बिहार के सासाराम से एक ऐसी खबर सामने आई है, जो सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। चुनावी ड्यूटी, जनगणना और अन्य सरकारी कामों से जूझ रहे सरकारी शिक्षकों को अब आवारा कुत्तों की गिनती का जिम्मा भी सौंप दिया गया है। सासाराम नगर निगम ने आदेश जारी कर सरकारी शिक्षकों को शहर में घूम-घूमकर स्ट्रे डॉग्स की गिनती करने को कहा है। यह आदेश सामने आते ही शिक्षकों और अभिभावकों के बीच नाराज़गी साफ दिखाई देने लगी है।
असल में, सरकारी शिक्षक अब सिर्फ शिक्षक नहीं रह गए हैं। जनगणना हो तो वही, मतगणना हो तो वही, वोटर लिस्ट सुधार (SIR) हो तो वही, पोलियो अभियान हो तो वही, राशन बंटवाना हो तो वही—और अब कुत्तों की गिनती भी वही करेंगे। यानी पढ़ाने के अलावा हर वह काम, जिसका शिक्षा से कोई लेना-देना नहीं, वह सरकारी टीचर के हिस्से में डाल दिया जाता है। काम की लिस्ट लंबी होती जाती है, लेकिन वेतन वही पुराना और संसाधन वही सीमित।
सबसे हैरानी की बात यह है कि बाद में जब सरकारी स्कूलों के बच्चों के नतीजे खराब आते हैं, तो सबसे पहले उंगली शिक्षकों पर उठाई जाती है। कोई यह नहीं पूछता कि जिस शिक्षक को साल के बड़े हिस्से में क्लासरूम के बाहर सरकारी आदेशों के पीछे दौड़ाया गया, वह बच्चों को पूरा समय कैसे देगा? जब टीचर ब्लैकबोर्ड छोड़कर फाइल, फॉर्म और अब कुत्तों की गिनती में लगा रहेगा, तो पढ़ाई का स्तर कैसे सुधरेगा?
शिक्षा किसी भी देश की रीढ़ होती है, लेकिन यहां रीढ़ को ही हर बोझ उठाने के लिए मजबूर कर दिया गया है। अगर सच में बच्चों का भविष्य सुधारना है, तो जरूरी है कि सरकारी शिक्षकों को उनका मूल काम—पढ़ाना—करने दिया जाए। वरना हालात ऐसे ही चलते रहे, तो कल शायद कहा जाए कि सड़क गड्ढे गिनने या बिजली के खंभे गिनने का काम भी सरकारी टीचर ही करेंगे… और फिर हैरानी जताई जाएगी कि स्कूलों का रिजल्ट क्यों नहीं सुधर रहा।




