महेंद्र सिंह | नई दिल्ली, 23 नवंबर 2025
भारत के परमाणु इतिहास में 63 साल बाद पहली बार ऐसा बड़ा दरवाज़ा खुलने जा रहा है, जिसे ऊर्जा क्षेत्र की सबसे बड़ी क्रांति बताया जा रहा है। आगामी 1 दिसंबर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में सरकार परमाणु ऊर्जा (संशोधन) विधेयक 2025 पेश करने जा रही है, जिसके पारित होते ही भारत के सिविल न्यूक्लियर सेक्टर पर सरकारी एकाधिकार समाप्त हो जाएगा। अब तक देश में सिर्फ सरकारी संस्थान जैसे NPCIL ही न्यूक्लियर प्लांट बना और चला सकते थे, लेकिन नए प्रस्ताव के तहत टाटा, रिलायंस, अडानी जैसी बड़ी भारतीय निजी कंपनियाँ भी न्यूक्लियर प्लांट स्थापित कर सकेंगी। सरकार का दावा है कि यह कदम भारत को ऊर्जा महाशक्ति बनाने की दिशा में निर्णायक साबित होगा।
नए संशोधन बिल के तहत निजी कंपनियाँ अब NPCIL के साथ मिलकर जॉइंट वेंचर या PPP मॉडल पर छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) और प्रेशराइज्ड हेवी वॉटर रिएक्टर बना सकेंगी और उनका संचालन भी कर सकेंगी। इन रिएक्टरों की क्षमता 220 मेगावाट से 700 मेगावाट तक होगी। सरकार ने वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट न्यूक्लियर क्षमता बढ़ाने का बड़ा लक्ष्य तय किया है, जिसके लिए हर साल लगभग 30-35 हजार करोड़ रुपये के अतिरिक्त निवेश की जरूरत पड़ेगी। अब यह निवेश निजी कंपनियों से आने की उम्मीद है। सरकार का तर्क है कि जहां एक सरकारी रिएक्टर बनाने में 8-10 साल लग जाते हैं, वहीं निजी कंपनियाँ वही काम 5-6 साल में पूरा कर सकती हैं, जिससे देश की बिजली क्षमता बढ़ाने की रफ्तार तेज होगी।
सरकार इस विधेयक को ऊर्जा क्षेत्र में ऐतिहासिक परिवर्तन के रूप में पेश कर रही है। उसका दावा है कि 2032 तक देश के बिजली उत्पादन में न्यूक्लियर ऊर्जा का हिस्सा मौजूदा 2% से बढ़कर 9-10% हो जाएगा, जिससे कोयले पर निर्भरता कम होगी और कार्बन उत्सर्जन में बड़ी कमी आएगी। इसके साथ ही न्यूक्लियर इंजीनियर, वैज्ञानिक और तकनीशियन जैसी हजारों उच्च कौशल वाली नौकरियों का सृजन होगा। रिपोर्ट्स के अनुसार टाटा, अडानी और रिलायंस पहले ही विदेशी कंपनियों के साथ SMR तकनीक साझा करने के समझौते की दिशा में आगे बढ़ चुके हैं, जिससे भारत में नई तकनीक तेजी से उपलब्ध होने की संभावना है। सरकार का यह भी मानना है कि लंबे समय में न्यूक्लियर प्लांट की लागत कम होगी और बिजली की कीमतें घट सकती हैं, क्योंकि आधुनिक न्यूक्लियर उत्पादन की प्रति मेगावाट लागत अब सौर और पवन ऊर्जा से भी कम होती जा रही है।
हालाँकि जहां सरकार इस बिल को क्रांति बता रही है, वहीं इसके खिलाफ गंभीर चिंताएँ भी सामने आ रही हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि निजी कंपनियाँ मुनाफे के दबाव में सुरक्षा मानकों से समझौता कर सकती हैं, जिससे चेरनोबिल और फुकुशिमा जैसे हादसों का जोखिम बढ़ सकता है। भारत में अब तक रेडियोएक्टिव कचरे के स्थायी निपटान की कोई स्पष्ट व्यवस्था नहीं है, और अगर निजी क्षेत्र में न्यूक्लियर प्लांट बढ़ेंगे तो यह कचरा कई गुना बढ़ जाएगा। इसके अलावा आशंका जताई जा रही है कि न्यूक्लियर सेक्टर में एक नया कॉर्पोरेट एकाधिकार खड़ा हो जाएगा, जिसमें केवल टाटा, रिलायंस और अडानी जैसी बड़ी कंपनियाँ ही कब्जा जमा लेंगी, जबकि छोटे उद्योगों और स्टार्टअप्स के लिए कोई अवसर नहीं बचेगा। सुरक्षा नियामक AERB की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि वह अभी भी सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय के अधीन है, जिससे निगरानी की मजबूती को लेकर संदेह बना हुआ है।
सबसे बड़ा सवाल आपदा प्रबंधन को लेकर खड़ा है। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि गुजरात, महाराष्ट्र या तमिलनाडु जैसे तटीय इलाकों में अगर निजी कंपनियों के न्यूक्लियर प्लांट स्थापित हुए और वहां भूकंप या सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदा आई, तो इसकी जवाबदेही कौन लेगा? क्या निजी कंपनियाँ ऐसे जोखिमों का सामना करने के लिए पर्याप्त तैयार होंगी? क्या सरकार के पास स्पष्ट आपदा प्रबंधन ढांचा मौजूद है? इन सवालों ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है।
सरकार ने इन आरोपों पर अपना बचाव करते हुए कहा है कि यूरेनियम संवर्धन, पुनः प्रसंस्करण (re-processing) और रणनीतिक नियंत्रण पूरी तरह सरकार के पास रहेगा। निजी कंपनियाँ केवल बिजली उत्पादन करेंगी और उनके पास हथियार-grade सामग्री की पहुँच नहीं होगी। सरकार का दावा है कि हर प्रोजेक्ट के लिए AERB से तीन-स्तरीय सख्त मंजूरी जरूरी होगी और सुरक्षा उपायों में कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
सूत्रों के मुताबिक निजी कंपनियाँ इस मौके का फायदा उठाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। टाटा पावर अमेरिका की GE-Hitachi के साथ बातचीत कर रही है, रिलायंस फ्रांस की EDF के साथ समझौते की तैयारी में है और अडानी समूह ने ऑस्ट्रेलिया और कनाडा से यूरेनियम सप्लाई के लिए करार तक कर लिया है। यदि यह बिल संसद से पास हो जाता है, तो संभावना है कि 2026 से देश में पहला निजी न्यूक्लियर रिएक्टर निर्माण की नींव रख दी जाएगी।
फिर भी सबसे बड़ा सवाल वही है—क्या भारत तेज विकास और मुनाफे की होड़ में परमाणु सुरक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर जोखिम उठाने के लिए तैयार है? आने वाला संसद सत्र ही यह तय करेगा कि भारत सचमुच परमाणु ऊर्जा महाशक्ति बनने की ओर बढ़ रहा है या फिर एक ऐसे जोखिम भरे अध्याय में प्रवेश कर रहा है, जिसका परिणाम भविष्य में भारी पड़ सकता है।




