अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो 29 अक्टूबर 2025
पिछले तीन वर्षों से भारत की ऊर्जा जरूरतों की रीढ़ बने सस्ते रूसी कच्चे तेल की रणनीतिक साझेदारी, अब अमेरिकी प्रतिबंधों और बढ़ते व्यापारिक दबावों के चलते एक गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी है, जिसकी सबसे बड़ी वजह डीडब्ल्यू की वह रिपोर्ट है जिसके अनुसार भारत रूस से तेल आयात में कटौती या अस्थायी रोक लगाने पर विचार कर रहा है, जबकि वर्तमान में रूस भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 35-40 प्रतिशत आपूर्ति करता है।
यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में रूसी तेल की भारी छूट का लाभ उठाते हुए, भारत ने अपने आयात रुख को मध्य पूर्व से रूस की ओर निर्णायक रूप से मोड़ दिया था, जिससे युद्ध-पूर्व का केवल 1-2 प्रतिशत आयात बढ़कर लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच गया, जिससे ऊर्जा ट्रैकिंग फर्म केप्लर (Kpler) के अनुसार 2025 के पहले नौ महीनों में भारत ने औसतन 1.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन रूसी तेल खरीदा, जिससे देश को अरबों डॉलर की बचत हुई और ईंधन की घरेलू कीमतें स्थिर बनी रहीं, हालांकि पश्चिमी देशों की आलोचना के बावजूद भारत ने “बाजार आधारित ऊर्जा सुरक्षा” के अपने रुख को स्पष्ट बनाए रखा।
यह स्थिति तब गंभीर हो गई जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगस्त 2025 में भारत के निर्यात पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने की घोषणा की, जिसका आधा हिस्सा “रूसी तेल से जारी व्यापार” के लिए दंडस्वरूप था, और 21 अक्टूबर 2025 को अमेरिकी वित्त मंत्रालय द्वारा रूस की दो प्रमुख तेल कंपनियों लुकऑइल और रोसनेफ्ट पर नए प्रतिबंध लगा दिए गए, जिसके तहत किसी भी भारतीय बैंक या रिफाइनरी जैसी विदेशी इकाई को 21 नवंबर तक लेन-देन समाप्त करना होगा, अन्यथा द्वितीयक प्रतिबंध लागू होंगे।
इन प्रतिबंधों ने भारतीय ऊर्जा तंत्र को गहरा झटका दिया है, जिसके कारण कई बैंकों ने युआन और दिरहम आधारित रूसी भुगतान मार्गों पर अस्थायी रोक लगा दी है, और पहले से लगे अमेरिकी टैरिफ के कारण द्विपक्षीय व्यापार मई-सितंबर 2025 के बीच 37.5 प्रतिशत घटकर 5.5 अरब डॉलर रह गया है, जो आर्थिक संकट का स्पष्ट संकेत है। नतीजतन, भारत की सबसे बड़ी निजी रिफाइनरी रिलायंस इंडस्ट्रीज ने रोसनेफ्ट के साथ लंबे अनुबंध को आंशिक रूप से रोकने की तैयारी शुरू कर दी है।
जबकि सरकारी कंपनियाँ (IOC, BPCL, HPCL) फिलहाल ‘वेट-एंड-वॉच’ नीति पर हैं और इराक, गयाना, ब्राजील तथा यूएई से विकल्प तलाश रही हैं, लेकिन आर्यस्ताड एनर्जी के पंकज श्रीवास्तव जैसे विश्लेषक आगाह करते हैं कि इन विकल्पों की कीमतें रूसी छूट जितनी प्रतिस्पर्धी नहीं होंगी, जिससे रिलायंस जैसे खिलाड़ियों की लाभप्रदता प्रभावित होगी।
राजनयिक विश्लेषण के अनुसार, पूर्व राजदूत मीरा शंकर मानती हैं कि यदि रूसी तेल बाजार से पूरी तरह हट गया तो यह अमेरिका और यूरोप दोनों के लिए भी ऊर्जा कीमतें अस्थिर कर देगा, जबकि पूर्व राजनयिक अजय बिसारिया ने कहा है कि जब प्रतिबंध बैंकों और बीमा कंपनियों को प्रभावित करते हैं, तो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता भी सीमित हो जाती है।
आर्थिक विशेषज्ञ लेखा चक्रवर्ती ने आगाह किया है कि यदि भारत रूसी तेल आयात कम करता है, तो घरेलू ईंधन कीमतों में 8-10 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है, जो 7 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि लक्ष्य पर असर डालेगी। हालांकि, भविष्य के संकेत यह दर्शाते हैं कि भारत अल्पावधि में आयात घटा सकता है, लेकिन “तीसरे देशों” (जैसे दुबई या तुर्की) के माध्यम से सीमित मात्रा में रूसी तेल खरीद जारी रख सकता है। अंततः, भारत की दुविधा स्पष्ट है — अमेरिकी दबाव में झुकना या रूस के साथ सस्ती ऊर्जा साझेदारी जारी रखना, और इस पूरे परिदृश्य में भारत की ऊर्जा नीति का सबसे बड़ा लक्ष्य अब यह है कि वह “तेल की निर्भरता नहीं, ऊर्जा की स्वतंत्रता” प्राप्त करे।
क्या आप चाहेंगे कि मैं इस रिपोर्ट के आधार पर भारत की “स्वतंत्र ऊर्जा नीति बनाम पश्चिमी दबाव” पर एक तीखा विश्लेषण और निष्कर्षों वाला संपादकीय (Opinion Piece) तैयार करूँ, जैसा कि आपने सुझाव दिया था?




