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न्यूयॉर्क ने दुनिया को सबक दिया: धर्म नहीं, क्षमता मायने — भारत की नफरतपरस्त राजनीति पर करारा तमाचा

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दुनिया के सबसे प्रभावशाली और प्रतिष्ठित शहरों में गिना जाने वाला न्यूयॉर्क, आज भारत को लोकतंत्र का असली आईना दिखा रहा है। जब भारत में वोट देने से पहले आदमी का धर्म, उसकी जाति, उसके खानदान की परीक्षा ली जाती है — उस समय न्यूयॉर्क ने दुनिया को बताया कि जनादेश का फैसला केवल इस पर होना चाहिए कि उम्मीदवार जनता के लिए क्या करेगा। ज़ोहरान ममदानी — एक नाम, जो विविधता का जीवंत उदाहरण है — एक मुस्लिम पिता का बेटा, एक हिंदू माँ का लाल, युगांडा में जन्मा, और एक सीरियन क्रिश्चियन से विवाहित। धर्मशास्त्र वाली राजनीति चाहती तो उनके जीवन की हर परत को विवाद बना सकती थी। लेकिन न्यूयॉर्क की जनता ने यह देखने से साफ़ इनकार कर दिया कि वे किस मजहब के हैं। उन्होंने सिर्फ यह परखा कि यह युवा नेता शहर के हक़ और अधिकार के लिए कितनी लड़ाई लड़ता है। यही वजह है कि एक ईसाई बहुल शहर ने ज़ोहरान ममदानी को अपना मेयर चुनकर दुनिया को यह सन्देश दे दिया — लोकतंत्र अपनी पहचान से नहीं, अपने न्याय से जिंदा रहता है।

और यहाँ सबसे बड़ा प्रश्न भारत के सामने खड़ा होता है: हमारे पास दुनिया की सबसे बड़ी विविधता है, फिर हम सबसे अधिक संदेही क्यों बन गए हैं? जिस देश ने दुनिया को “विश्व बंधुत्व” और “वसुधैव कुटुम्बकम” का संदेश दिया — आज वहीं के कुछ आवाज़ें, जब विदेश में कोई भारतीय-मूल सफल होता है, तो सबसे पहले उसका धर्म देखते हैं और उसके प्यार-संबंध को भी शक की निगाह से आंकते हैं। ज़ोहरान की शादी सीरियन क्रिश्चियन महिला से हुई — अमेरिका ने इसे दो संस्कृतियों का मधुर मिलन माना; वहीं भारत में इस रिश्ते की कहानी किसी दिन “लव-जिहाद” के झूठे फ्रेम में कैद कर दी जाती। सोचिए — अंतरराष्ट्रीय राजनीति वहाँ खड़ी है जहाँ इंसान की नीयत को देखा जाता है; और हम अब भी उन्हीं आरोपों में अटके हैं जो इंसानियत की जड़ों को खोखला करते हैं।

सबसे दिलचस्प और चिंताजनक बात यह है कि अमेरिका में भारतीयों की संख्या लगभग 10 लाख से अधिक है — उनमें से कई ज़ोहरान के ख़िलाफ़ लामबंद हो गए। कारण? वही मानसिक ज़हर जो भारत के भीतर फैला है — कि किसी की पहचान सिर्फ उसके धर्म से तय होगी। यह भारतीय प्रवासियों की उस लकीर को उजागर करता है जिसे वे अनजाने में साथ लेकर बाहर भी जा रहे हैं — जहाँ उन्हें असल में भारतीय संविधान की शिक्षा लेकर जाना चाहिए थी: सबका धर्म बराबर, अधिकार बराबर। इस चुनाव परिणाम ने साबित कर दिया कि अमेरिका के लोकतंत्र ने अभी भी अपने मूल्यों को बचाए रखा है — जहाँ पराया कोई नहीं होता अगर वह जनता का भरोसा जीत सके।

इस ऐतिहासिक जीत ने सिर्फ डोनाल्ड ट्रम्प जैसे नेताओं की राजनीति को धक्का नहीं दिया, बल्कि उन मानसिकताओं को भी करारा जवाब दिया है जो घृणा को आधार बनाकर चुनाव जीतने लगती हैं। ज़ोहरान की जीत कहती है — “डर फैलाने वाली राजनीति की आयु कम होती है, उम्मीद जगाने वाली राजनीति का सफर लंबा और मजबूत होता है।” न्यूयॉर्क ने बताया कि लोकतांत्रिक समाज बदलाव, विविधता और समानता को अपनाकर आगे बढ़ सकता है। आज दुनिया यह स्वीकार कर रही है कि अधिकार के साथ सम्मान भी मिलना चाहिए; पहचान के साथ समानता भी मिलनी चाहिए; और नेता वही है जो कमज़ोर की आवाज़ बन सके, न कि ताकतवर का हथियार।

भारत के लिए यह एक गहरा संदेश है। सवाल यह नहीं कि अमेरिका ने क्या किया — सवाल यह है कि क्या हम अपनी ताकत को पहचानेंगे? क्या हम यह समझ पाएंगे कि धर्म, जाति, खानदान की राजनीति हमें छोटा बनाती है? कि किसी भी इंसान की पहचान का सबसे बड़ा प्रमाण उसका काम और चरित्र है? अगर हमें एक सच्चा लोकतांत्रिक राष्ट्र बनना है — तो हमें वही सीखना होगा जो आज न्यूयॉर्क ने दुनिया को सिखाया है: “लोकतंत्र तब मजबूत होता है, जब समाज अपने हर रंग को इज़्ज़त से अपनाता है।” ज़ोहरान ममदानी की जीत विश्व राजनीति को याद दिलाती है —

बाकी सब हथकंडे हैं, लोकतंत्र का असली धर्म केवल न्याय है।

कॉरपोरेट जगत ने ममदानी को हराने के लिए पूरा पैसा लगा दिया, वहां के बड़े मीडिया ने दिन रात बुराई की, इनके मुस्लिम बैकग्राउंड को लेकर फर्जी मीम बनाए गए, लेकिन इसके बावजूद अपने मुद्दों को लेकर वो टिके रहे और अब उन्होंने इतिहास रच दिया! यह कॉर्पोरेट और मीडिया के साठगांठ के खिलाफ एक बड़ी जीत है.. दुनिया भर में इसे याद रखा जाएगा

ममदानी परिवार का परिचय

ममदानी परिवार एक असाधारण बौद्धिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत का प्रतीक है—ज़ोहरान ममदानी के पिता प्रो. महमूद ममदानी दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित विद्वानों में से एक हैं, जो नई दिल्ली स्थित नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एंड लाइब्रेरी सहित कई वैश्विक संस्थानों से जुड़े रहे और अफ़्रीका, उपनिवेशवाद व उत्तर-उपनिवेशवाद पर उनकी शोध व किताबें अंतरराष्ट्रीय संदर्भ मानी जाती हैं; उनकी माँ विश्वप्रसिद्ध फ़िल्ममेकर मीरा नायर हैं, जिनकी रचनात्मक यात्रा थिएटर से लेकर वैश्विक स्तर पर सराही गई फ़िल्मों और डॉक्यूमेंट्रीज़ तक फैली है और जो अफ़्रीका व भारत में युवाओं और बच्चों के कल्याण हेतु लगातार कार्यरत हैं; ज़ोहरान की पत्नी रामा दुवाजी एक सम्मानित विज़ुअल आर्टिस्ट हैं, जिनकी कला अरब संस्कृति और महिला अधिकारों की आवाज़ बनती है और जिनसे उनकी पहली मुलाक़ात एक डेटिंग ऐप पर हुई थी; और खुद ज़ोहरान ममदानी, जो हिप-हॉप और रैप संगीत से जुड़े रहे, अपनी माँ की फ़िल्म में संगीत दे चुके हैं और 2020 में न्यूयॉर्क स्टेट असेंबली के सदस्य चुने जाने के बाद अब 1 जनवरी से न्यूयॉर्क शहर के मेयर का पद संभालने जा रहे हैं—यह पूरा परिवार बताता है कि विविधता, प्रतिभा और सामाजिक प्रतिबद्धता जब एक साथ मिलती है तो इतिहास बदलने वाली नेतृत्व क्षमता जन्म लेती है।

 

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