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इंदौर में पानी नहीं, ज़हर बंटा : दूषित पानी से मौतों पर राहुल गांधी का सरकार पर तीखा हमला, बोले—गरीब बेबस है

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परवेज खान | इंदौर 2 जनवरी 2026

इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह कोई सामान्य प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि आम आदमी की ज़िंदगी से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है। जिन लोगों की मौत हुई, वे कोई बड़ी मांग नहीं कर रहे थे—बस साफ़ और पीने लायक पानी चाहते थे। इसी दर्दनाक पृष्ठभूमि में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सरकार पर सीधा और तीखा हमला बोलते हुए कहा कि “इंदौर में पानी नहीं, जहर बांटा गया।” उनके इस बयान ने इस त्रासदी को सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं, बल्कि शासन और व्यवस्था की संवेदनहीनता का प्रतीक बना दिया है।

राहुल गांधी ने सोशल मीडिया के ज़रिये कहा कि दूषित पानी से लोगों की मौतें यह दिखाती हैं कि देश में सबसे बुनियादी सुविधा—साफ़ पानी—भी गरीबों के लिए सुरक्षित नहीं रह गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकारें बड़े-बड़े विकास के दावे करती हैं, स्मार्ट सिटी और अमृत योजनाओं की बात होती है, तब आम बस्तियों में लोगों को ज़हर मिला पानी क्यों पीना पड़ रहा है? राहुल गांधी के शब्दों में यह केवल प्रशासन की नाकामी नहीं, बल्कि गरीबों की ज़िंदगी के प्रति सरकार की बेरुख़ी है।

इस पूरे मामले में सबसे ज़्यादा मार उन लोगों पर पड़ी है जो पहले से ही संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। झुग्गी-बस्तियों और गरीब इलाकों में रहने वाले लोग न तो महंगा बोतलबंद पानी खरीद सकते हैं और न ही उनके पास इलाज के बेहतर साधन होते हैं। दूषित पानी पीने से बीमार पड़ने या जान गंवाने के बाद भी उनके पास लड़ने की ताक़त नहीं होती। राहुल गांधी ने इसी सच्चाई की ओर इशारा करते हुए कहा कि गरीब आदमी बेबस है—वह न सवाल पूछ पाता है, न जवाब मांग पाता है।

स्थानीय स्तर पर यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर पानी की सप्लाई में इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हुई। क्या पाइपलाइन की जांच नहीं हुई? क्या पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच की कोई व्यवस्था नहीं थी? अगर थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? इन सवालों के जवाब अब तक साफ़ नहीं हैं। सरकार और प्रशासन की ओर से आश्वासन तो दिए जा रहे हैं, लेकिन जिन परिवारों ने अपने लोगों को खो दिया, उनके लिए ये आश्वासन बहुत खोखले लगते हैं।

राजनीतिक बयानबाज़ी से अलग, यह घटना देश के शहरी ढांचे और बुनियादी सेवाओं की हकीकत को भी उजागर करती है। साफ़ पानी जैसी ज़रूरत अगर सुरक्षित नहीं है, तो विकास के दावे किस काम के? राहुल गांधी का हमला दरअसल इसी सवाल को केंद्र में लाता है—कि विकास का मतलब सिर्फ इमारतें और योजनाएं नहीं, बल्कि आम आदमी की सुरक्षित ज़िंदगी है।

इंदौर की यह त्रासदी एक चेतावनी है। यह बताती है कि अगर बुनियादी सेवाओं में लापरवाही जारी रही, तो सबसे ज़्यादा नुकसान गरीबों को ही उठाना पड़ेगा। राहुल गांधी के शब्दों में, जब तक सरकार की प्राथमिकताओं में गरीब की ज़िंदगी सबसे ऊपर नहीं होगी, तब तक “पानी” और “ज़हर” के बीच का फर्क सिर्फ भाषणों में ही रह जाएगा।

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