राष्ट्रीय/अंतरराष्ट्रीय | समी अहमद | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/काठमांडू | 5 मई 2026
यात्रा बहाली से फिर भड़का पुराना सीमा विवाद
भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चला आ रहा लिपुलेख दर्रे का सीमा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है। इस बार विवाद की वजह कैलाश-मानसरोवर यात्रा को दोबारा शुरू करने का भारत का फैसला बना है, जिसे चीन के साथ समन्वय में जून से अगस्त के बीच संचालित किया जाना प्रस्तावित है। नेपाल ने इस कदम पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे अपनी संप्रभुता से जुड़ा मामला बताया है। यह इलाका भारत, नेपाल और तिब्बत (चीन) के त्रिकोणीय जंक्शन पर स्थित है और वर्षों से दोनों देशों के बीच विवाद का केंद्र बना हुआ है।
नेपाल का सख्त रुख—विदेश मंत्रालय ने दर्ज कराई औपचारिक आपत्ति
काठमांडू ने इस मुद्दे पर औपचारिक कूटनीतिक आपत्ति दर्ज कराते हुए कहा है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी क्षेत्र नेपाल के अभिन्न हिस्से हैं। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में 1816 की सुगौली संधि का हवाला देते हुए कहा कि महाकाली नदी के पूर्व स्थित ये सभी क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से नेपाल की संप्रभुता के अंतर्गत आते हैं। नेपाल ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने इस विषय पर अपनी चिंता भारत के साथ-साथ चीन तक भी पहुंचाई है और बिना उसकी सहमति के इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की गतिविधि स्वीकार्य नहीं होगी।
भारत का जवाब—“ऐतिहासिक तथ्य नेपाल के दावे का समर्थन नहीं करते”
नेपाल के विरोध पर भारत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि लिपुलेख दर्रा कोई नया या विवादित मार्ग नहीं है, बल्कि 1954 से यह कैलाश-मानसरोवर यात्रा का पारंपरिक रास्ता रहा है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि नेपाल के दावे “ऐतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों पर आधारित नहीं हैं।” भारत ने यह भी कहा कि यह यात्रा दशकों से नियमित रूप से चलती रही है और इसका पुनः संचालन कोई नया विकास नहीं है। साथ ही भारत ने बातचीत और कूटनीति के जरिए सभी लंबित मुद्दों के समाधान की बात दोहराई है।
भारत-चीन समन्वय से बढ़ी संवेदनशीलता
विवाद उस समय और गहरा गया जब भारत ने चीन के साथ समझौते के तहत लिपुलेख मार्ग से यात्रा बहाल करने की घोषणा की। कोविड-19 महामारी के कारण 2020 से यह यात्रा स्थगित थी। अब नई योजना के तहत लगभग 500 श्रद्धालु उत्तराखंड के रास्ते लिपुलेख दर्रे से चीन में प्रवेश करेंगे, जबकि कुछ यात्रियों के लिए सिक्किम मार्ग भी उपलब्ध रहेगा। भारत-चीन के इस समन्वय ने नेपाल की चिंताओं को और बढ़ा दिया है, क्योंकि वह इस क्षेत्र को अपना मानता है।
विदेश सचिव की नेपाल यात्रा पर भी पड़ा असर
इस पूरे घटनाक्रम का असर भारत के विदेश सचिव विक्रम मिस्री की प्रस्तावित नेपाल यात्रा पर भी पड़ता दिखाई दे रहा है। मई के मध्य में प्रस्तावित इस यात्रा को दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा था, लेकिन मौजूदा विवाद ने इसकी संवेदनशीलता बढ़ा दी है। नेपाल के नए प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह की सख्त कूटनीतिक नीति और विदेशी नेताओं से सीमित मुलाकातों की वजह से यह भी स्पष्ट नहीं है कि इस दौरे के दौरान उच्चस्तरीय बैठक हो पाएगी या नहीं।
रणनीतिक और धार्मिक दोनों दृष्टि से अहम लिपुलेख
लिपुलेख दर्रा केवल एक सीमा विवाद का विषय नहीं है, बल्कि यह धार्मिक और रणनीतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। कैलाश-मानसरोवर यात्रा हिंदू, बौद्ध, जैन और बोन परंपराओं के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है। वहीं यह क्षेत्र भारत, नेपाल और चीन के बीच सामरिक संतुलन के लिहाज से भी संवेदनशील है। इस इलाके में किसी भी गतिविधि का असर तीनों देशों के संबंधों पर पड़ सकता है।
पहले भी बढ़ चुका है तनाव, 2020 में विवाद चरम पर
यह पहली बार नहीं है जब लिपुलेख क्षेत्र को लेकर विवाद उभरा हो। वर्ष 2020 में भारत द्वारा सड़क निर्माण के बाद नेपाल ने कड़ा विरोध जताया था और अपना नया राजनीतिक नक्शा जारी कर इस क्षेत्र को अपने हिस्से के रूप में दिखाया था। उस समय दोनों देशों के संबंधों में तनाव देखने को मिला था। मौजूदा घटनाक्रम उसी पुराने विवाद के फिर से उभरने का संकेत देता है।
राजनयिक समाधान ही एकमात्र रास्ता
विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का समाधान केवल संवाद और कूटनीतिक प्रयासों से ही संभव है। भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध गहरे रहे हैं, ऐसे में बार-बार उभरता सीमा विवाद दोनों देशों के रिश्तों पर असर डाल सकता है। दोनों पक्षों के लिए यह आवश्यक है कि वे आपसी बातचीत के जरिए समाधान तलाशें।
संबंधों की परीक्षा का समय
कैलाश-मानसरोवर यात्रा को लेकर उठा यह विवाद भारत-नेपाल संबंधों के लिए एक नई परीक्षा बनकर सामने आया है। एक ओर धार्मिक आस्था और परंपरा का सवाल है, तो दूसरी ओर संप्रभुता और सीमा का मुद्दा। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश इस संवेदनशील स्थिति को किस तरह संभालते हैं और क्या कूटनीतिक रास्ता इस विवाद को शांत कर पाता है।




