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नीतियों की जकड़ में नेपाल का ‘हरा सोना’: हर साल 20 अरब रुपये की साखू लकड़ी जंगलों में सड़ रही

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | काठमांडू | 3 मई 2026

नेपाल में साखू (साल) के पेड़ों से होने वाली भारी कमाई नीतिगत पाबंदियों की वजह से बर्बाद हो रही है। हालात यह हैं कि हर साल करीब 20 अरब रुपये की लकड़ी जंगलों में ही सड़ जाती है, जबकि देश को लकड़ी की जरूरत पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ रहा है। नेपाल में सालाना लगभग 50 मिलियन क्यूबिक फीट साखू लकड़ी उत्पादन की क्षमता है, लेकिन मौजूदा नीतियों और जटिल प्रक्रियाओं के चलते इसका सिर्फ 16 फीसदी ही उपयोग हो पा रहा है। यानी करीब 84 फीसदी लकड़ी बिना इस्तेमाल के जंगलों में पड़ी-पड़ी खराब हो जाती है।

सुनसरी जिले के बराहक्षेत्र इलाके के एक सामुदायिक वन समूह के अध्यक्ष लोक बहादुर दहाल बताते हैं कि नियम इतने सख्त हैं कि हरे पेड़ों को काटने की अनुमति नहीं है। यहां तक कि सूखे पेड़ों को भी तब तक नहीं हटाया जा सकता, जब तक वे खुद गिर न जाएं। इस वजह से बड़ी मात्रा में लकड़ी सड़ जाती है और उसका आधा भी इस्तेमाल नहीं हो पाता।

वन विभाग के नियमों के अनुसार केवल गिरे हुए, सूखे या बीमार पेड़ों को ही काटा जा सकता है और वह भी सीमित समय के भीतर। स्थानीय लोगों का कहना है कि कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में इतने कम समय में लकड़ी निकालना लगभग असंभव होता है।

वन विशेषज्ञ प्रोफेसर राजेश राय का कहना है कि अगर साखू लकड़ी का सही इस्तेमाल किया जाए तो यह अकेले ही देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकती है। उनके मुताबिक इससे हर साल हजारों लोगों को रोजगार मिल सकता है और अरबों रुपये की आमदनी हो सकती है।

लेकिन सख्त नियमों के चलते न सिर्फ स्थानीय समुदायों को नुकसान हो रहा है, बल्कि देश को विदेशी लकड़ी, लोहा और प्लास्टिक (uPVC) जैसे विकल्पों पर भी निर्भर होना पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में नेपाल ने दर्जनों देशों से अरबों रुपये की लकड़ी और निर्माण सामग्री आयात की है।

व्यापार से जुड़े लोगों का कहना है कि महंगी रॉयल्टी, लंबी प्रक्रिया और बीच में लगने वाले अतिरिक्त खर्च के कारण साखू लकड़ी बाजार में महंगी पड़ती है। यही वजह है कि उपभोक्ता सस्ती सामग्री की ओर रुख कर रहे हैं।

पूर्व वन अधिकारियों का मानना है कि “पेड़ नहीं काटने” की सोच ने भी इस समस्या को बढ़ाया है। उनका कहना है कि अगर समय पर पेड़ों का प्रबंधन न किया जाए तो वे पुराने होकर खुद ही खराब हो जाते हैं, जिससे देश को आर्थिक नुकसान होता है।

हालांकि सरकार अब कुछ नियमों में ढील देने पर विचार कर रही है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक नीतियों में बड़ा बदलाव नहीं होगा, तब तक नेपाल का यह ‘हरा सोना’ यूं ही बर्बाद होता रहेगा।नेपाल के जंगलों में मौजूद साखू सिर्फ पेड़ नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक ताकत है—जिसे सही नीति और प्रबंधन से देश की तरक्की का आधार बनाया जा सकता है।

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