब भी अधूरा
मजीठिया वेज बोर्ड के तहत बकाया भुगतान का मामला वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। कर्मचारियों का आरोप है कि प्रबंधन की ओर से अधूरी सूचियां पेश की गईं, जिससे मामला उलझता गया। अदालत की तारीख़ें बढ़ती रहीं, लेकिन ज़िंदगी नहीं रुकती। आज जब अख़बार भी बंद हो गया है, तो सवाल और तीखा हो गया है—क्या इंसाफ़ मिलेगा भी या नहीं?
सबसे बड़ा सवाल: पैसे थे तो पेट क्यों काटे गए?
यहीं पर एक ऐसा सवाल खड़ा होता है, जिससे नज़र चुराना मुश्किल है। जिस कंपनी का वैल्युएशन 2 लाख 59 हज़ार करोड़ रुपये तक आंका गया, और जिसे करीब एक लाख करोड़ रुपये में देश के एक “ख़ास” उद्योगपति को सौंपने की तैयारी की बातें सामने आती रही हैं—उस कंपनी को वेंटिलेटर पर पहुँचाने वाली सरकार, प्रशासन और सहारा के भीतर बैठे कुछ दगाबाज़ लोग यह तो ज़रूर बता सकते हैं कि अगर पैसे थे, सौदे थे, खरीदार थे—तो लाखों लोगों के पेट पर लात क्यों मारी गई? क्या मुट्ठी भर लोगों की ज़रूरतें पूरी करने के लिए हज़ारों घरों के चूल्हे बुझाने की इजाज़त किसी ने दी थी? किस कानून, किस नैतिकता, किस व्यवस्था ने यह अधिकार दिया कि कुछ लोग सौदे करें और बाकी लोग भूखे सोने को मजबूर हों? यह सिर्फ़ आर्थिक सवाल नहीं, यह नैतिक अपराध का सवाल है।
मीडिया जगत का सन्नाटा: एक अख़बार नहीं, एक पूरी पीढ़ी प्रभावित
राष्ट्रीय सहारा का बंद होना सिर्फ़ एक अख़बार का अंत नहीं है। यह उस दौर का अंत है, जब पत्रकारिता में संस्थान पत्रकारों को पहचान और सुरक्षा देते थे। यहां से निकले कई पत्रकार देश के बड़े मीडिया घरानों तक पहुंचे। आज वही लोग असमंजस में हैं। यह घटना पूरे मीडिया सेक्टर के लिए चेतावनी है कि पत्रकारों की ज़िंदगी कितनी असुरक्षित हो चुकी है।
सरकार से आख़िरी उम्मीद: अगर अब भी नहीं सुना गया तो…
कर्मचारियों और पत्रकार संगठनों की मांग साफ़ है—सरकार और श्रम विभाग तुरंत हस्तक्षेप करें, ताकि बकाया वेतन, ग्रेच्युटी और अन्य देयकों का भुगतान सुनिश्चित हो सके। यह सिर्फ़ राहत का सवाल नहीं, बल्कि विश्वास और इंसाफ़ का सवाल है। अगर इस बार भी चुप्पी रही, तो यह चुप्पी आने वाले समय में मीडिया से जुड़े हर आदमी को डराएगी।
अख़बार बंद, लेकिन सवाल ज़िंदा हैं
आज राष्ट्रीय सहारा छपता नहीं है, लेकिन उससे जुड़े हज़ारों लोगों की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। सवाल सिर्फ़ अख़बार बंद होने का नहीं—सम्मान, सुरक्षा और इंसानी गरिमा का है। अब यह देखना है कि सिस्टम इस ख़ामोशी को सुनता है, या फिर यह भी उन फाइलों में दफ़न कर दिया जाएगा, जिन पर धूल तो जमती है—लेकिन जवाब कभी नहीं मिलता।




