नई दिल्ली 30 अक्टूबर 2025
देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी पर एक ऐतिहासिक टिप्पणी करते हुए उनकी रिहाई की राह खोल दी है। अदालत ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन और केंद्र सरकार से कहा कि वे नेशनल सिक्योरिटी एक्ट (NSA) के तहत वांगचुक की गिरफ्तारी का “ठोस और तथ्यात्मक आधार” प्रस्तुत करें। यह फैसला न केवल एक व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा है, बल्कि यह इस बात की कसौटी भी बन गया है कि भारत में असहमति की आवाज़ कितनी सुरक्षित है। अदालत की तीखी टिप्पणियों ने सरकार के फैसले को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है, और लोकतंत्र में संवाद और स्वतंत्रता के मूल्यों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
अदालत का सख्त सवाल: “किस बात की राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे में?”
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से सीधा सवाल किया — “वांगचुक ने ऐसा क्या कहा या किया जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हुआ?” मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा का दुरुपयोग नागरिक अधिकारों को कुचलने का औज़ार नहीं बन सकता। अदालत ने यह भी जोड़ा कि यदि प्रशासन केवल असहमति के आधार पर किसी नागरिक को हिरासत में लेता है, तो यह संविधान के अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार) का उल्लंघन है। अदालत का स्वर साफ था — “राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आप लोकतंत्र को खामोश नहीं कर सकते।” यह टिप्पणी अदालत के भीतर गूंजती रही, और सुनवाई के बाद पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई।
पर्यावरण से देशद्रोह तक — एक विकृत नैरेटिव
सोनम वांगचुक, जिन्हें लद्दाख का हिमयोद्धा कहा जाता है, पिछले दो दशकों से हिमनद संरक्षण, सतत विकास और स्थानीय स्वशासन के मुद्दों पर काम कर रहे हैं। हाल के दिनों में उन्होंने सरकार की उन नीतियों पर सवाल उठाए जो लद्दाख की नाज़ुक पारिस्थितिकी और स्थानीय जनजीवन को प्रभावित कर रही थीं — खासकर खनन परियोजनाओं और पर्यावरणीय मंज़ूरियों को लेकर।
उनकी शांति-पूर्ण गतिविधियों को प्रशासन ने “उत्तेजक भाषण” बताते हुए NSA के तहत गिरफ्तार कर लिया।
लेकिन अदालत में यह सवाल गूंजा — “क्या पर्यावरण की रक्षा करना अब राष्ट्रविरोध बन चुका है?” यह सवाल केवल सोनम वांगचुक का नहीं, बल्कि उन सभी आवाज़ों का प्रतीक बन गया है जो विकास और विनाश के बीच संतुलन की बात करती हैं।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: ‘अगर पर्यावरण की बात जुर्म है, तो लोकतंत्र ICU में है’
अदालत ने अपने तीखे शब्दों में कहा, “अगर पर्यावरण की रक्षा करने और पृथ्वी को बचाने की बात करना अपराध है, तो यह देश का लोकतंत्र बीमार हो चुका है, ICU में है।” यह वाक्य कोर्ट के रिकॉर्ड में केवल टिप्पणी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की नब्ज़ टटोलने वाली चेतावनी बन गया है। अदालत ने कहा कि असहमति, आलोचना और संवाद लोकतंत्र की आत्मा हैं। अगर इन्हें अपराध घोषित कर दिया गया, तो संविधान की आत्मा पर सबसे बड़ा हमला होगा।
‘खारिज नहीं, सुधार करो’ — न्यायपालिका की सरकार को नसीहत
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को सलाह दी कि असहमति को कुचलने की बजाय सुधार की दिशा में सोचना चाहिए।
अदालत ने कहा, “जब कोई नागरिक या कार्यकर्ता नीति की खामियों को इंगित करता है, तो यह शासन के लिए अवसर होना चाहिए, चुनौती नहीं।” यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह सिर्फ एक गिरफ्तारी का मामला नहीं, बल्कि नीति-निर्माण में जनता की भागीदारी के अधिकार का सवाल है। कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि अदालत ने सरकार को स्पष्ट संकेत दिया है कि “राष्ट्र की सुरक्षा” के नाम पर असहमति को दबाने की प्रवृत्ति न्यायिक समीक्षा से बच नहीं सकती।
सरकार पर बढ़ा दबाव — NSA का आधार साबित करना चुनौती
अदालत ने सरकार को आदेश दिया है कि वह अगली सुनवाई तक यह बताए कि NSA लगाने की वास्तविक वजह क्या थी। अगर सरकार कोई ठोस प्रमाण नहीं दे पाई, तो वांगचुक की रिहाई लगभग तय मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अदालत की यह टिप्पणी भविष्य के लिए एक कानूनी मिसाल बनेगी, ताकि असहमति को “देशद्रोह” या “सुरक्षा खतरा” बताकर मनमानी गिरफ्तारी न की जा सके। कानूनी जानकारों ने यह भी जोड़ा कि यह फैसला कार्यपालिका को संदेश देता है — “संविधान से ऊपर कोई नहीं।”
विपक्ष और नागरिक समाज की प्रतिक्रिया — “लोकतंत्र ने सांस ली”
विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के इस रुख का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय लोकतंत्र के पुनर्जीवन की दिशा में बड़ा कदम है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी नेताओं ने कहा कि “सरकार को अब तय करना होगा कि वह आलोचकों से संवाद करेगी या जेल भेजेगी।” नागरिक संगठनों और पर्यावरणविदों ने इसे “भारत के न्यायिक विवेक की जीत” बताया है। सोशल मीडिया पर #StandWithSonamWangchuk और #SaveDemocracy जैसे ट्रेंड शुरू हो गए हैं, जिनमें लाखों लोगों ने अदालत के फैसले का समर्थन किया है।
लोकतंत्र की असली परीक्षा — असहमति को सहने की क्षमता
सोनम वांगचुक का मामला अब केवल एक गिरफ्तारी का मुद्दा नहीं रहा। यह भारत के लोकतंत्र की सहनशीलता, विवेक और न्यायिक स्वतंत्रता की परीक्षा बन गया है।
अदालत ने यह स्पष्ट किया कि यदि असहमति को अपराध बना दिया गया, तो लोकतंत्र अपनी आत्मा खो देगा।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संविधान ने जिस दृढ़ता से सुरक्षित किया है, वही आज न्यायपालिका के माध्यम से फिर से जीवित होती दिखाई दे रही है। देशभर के सामाजिक विचारक इसे “संवैधानिक पुनर्जागरण” कह रहे हैं — एक ऐसा क्षण जब अदालत ने सरकार को संविधान का आईना दिखाया है।
न्याय का साहस और लोकतंत्र की सांस
सोनम वांगचुक की रिहाई का रास्ता भले ही अभी न्यायिक प्रक्रिया में हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में एक नैतिक मील का पत्थर बन चुकी है। यह फैसला सिर्फ एक व्यक्ति के अधिकारों की बात नहीं करता — यह उन सभी के लिए उम्मीद की किरण है जो सच्चाई, पर्यावरण और सामाजिक न्याय के लिए आवाज उठाते हैं। अदालत का यह संदेश आने वाली पीढ़ियों के लिए अमर रहेगा, “लोकतंत्र तब तक ज़िंदा है, जब तक असहमति ज़िंदा है।”




