Home » National » कोई धर्म प्रदूषण की इजाज़त नहीं देता, पर्यावरण संरक्षण पर अपनाएं शून्य सहिष्णुता: जस्टिस अभय एस. ओका

कोई धर्म प्रदूषण की इजाज़त नहीं देता, पर्यावरण संरक्षण पर अपनाएं शून्य सहिष्णुता: जस्टिस अभय एस. ओका

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

नई दिल्ली 30 अक्टूबर 2025

 जैसे-जैसे दिल्ली और एनसीआर का आसमान दिवाली के बाद फिर से धुंध और जहरीली हवा में डूबा दिखाई दे रहा है, वैसे-वैसे देश में एक बार फिर यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि आखिर धार्मिक उत्सवों और सामाजिक परंपराओं के नाम पर पर्यावरण की बलि कब तक दी जाती रहेगी। इस गंभीर और संवेदनशील समय में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय एस. ओका ने एक महत्वपूर्ण और नैतिक रूप से सशक्त संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि “कोई भी धर्म प्रदूषण फैलाने या पर्यावरण को नष्ट करने की अनुमति नहीं देता।” उन्होंने देश की सभी अदालतों से आग्रह किया कि वे पर्यावरणीय कानूनों के उल्लंघन पर शून्य सहिष्णुता (Zero Tolerance) का रुख अपनाएं, क्योंकि प्रकृति के साथ समझौता किसी भी धार्मिक स्वतंत्रता या सांस्कृतिक परंपरा के नाम पर उचित नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस ओका ने कहा कि पटाखे फोड़ना, अत्यधिक लाउडस्पीकरों का उपयोग करना और मूर्तियों का नदियों में विसर्जन — ये सब ऐसी गतिविधियाँ हैं जो धार्मिक प्रथाओं के नाम पर की जाती हैं, लेकिन इनका परिणाम समाज और पर्यावरण दोनों के लिए विनाशकारी होता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि किसी धर्म में ऐसा कोई उपदेश नहीं है जो इंसान, पशु-पक्षियों या पेड़-पौधों को नुकसान पहुँचाने की इजाज़त देता हो। उनके अनुसार, “आस्था” तब तक पवित्र है जब तक वह जीवन का सम्मान करती है, लेकिन जैसे ही वह दूसरों के जीवन या पर्यावरण को हानि पहुँचाने लगती है, वह अपने आध्यात्मिक मूल्य खो देती है।

जस्टिस ओका ने यह भी कहा कि आज सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि राजनीतिक और धार्मिक नेता इस विषय पर चुप्पी साधे हुए हैं। उन्होंने कहा कि जिन नेताओं को समाज को मार्गदर्शन देना चाहिए, वही लोग कभी-कभी ऐसे कृत्यों को बढ़ावा देते हैं जो प्रदूषण फैलाते हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुँचाते हैं। उन्होंने कहा कि “दुर्भाग्य से समाज में भी ऐसे लोगों की कमी है जो पर्यावरण की रक्षा के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने वालों का समर्थन करें।” कई बार न्यायाधीश जो पर्यावरणीय संरक्षण के पक्ष में निर्णय देते हैं, उन्हें विकास विरोधी कहकर आलोचना का निशाना बनाया जाता है। यह मानसिकता समाज के लिए उतनी ही खतरनाक है जितनी जहरीली हवा हमारे फेफड़ों के लिए।

उन्होंने कहा कि यह धारणा बिल्कुल गलत है कि पटाखे केवल दिवाली पर ही फोड़े जाते हैं। जस्टिस ओका ने बताया कि अब यह प्रवृत्ति क्रिसमस, नए साल और यहां तक कि शादियों में भी देखी जाती है, चाहे वे किसी भी धर्म से संबंधित हों। इसीलिए उन्होंने कहा कि यह मुद्दा केवल हिंदू त्योहारों तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी धर्मों के अनुयायियों के लिए आत्मनिरीक्षण का विषय है। उन्होंने सख्त लहजे में पूछा — “क्या कोई यह कह सकता है कि पटाखे फोड़ना या लाउडस्पीकर बजाना किसी धर्म का अभिन्न हिस्सा है? इसका उत्तर निश्चित रूप से ‘नहीं’ है।”

जस्टिस ओका ने कहा कि अगर हम वास्तव में हर धर्म की शिक्षाओं की गहराई से समीक्षा करें, तो पाएंगे कि हर धर्म हमें पर्यावरण की रक्षा, करुणा और सह-अस्तित्व का संदेश देता है। इस्लाम में ‘ख़िलाफ़त’ यानी पृथ्वी की देखभाल की जिम्मेदारी का विचार है, हिंदू धर्म में ‘प्रकृति पूजा’ और ‘पंचतत्वों’ की पवित्रता का भाव है, बौद्ध और जैन धर्म में अहिंसा और जीवन के प्रति सम्मान सर्वोच्च है, और ईसाई धर्म में सृष्टि के संरक्षण को ईश्वर की सेवा माना गया है। इसलिए यह दावा करना कि प्रदूषण या शोर किसी धार्मिक अभ्यास का हिस्सा है — न केवल गलत है बल्कि ईश्वर के प्रति भी अन्याय है। उन्होंने कहा कि “कोई भी धर्म हमें प्रकृति को नष्ट करने, या त्यौहारों के दौरान पशुओं के साथ क्रूरता करने की इजाज़त नहीं देता।”

उन्होंने न्यायपालिका की भूमिका पर भी बल दिया। जस्टिस ओका ने कहा कि अदालतों को पर्यावरणीय कानूनों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त और निर्णायक कार्रवाई करनी चाहिए। न्यायाधीशों को किसी भी परिस्थिति में “लोकप्रिय भावना या धार्मिक दबाव” के प्रभाव में नहीं आना चाहिए। उन्होंने कहा कि पर्यावरण न्याय, मूल अधिकारों और मौलिक कर्तव्यों दोनों पर आधारित है, और जब बात आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व की हो, तो अदालतों का दायित्व और भी बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि अगर वास्तव में हमें संविधान की आत्मा का सम्मान करना है, तो हमें यह मानना होगा कि पर्यावरण संरक्षण एक नैतिक और संवैधानिक कर्तव्य है।

जस्टिस ओका ने यह भी कहा कि सबसे दुखद स्थिति यह है कि आज कोई भी राजनीतिक नेता जनता से यह अपील नहीं करता कि त्योहार मनाते समय प्रदूषण न करें, या पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाएँ। बल्कि, कई बार राजनीतिक वर्ग इस प्रदूषणकारी संस्कृति को “लोकप्रियता के हथियार” के रूप में इस्तेमाल करता है। उन्होंने कहा कि “यह प्रवृत्ति सभी धर्मों में समान रूप से देखी जा सकती है, और यह समय है कि समाज इसे नकारे।”

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश का भी उल्लेख किया जिसमें एनसीआर क्षेत्र में वर्षों से लगे पूर्ण प्रतिबंध के बाद ‘ग्रीन पटाखों’ की सीमित बिक्री और उपयोग की अनुमति दी गई है। अदालत ने यह अनुमति केवल एक नियंत्रित समय सीमा के भीतर दी है, ताकि परंपरा और पर्यावरण दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सके। जस्टिस ओका ने कहा कि यह आदेश यह स्पष्ट करता है कि कानून का उद्देश्य धार्मिक आस्था को दबाना नहीं, बल्कि पर्यावरण की रक्षा करना है।

आखिर में जस्टिस ओका का संदेश बहुत स्पष्ट और गूंजदार था — “आस्था अपनी जगह है, लेकिन प्रकृति से बड़ी कोई पूजा नहीं। यदि हम सच में ईश्वर की सृष्टि का सम्मान करना चाहते हैं, तो हमें प्रदूषण के खिलाफ शून्य सहिष्णुता की नीति अपनानी होगी।” उन्होंने कहा कि यह समय समाज, प्रशासन, और न्यायपालिका तीनों के एकजुट होकर काम करने का है। प्रदूषण केवल हवा में नहीं, बल्कि हमारी सोच में भी फैल चुका है, और जब तक हम इसे नैतिक जिम्मेदारी के रूप में नहीं लेंगे, तब तक कोई भी नीति प्रभावी नहीं होगी।

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments