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NH-66 बना मौत का हाईवे—कोट्टियम में बिना बारिश सड़क धँसी, निर्माण की लापरवाही और भ्रष्टाचार बेनक़ाब

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तिरुवनंतपुरम 6 दिसंबर 2025

केरल में नेशनल हाईवे–66 एक बार फिर बदहाली का प्रतीक बनकर सामने आया है। कोल्लम जिले के कोट्टियम के पास मेवरम–कडमट्टुकोनम सेक्शन पर निर्माणाधीन मार्ग का बड़ा हिस्सा अचानक धँस गया, जिससे सड़क लगभग 500 मीटर तक बैठ गई और चार वाहन खंड में फंस गए। हैरानी की बात यह है कि तटबंध (एंबैंकमेंट) बिना भारी बारिश, बिना भूस्खलन और बिना किसी मौसमीय दबाव के ढह गया—यानी यह दुर्घटना पूरी तरह संरचनात्मक खामियों और घटिया निर्माण का परिणाम प्रतीत होती है। आसपास के धान के खेतों के पास नरम मिट्टी और जलदबाव को संभावित कारण बताया जा रहा है, लेकिन स्थानीय निवासियों और विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या इससे कहीं अधिक गहरी है—यह राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण में व्याप्त सिस्टमेटिक लापरवाही और भ्रष्टाचार की परिचायक है।

स्थानीय लोगों ने पहले ही चेतावनी दी थी कि इस हिस्से में जलभराव, नींव का असमान ढांचा और बेहद खराब निर्माण पद्धति बड़ा जोखिम पैदा कर रही है। इसके बावजूद, न तो ठेकेदारों ने इसे गंभीरता से लिया, और न ही निगरानी एजेंसियों ने गुणवत्ता परीक्षण के आधार पर कोई कड़ा कदम उठाया। अब हादसे के बाद एनएचएआई जांच कर रहा है, जबकि केरल सरकार ने भी औपचारिक जांच का आदेश दिया है, यह कहते हुए कि राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण और सुरक्षा केंद्र सरकार की सीधी निगरानी में आते हैं। लेकिन यह तथ्य छिपा नहीं है कि कुछ महीने पहले ही कोट्टक्कल के पास NH-66 का एक पूरा तटबंध भारी बारिश के दौरान धंसकर धान के खेत में समा गया था। यानी यह घटना कोई संयोग नहीं—बल्कि लगातार होने वाली ऐसी दुर्घटनाएँ यह साफ संकेत देती हैं कि NH-66 गंभीर संरचनात्मक विफलता और गलत इंजीनियरिंग का शिकार है।

आरोप यह भी हैं कि NH-66 निर्माण को लेकर खर्च और ठेकों की राशि वास्तविक लागत से कई गुना ज्यादा दिखाई जाती है। स्थानीय विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता बार-बार यह सवाल उठा रहे हैं कि जब सड़कें थोड़ी बारिश, हल्के दबाव या सामान्य परिस्थितियों में भी नहीं टिक पातीं, तो आखिर यह पैसा गया कहाँ? क्या निर्माण में इस्तेमाल सामग्री की गुणवत्ता पर समझौता हुआ? क्या ठेकेदारों और अधिकारियों के बीच मिलीभगत के कारण निरीक्षण औपचारिकता बनकर रह गया? और क्या यह पूरा मॉडल उन inflated contracts का हिस्सा है जहाँ दिखाया जाता कुछ है, और किया कुछ और जाता है? NH-66 के कई हिस्सों में बार-बार धंसान, दरारें, पानी भरना और बुनियादी इंजीनियरिंग विफलता इस बात का संकेत हैं कि यह राजमार्ग “टिकिंग टाइम बम” बन चुका है—जो किसी भी समय, किसी भी स्थान पर बड़े हादसे की वजह बन सकता है।

इन घटनाओं के बीच केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। सोशल मीडिया और स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि केंद्र की महत्वाकांक्षी हाईवे परियोजनाओं की चमकदार छवि के पीछे भ्रष्टाचार, ठेकेदारों की मनमानी और गुणवत्ता नियंत्रण की भारी कमी छिपाई जा रही है। आरोपों में यह तक कहा जा रहा है कि मंत्रालय की मौन स्वीकृति और राजनीतिक संरक्षण के कारण कई बड़े ठेकेदार लगभग “अप्रतिदेय” बन गए हैं। यदि राजमार्ग करोड़ों–अरबों की योजनाओं का दावा करते हैं, लेकिन जमीन पर उनका ढांचा सामान्यतम दबाव में भी ध्वस्त हो जाए, तो यह सिर्फ सिविल इंजीनियरिंग की विफलता नहीं बल्कि नीति, प्रशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही—सभी क्षेत्रों की संयुक्त विफलता है।

NH-66 पर बार-बार हो रही दुर्घटनाएँ अब सिर्फ तकनीकी मुद्दा नहीं रह गई हैं; यह लोगों की सुरक्षा का प्रश्न है, और सरकारी दावों की विश्वसनीयता का भी। कोल्लम से कोट्टक्कल तक फैली यह समस्या संकेत देती है कि जब तक ठेकों का वास्तविक ऑडिट, सामग्री की गुणवत्ता का स्वतंत्र परीक्षण और पारदर्शी जांच नहीं होगी—NH-66 जैसी परियोजनाएँ जनता के लिए खतरा बनी रहेंगी। केरल के नागरिक अब खुलकर कह रहे हैं कि यदि सरकारें चुप रहेंगी, तो उन्हें अपने सफर और अपने बच्चों की सुरक्षा खुद ही सुनिश्चित करनी होगी—क्योंकि सुरंगों, तटबंधों और पुलों के बारे में भरोसा करना अब जोखिम भरा सौदा बन गया है।

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