महेंद्र सिंह, वरिष्ठ पत्रकार | मुंबई 31 अक्टूबर 2025
अजीत आगरकर और BCCI ने वह अपराध किया है जिसे भारतीय क्रिकेट का इतिहास कभी माफ नहीं करेगा। उन्होंने चयनकर्ता के पवित्र पद को राजनीति और व्यक्तिगत खुन्नस के ज़हर से इस कदर दूषित कर दिया कि आज पूरा देश आक्रोशित है। आने वाले समय में जब भी चयनकर्ताओं के कार्यकाल का मूल्यांकन होगा, अजीत आगरकर का नाम उस काले पन्ने पर दर्ज होगा जहाँ पद की ऊँचाई से ज़्यादा, सोच की नीचता झलकेगी।
इतने ऊँचे पद पर बैठकर इतनी छोटी और घटिया राजनीति — यही उनकी सबसे बड़ी नाकामी है। वह उस दौर के कप्तान के साथ ऐसा अन्याय कर गए, जिसने भारतीय क्रिकेट को गौरव की बुलंदियों तक पहुँचाया। रोहित शर्मा, जो आज भी विश्व क्रिकेट के सर्वश्रेष्ठ ODI बल्लेबाज़ हैं, जिन्होंने अपनी कप्तानी में एक साल के अंदर T20 विश्वकप और चैंपियंस ट्रॉफी जीतकर खुद को हर मायने में विजेता साबित किया — ऐसे कप्तान को उन्होंने अपमानित कर किनारे लगा दिया।
“2027 वर्ल्ड कप” — एक सपना, जिसे साज़िश ने तोड़ दिया:
रोहित शर्मा का अगला मिशन था 2027 का वनडे विश्वकप। यह केवल एक टूर्नामेंट नहीं था, बल्कि एक कप्तान का स्वप्न था — भारत को फिर से विश्व चैंपियन बनते देखने का सपना। लेकिन अजीत आगरकर और उनके साथियों ने उस सपने को बर्बाद कर दिया। बिना किसी तर्कसंगत कारण के, बिना किसी क्रिकेटिंग लॉजिक के, उन्हें कप्तानी से हटा दिया गया।
आज तक कोई भी यह नहीं बता सका कि आखिर ऐसा क्यों किया गया? कौन-सा प्रदर्शन, कौन-सी असफलता इस निर्णय को सही ठहराती है? जवाब किसी के पास नहीं, क्योंकि सच्चाई यह है कि यह निर्णय क्रिकेट नहीं, राजनीति से प्रेरित था।
गंभीर सवाल — क्या इस साज़िश में गौतम गंभीर भी शामिल हैं?
क्रिकेट जगत में अब यह चर्चा जोरों पर है कि इस पूरे घटनाक्रम में गौतम गंभीर की भूमिका संदिग्ध रही है। यदि इस साज़िश में उनका भी हाथ है, तो यह निश्चित रूप से भारतीय क्रिकेट के इतिहास पर सबसे बड़ा धब्बा है। गंभीर, जो स्वयं एक खिलाड़ी रह चुके हैं, उनसे ऐसी संकीर्ण मानसिकता की उम्मीद किसी ने नहीं की थी। परंतु, रोहित शर्मा के प्रति जो व्यक्तिगत जलन और द्वेष इस पूरी टीम से झलक रहा है, वह अब किसी से छिपा नहीं है।
इन लोगों ने न सिर्फ़ एक कप्तान का अपमान किया, बल्कि एक पूरी क्रिकेटिंग संस्कृति को आहत किया है। जब खेल भावना की जगह ‘राजनीति’ हावी हो जाए, तो जीत भी हार जैसी लगने लगती है।
विराट और रोहित — मजबूर होकर लिया संन्यास:
सबसे दर्दनाक बात यह रही कि अजीत आगरकर के अपमानजनक रवैये और मनमानी के चलते ही रोहित शर्मा और विराट कोहली दोनों ने आख़िरी टेस्ट मैच खेले बिना ही टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लेने का निर्णय लिया। यह सिर्फ़ उनका निजी निर्णय नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था के खिलाफ एक मौन विद्रोह था जिसने दो महान खिलाड़ियों की गरिमा को पैरों तले रौंद डाला।
विराट और रोहित — दो ऐसे नाम जिन्होंने भारतीय क्रिकेट को एक युग दिया — उन्हें “सेलेक्शन पॉलिटिक्स” ने इस तरह किनारे कर दिया मानो वे किसी खेल की नहीं, सत्ता की लड़ाई के मोहरे हों। यह भारतीय क्रिकेट के लिए एक युगांतकारी शर्म का पल है।
अजीत आगरकर का कार्यकाल — राजनीति के दलदल में डूबी एक काली दास्तान:
भविष्य में जब कोई क्रिकेट इतिहास पढ़ेगा, तो अजीत आगरकर का नाम एक चेतावनी के रूप में दर्ज रहेगा — कैसे एक चयनकर्ता ने अपनी कुंठा, जलन और व्यक्तिगत द्वेष से भारतीय क्रिकेट को भीतर से खोखला कर दिया।
उन्होंने एक विजेता कप्तान का मनोबल तोड़ा, टीम की आत्मा को घायल किया, और उस संस्थान की विश्वसनीयता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया जो कभी भारतीय गौरव का प्रतीक था।
यह केवल एक खिलाड़ी के साथ अन्याय नहीं — यह भारतीय क्रिकेट की आत्मा पर हमला है:
रोहित शर्मा का अपमान, विराट कोहली की चुप्पी और खिलाड़ियों की आंतरिक वेदना — यह सब मिलकर भारतीय क्रिकेट के भीतर की उस सच्चाई को उजागर करते हैं, जहाँ खेल नहीं, सियासत खेली जा रही है।
यह राष्ट्रीय शर्म का विषय है कि जहाँ खेल भावना की बात होनी चाहिए थी, वहाँ घटिया राजनीति और निजी ईगो का खेल खेला जा रहा है।
अजीत आगरकर और उनके साथियों ने भारतीय क्रिकेट की सबसे खतरनाक मिसाल पेश की है। उन्होंने साबित कर दिया कि जब “सेलेक्शन” पर सियासत हावी हो जाती है, तो कर्मठता और योग्यता हार जाती है। यह लड़ाई सिर्फ़ रोहित शर्मा या विराट कोहली की नहीं है — यह उस हर क्रिकेट प्रेमी की लड़ाई है जो चाहता है कि मैदान पर खेल, राजनीति नहीं, चले।इतिहास आगरकर को माफ नहीं करेगा — क्योंकि उन्होंने सिर्फ़ एक कप्तान को नहीं गिराया, उन्होंने पूरे भारतीय क्रिकेट की आत्मा को ठेस पहुँचाई है।




