पटना/ नई दिल्ली 24 अक्टूबर 2025
बिहार में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के गठबंधन वाली ‘डबल इंजन’ सरकार का खोखलापन अब सरकारी आंकड़ों और विश्वसनीय स्वतंत्र रिपोर्टों के कठोर आईने में बेनकाब हो गया है। जिस ‘सुशासन’ और ‘विकास’ के नारों के दम पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और बीजेपी ने लगभग दो दशकों तक राज्य की सत्ता संभाली, वही नारे आज बिहार की आर्थिक और सामाजिक बदहाली के सबसे बड़े गवाह बन चुके हैं। देश का यह सबसे गरीब राज्य विकास के हर महत्वपूर्ण पैमाने पर लगातार सबसे निचले पायदान पर बना हुआ है। यह स्थिति कोई राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि वास्तविक, सत्यापित तथ्यों पर आधारित है। ‘डबल इंजन’ के वादे के बावजूद, बिहार में पिछले दो दशकों में गरीबी कम होने की बजाय, राज्य पर कर्ज का बोझ कई गुना बढ़ गया है, जिससे स्पष्ट होता है कि यह गठबंधन विकास का नहीं, बल्कि वित्तीय कुप्रबंधन और प्रशासनिक अक्षमता का एक ज्वलंत उदाहरण है।
बिहार की अर्थव्यवस्था: सबसे कम प्रति व्यक्ति आय और 16 गुना बढ़ा कर्ज़
बिहार की अर्थव्यवस्था की तस्वीर बेहद निराशाजनक है, जो ‘डबल इंजन’ के दावों पर प्रश्नचिह्न लगाती है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) आज भी भारत के सभी राज्यों में सबसे कम है, जो न केवल पड़ोसी राज्य ओडिशा के मुकाबले एक-तिहाई है, बल्कि झारखंड के आधे के बराबर भी नहीं है। विकास की धीमी गति का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि 2005 में जब नीतीश कुमार सत्ता में आए थे, तब बिहार पर 43,000 करोड़ रुपये का कर्ज था, जो 2024 तक बढ़कर चौंकाने वाले 3,19,000 करोड़ रुपये हो गया है—यानी कर्ज में लगभग 16 गुना की अभूतपूर्व वृद्धि।
यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि ‘डबल इंजन सरकार’ ने राज्य को कथित विकास की राह पर ले जाने के बजाय, कर्ज की एक भयानक दलदल में धकेल दिया है। इस बेतहाशा कर्ज़ वृद्धि के बावजूद, आम जनता के जीवन स्तर में कोई गुणात्मक सुधार न होना, सीधे तौर पर सरकारी प्राथमिकताओं और वित्तीय कुप्रबंधन की गंभीर विफलता को उजागर करता है।
धन का कुप्रबंधन: स्वास्थ्य और शिक्षा में ‘सुसाशन’ नहीं, बल्कि ‘सुशोशन’
बढ़ते कर्ज और बजट के बावजूद, सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह विशाल धनराशि आखिर गई कहाँ? रिपोर्टें और जमीनी हकीकत बताती हैं कि इस पैसे का उपयोग न तो राज्य के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में हुआ, न ही रोजगार सृजन में और न ही शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में। राज्य के अधिकांश सरकारी स्कूल और अस्पताल आज भी भयानक बदहाली और अराजकता का शिकार हैं, जिससे 80% परिवार सरकारी अस्पतालों में इलाज कराने से बचते हैं क्योंकि वहाँ विशेषज्ञ डॉक्टर तो दूर, सामान्य चिकित्सक, आवश्यक सुविधाएँ या दवाइयाँ तक उपलब्ध नहीं हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति बदतर है, जहाँ 90% से अधिक लोगों ने 12वीं तक की पढ़ाई पूरी नहीं की है। यह स्पष्ट रूप से ‘सुसाशन’ नहीं, बल्कि ‘सुशोशन’ है, जहाँ बजट तो हर साल बढ़ता रहा, लेकिन जनता की मूलभूत ज़रूरतें बदतर होती गईं। सरकारी खज़ाने से पैसा तो निकला, लेकिन वह आम आदमी की ज़िंदगी को सुधारने में खर्च होने की बजाय, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ गया, जिससे राज्य के स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र अपनी अंतिम साँसें गिन रहे हैं।
जातीय गणना का शर्मनाक प्रमाण: 94 लाख परिवार ₹200 प्रतिदिन से कम पर निर्भर
बिहार सरकार द्वारा दो साल पहले जारी की गई जातीय गणना रिपोर्ट ने राज्य में गरीबी और सरकारी नाकामी का एक शर्मनाक और हृदयविदारक प्रमाण प्रस्तुत किया। इस रिपोर्ट ने स्पष्ट रूप से उजागर किया कि राज्य के 94 लाख परिवार आज भी ₹200 प्रतिदिन से कम की आय पर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। यह आंकड़ा बिहार की गरीबी का मात्र एक संकेत नहीं, बल्कि सरकारी नाकामी का एक असहनीय प्रमाण है।
समावेशी विकास के तमाम दावों के बावजूद, 95% परिवारों के पास आज भी अपना निजी वाहन नहीं है, 2.2 करोड़ लोग केवल दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर हैं, और शिक्षा के स्तर में सुधार की कमी साफ झलकती है। यह वही बिहार है जहाँ हर चुनाव में “विकास,” “डबल इंजन,” और “बदलाव” जैसे आकर्षक शब्दों की गूँज होती है, लेकिन इन नारों और भाषणों की आड़ में, हकीकत में विकास सिर्फ पोस्टर और विज्ञापनों तक ही सीमित रहा है। ये आंकड़े बताते हैं कि जेडीयू और बीजेपी की गठबंधन सरकार केवल सत्ता-साझेदारी और वोट-बैंक की राजनीति में व्यस्त रही, जबकि राज्य की गरीब और वंचित जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया गया।
‘डबल इंजन’ की असफलता: ठहराव, कर्ज़ और पलायन का दुष्चक्र
जेडीयू और बीजेपी के बीच की साझेदारी, जिसे ‘डबल इंजन’ नाम दिया गया था, का मुख्य वादा यह था कि केंद्र और राज्य की संयुक्त ताकत से विकास की गति तेज़ होगी, लेकिन इसका परिणाम ठीक विपरीत रहा। सच्चाई यह है कि दोनों इंजनों ने एक-दूसरे को खींचकर विकास की पटरियों से उतार दिया। केंद्र सरकार ने बिहार में अपेक्षित निवेश और विशेष ध्यान नहीं दिया, और राज्य सरकार प्रशासनिक सुधारों और प्रभावी शासन को लागू करने में पूरी तरह विफल रही। परिणामस्वरूप, बिहार का विकास वहीं स्थगित हो गया। 2024 तक भी बिहार का औद्योगिक विकास दर देश में सबसे कम है, शिक्षा और स्वास्थ्य के सूचकांक सबसे निचले स्तर पर हैं, और प्रति व्यक्ति आय में सुधार लगभग शून्य है।
इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि बिहार में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से दोगुनी है। The Indian Express जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों के संपादकीय भी यह स्पष्ट करते हैं कि ये संख्याएँ दर्शाती हैं कि जेडीयू-बीजेपी गठबंधन बिहार को आगे बढ़ाने में बुरी तरह विफल रहा है। ‘सुशासन’ का नारा केवल सत्ता-साझेदारी के मुनाफे में बदल गया है, जिसने बिहार को ठहराव, कर्ज़ और पलायन के एक दुष्चक्र में फंसा दिया है।
जनता का मूड और भविष्य की आंधी: ‘डबल विनाश’ का अंत
बिहार की जनता अब यह स्पष्ट रूप से समझ चुकी है कि 19 साल पुराने इस शासन ने उन्हें सिर्फ़ सपने और थोथे भाषण दिए हैं। गांवों में न तो रोज़गार है, न शिक्षा का भरोसा, और न ही स्वास्थ्य की कोई सुरक्षा। दशकों से चली आ रही गरीबी, बड़े पैमाने पर पलायन, और आम आदमी के अपमान की स्थिति बनी हुई है। बिहार के युवाओं की झोली में “डिग्री बिना नौकरी” है, किसानों के हाथ में “कर्ज़ बिना फसल” है, और मजदूरों के पास “श्रम बिना सम्मान” है।
आज बिहार का हर आंकड़ा, हर रिपोर्ट और आमजन का हर चेहरा यही चीख-चीख कर कह रहा है—”यह डबल इंजन नहीं, डबल विनाश की सरकार है।” नीतीश कुमार और बीजेपी की यह जोड़ी विकास की नहीं, बल्कि केवल वोटों और सत्ता की साझेदारी थी। बिहार के बच्चे आज भी बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली-मुंबई की ओर पलायन कर रहे हैं, जबकि सरकारी स्कूल और अस्पताल बंद पड़े हैं। ‘डबल इंजन’ के नाम पर बिहार का बंटाधार हो चुका है, और अब जनता ही इस भ्रष्ट और विफल इंजन को रोकने की शक्ति रखती है।




